कविता शब्दों से परे भी बहुत कुछ…साहित्यकार महावर ने कहा…समाज से लिया..उसे ही शब्दों में पिरोकर लौटाया

बिलासपुर–– देखकर सुनकर उनकी ऊर्जा पर विश्वास नहीं होता  लेकिन मिलने और बातचीत के बाद विश्वास करना पड़ता है कि एक अच्छा प्रशासक कितना काबिल कवि हो सकता है। तमाम  बातों को समझने और सुनने के बाद कहना पड़ता है कि 24 घंटे 12 महीेने सबके जीवन में हैं। लेकिन उसका उपयोग कौन..किस तरह करता है। मूर्धन्य साहित्यकार,बिलासपुर संभागायुक्त त्रिलोक चंद महावर का जीवन खुली किताब  है। उन्होने तमाम प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच अन्दर कुछ भी बचाकर नहीं रखा। प्रशासनिक जिम्मेदारियों के बीच जो कुछ अन्दर बचा उसे उन्होने कविता में पिरोकर सबके सामने परोस दिया।
                   बिलासपुर संभागायुक्त,मूर्धन्य साहित्यकार टीसी महावर की कविता संग्रह ‘‘शब्दों से परे’’ का लोकार्पण 29 अप्रैल 2018 को प्रार्थना भवन, जल संसाधन परिसर में होगा। समारोह में देश , प्रदेश के स्वनामधन्य साहित्यकार शिरकत करेंगे। लोकार्पण के बाद कविता पाठ भी किया जाएगा।  30 अप्रैल 2018 को  आज के सामय में कविता  विषय पर परिचर्चा का आयोजन किया जाएगा। लोकार्पण समारोह की अध्यक्षता वरिष्ठ साहित्यकार भोपाल के शशांक करेंगे। मुख्य अतिथि की जिम्मेदारी प्रसिद्ध साहित्यकार रायपुर के तेजिन्दर के कंधों पर होगी। स दौरान आमंत्रित साहित्यकार खरगौन से भालचंद जोशी, बिलासपुर के रामकुमार तिवारी और दिल्ली से सुधीर सक्सेना आलेख पढ़ेंगे।
                          संभागायुक्त टीसी महावर ने बताया कि कविता संग्रह – ‘शब्दों से परे’ लोकार्पण पर आयोजित दो दिवसीय समारोह में देश  के लब्धप्रतिष्ठित साहित्यकारो में दिल्ली से हरिनारायण, भोपाल से महेन्द्र गगन, सरगुजा से विजय गुप्त, खंडवा से कैलाश मंडलेकर के अलावा रायपुर से संजीव बख्शी, नथमल शर्मा समेत जाने-माने साहित्यकार मौजूद रहेंगे। आयोजन की जिम्मेदारी संयुक्त जिम्मेदारी पहल प्रकाशन भोपाल और कथादेश दिल्ली की होगी।
                  बातचीत के दौरान कविता और रचना विषयवस्तु पर प्रकाश डालते हुए संभागायुक्त महावर ने बताया कि दबाव में ही निखार है। वर्ना जिन्दगी सपाट है। यह सच है कि प्रशासनिक अधिकारी होने के कारण दबाव बना रहता है। लेकिन जब दवाब जीवन का हिस्सा बन जाए तो सब कुछ आसान हो जाता है। अन्य कवि साथियों की तरह मैं भी समाज का हिस्सा हूं। समाज से ही मेरी कविता जन्म लेती है। समाज के समाने परोस देता हूं। महावर ने बताया कि सबकुछ दृष्टि और दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। आप दवाब को किस रूप में लेते हैंं यह आपके ऊपर निर्भर करता है।
                     बातचीत के दौरान महावर ने बताया कि हम सब सृजनकर्ता के हस्ताक्षर हैं। सृजनकर्ता ने हमें सृजन का हुनर दिया है। यहां सृजन का अर्थ कविता  निबंध,आलेक रपट से  है। जो हम देखते हैं उसे अक्षर में पिरो देते हैं। महावर ने बताया कि मैं किसी वाद को नहीं जानता । मुझे सभी साहित्यकारों और चिंतकों को पढ़ने का मौका मिला। जहां से कुछ मिला उसे ले लिया।
                                        संभागायुक्त ने बताया कि मैने अपने शुरूआती दिनों में आपबीती अनुभवों को लिखा। लोगों को विश्वास नहीं हुआ कि क्या कुछ मेरे साथ इतना कुछ बीता है। लेकिन यह सच है…कि जो देखता हूं..वही लिखता हूं। उन्होने बताया कि  सच है कि शब्दों की बाजीगरी कविता है। लेकिन कविता शब्दों के हटकर भी बहुत कुछ है। क्या कभी आपने नवजात बच्चे और मां के बीच संवाद को सुना। शायद नहीं…इन अनकही बातों को कागजों पर उतारना कविता है । लेकिन मेरा मानना है कि  नवजात बच्चे और मां के बीच के बीच आखों और मुस्कुराहट के संवाद को कागजों पर उतारना नामुमकिन है। सही मायनों में यही कविता है। जिसने इसे महसूस किया वही तो कवि है।
                    महावर ने बताया कि मैने स्कूल में रहते हुए 1975 में पहली कविता लिखी। कविता का शिर्षक चीड़िया है। चीडिया कविता को राष्ट्रीय स्तर सम्मानित किया गया। इसके बाद लेखन कार्य चलता रहा। लिखता रहा..जब मौका मिला…लिखा..यद्यपि मौका मिलता नहीं..लेकिन प्रकृति ने भरपूर मौका दिया..भावों को पन्नों में लिख दिया। जिसकी परिणति पांचवी किताब का विमोचन का होना है।
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