हाथियों के दल ने उतारा मौत के घाट….योजनाएं बन गयी सफेद हाथी…ग्रामीणों में भयंकर आक्रोश

वाड्रफनगर- ( आयुष गुप्ता )– बलरामपुर जिले के वाड्रफनगर विकास खंड ग्राम पंचायत जौराही के चवरसरई  में 13 हाथियों के दल को भगाने गए फॉरेस्ट और ग्रामीणों के बीच एक ग्रामीण हाथियों के चंगुल में फंस गया। हाथियों ने ग्रामीण को मौके पर ही पटक-पटक कर मार डाला ।

              तमोर पिंगला से सटे जोराही गांव के चवरसरई जंगल में हाथियों के दल ने एक ग्रामीण को मार डाला है। अभ्यारण में हाथियों का विशालकाय झुंड भ्रमण करने निकला था। इसी दौरान हाथियों की जद में ग्रामीण आ गया। 13 हाथियों का दल एक दिन पहले दोपहर को जौराही पंचायत के चवरसरई से लगे जंगल में पहुंच गया। हाथियों के दल को भगाने के लिए रघुनाथ नगर वन परिक्षेत्र के अमला के साथ  ग्रामीण भी हाथियों को खदेड़ने के लिए जंगल में घुसे।

                  लेकिन हाथी भागने की जगह अपने स्थान पर डटे रहे। इस बीच हाथियों ने ग्राम चवरसरई के 35 साल के शेर सिंह पिता जगसाय को पकड़ लिया। इसके बाद उसे पटक कर मौत के घाट उतार दिया ।  हाथियों का दल मार्लिन पहरी जंगल में अभी भी डेरा जमाए हुए हैं। ग्रामीण की मौत के बाद स्थानीय लोग और वन कर्मचारी जंगल छोड़ भाग गए।

             संवाददाता ने बताया कि शेर सिंह का शव रात भर जंगल में ही पड़ा रहा। सुबह गांव वाले वन अमले और पुलिस बल के साथ मालीन परी जंगल पहुंचे। जहां से मृतक शेर सिंह के शव को बरामद किया गया।  मृतक के शव को पीएम कराने के बाद परिजनों को सौंप दिया गया है।

                               मालूम हो कि बीते साल  भी हाथियों के दल ने क्षेत्र में कई लोगों की कुचल कर मौत के घाट उतार दिया था। बावजूद इसके हाथियों और स्थानीय लोगों के संरक्षण को लेकर वन विभाग ने कोई कदम नहीं उठाया। जिसके कारण ग्रामीण भयंकर आक्रोश हैं । बरहाल वन विभाग  ने पीड़ित परिवार को मुआवजा देकर आर्थिक सहायता प्रदान की है। बाकी राशि प्रकरण बनवाने के बाद दी जाएगी।

             ग्रामीणों को इस बात को लेकर दहशत है कि वह जंगल में अपने बैल चराने जलाऊ लकड़ी लेने और वन पर आश्रित कई कार्यो को कैसे करेंगे। ऐसे में हाथियों के दल ग्रामीणों पर हमला करने से नही चूकेंगे। बताते चलें कि 2 साल पहले तमोर पिंगला भगवानपुर समेत कई स्थानों पर सोलर फेंसिंग का काम हाथियों से बचाव के लिए लगाया गया था।  जो अब खुद सफेद हाथी साबित हो रहे हैं। करोड़ों रुपया खर्च करने के बाद भी अब ना तो तार के निशान बचे हैं।और ना ही खंभे….ऐसे में योजना बनाने वाले कैसे हाथियों को ग्रामीणों पर हमले से बचा सकते हैं। फिलहाल समझ से परे है…।

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