आखिर कौन सी अंतिम ईच्छा रह गयी अधूरी…पद्मश्री श्यामलाल ने किसकों पत्र लिखने को कहा था…विस्तार से पढ़ें

बिलासपुर—पद्मश्री श्यामलाल ने शुक्रवार की सुबह आठ बजकर 40 मिनट पर 93 साल की लम्बी यात्रा के बाद अंतिम सांस ली।  निधन का समाचार मिलते ही बिलासपुर समेत पूरा प्रदेश गमगीन हो गया। सभी ने अश्रुपूरित श्रद्धांजली देकर पद्मश्री श्यामलाल के योगदान को याद किया। लोगों ने उनके साथ बिताए अनभवों को साझा कर प्रदेश को दिए गए योगदान को याद किया। लेकिन लोगों को नहीं मालूम होगा कि पंडित श्यामलाल ने अंतिम सांस अंतिम ईच्छा पूरी होने के पहले ही खत्म हो गयी। जबकि उन्हें विश्वास था कि दुनिया छोड़ने से पहले भारत के राष्ट्रपति उनकी ईच्छा को जरूर पूरा करेंगे।
                       पंडित श्यामलाल का पूरा जीवन खुली किताब की तरह थी। जिसका एक एक पन्ना खुला हुआ था। अकलतरा के एक छोटे से गांव से संघर्ष की गलियों से उन्हें दिल्ली स्थित दरबार हाल तक पहुंचने का मौका मिला। फक्कड़ कबीर जैसी जिन्दगी जीने वाले पंडित श्यामलाल को ना केवल छत्तीसगढ़ राज्य पर अभियान था..बल्कि खुद को छत्तीसगढ़ियां कहलाने में गर्व महसूस किया।
                     बहुमुंखी प्रतिभा के धनी पंडित श्यामलाल का भाषा, पत्रकारिता,राजनीति,अध्यात्म पर अच्छी पकड़ थी। उन्होने राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी के सानिध्य में रहकर पत्रकारिता का ककहरा सीखा। राष्ट्रकवि माखनलाल चतुर्वेदी के खण्डवा से प्रकाशित अखबार कर्मभूमि के लिए बिलासपुर में रहकर  संवाददाता का काम किया।
                        राज्य निर्माण में पंडित श्यामलाल चतुर्वेदी का नाम अंग्रिम पंक्ति में लिया जाता है। जब छत्तीसगढ़ी भाषा को संवैधानिक दर्जा दिए जाने की बात चली तो राज्य शासन ने पंडित श्यामलाल को छत्तीसगढ़ी राजभाषा आयोग का पहला अध्यक्ष बनाया। उन्होने अपने कार्यकाल में छत्तीसगढ़ी भाषा को संवैधानिक दर्जा दिलाने मेहनत की। राजभाषा आयोग अध्यक्ष रहते हुए उन्होने छत्तीसगढ़ी भाषा पर जमकर काम किया। संवैधानिक अधिकारी दिलाने बुनियादी स्तर पर मजबूत आधार बनाया।
                            जब नई दिल्ली स्थित दरबार हाल में पंडित श्यामलाल को भारत के प्रथम नागरिक राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने पद्मश्री से सम्मानित किया तो पूरा छत्तीसगढ़ गदगद हो गया। लेकिन लोगों ने महसूस किया कि पंडित श्यामलाल के चेहरे पर पद्मश्री पाने की बहुत अधिक खुशी नहीं है।
                   अलंकरण के दौरान श्यामलाल के साथ मौजूद उनके पत्रकार पुत्र सूर्यकांत ने बताया कि पिताजी ने राष्ट्रपति रामनाथ कोविद से निवेदन किया कि पद्मश्री मिलना सार्थक हो जाता जब छत्तीसगढ़ी भाषा को संवैधानिक दर्जा मिल जाए। राष्ट्रपति ने आश्वासन दिया कि आप स्वस्थ्य रहें…क्योंकि एक निश्चित प्रक्रिया के बाद जल्द ही इच्छा पूरी होगी।
                         सूर्यकांत ने बताया कि बीमारी के दौारन पिताजी ने बार बार केन्द्र सरकार को पत्र लिखकर जानने को कहा कि छत्तीसगढ़ी भाषा को संवैधानिक दर्जा मिलने में अभी कितनी देर है। इस दौरान उन्होने बार बार दुहराया कि जीते जी यदि छत्तीसगढ़ी भाषा को संवैधानिक दर्जा जाए तो समझुंगा की जीवन धन्य हो गया। सूर्यकांत ने बताया कि चूंकि पिता जी की तबीयत दिनों दिन खराब हो रही थी। इसलिए ना तो पत्र लिखने का समय मिला और ना ही उनकी अन्तिम इच्छा ही पूरी हुई।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *