Chhattisgarh- कृषि आधारित चावल उद्योग बदहाल …….. पटरी पर लाने मिलर्स को नयी सरकार से उम्मीदें

बिलासपुर । छत्तीसगढ़ नई करवट ले रहा है। प्रदेश की नई सरकार कृषि व्यवस्था की बेहतरी के अनेक  कदम उठा रही है। लेकिन प्रदेश का चांवल उद्योग बदहाली के कगार पर है। कृषि व्यवस्था की गाड़ी का दूसरा पहिया चरमरा रहा है। कई राइस मिलें बंद होने की स्थिति में है। इस उद्योग से जुड़े लोग भी सरकार से आस लगाए हैं कि नई सरकार इस दिशा में भी सोचेगी और राइस मिलों को बचाने के लिए  समय रहते कारगर कदम उठाए जाएंगे।

छत्तीसगढ़ को धान का कटोरा कहा जाता है। जिसमें एक कड़ी धान की पैदावार करने वाले किसान हैं। वहीं दूसरी महत्वपूर्ण कड़ी राइस मिलर्स की है। छत्तीसगढ़ में करीब 17 सौ राइस मिलें हैं। जिनमें उसना मिलो की संख्या 450 एवं  अरवा मिलों की संख्या करीब साढ़े तेरह सौ हैं. जो बंद होने की कगार पर हैं। प्रदेश में सरकार जितना भी धान करीदी करती है, उसकी मीलिंग यही मिलें करती हैं। जिसकी शुरूआत प्रदेश में 2001-02 से हुई। इस साल प्रदेश में करीब 125 लाख मिट्रिक टन धान का उत्पादन होना बताया जा रहा है. सरकार ने समर्थन मूल्य पर इसका करीब 85 लाख मिट्रिक टन धान खरीद लिया है। प्रदेश की मौजूदा सरकार नें अपने वादे को पूरा करते हुए इस साल 2500 रुपए प्रति क्विंटल की दर से खरीदी की है। जिससे किसानों को बड़ी राहत मिली है।

लेकिन धान की मीलिंग करने वाले राइस मिलर्स की समस्याओँ के निराकरण की दिशा में कोई पहल नजर नहीं आ रही है। जबकि यह उद्योग प्रदेश की जीवनरेखा की तरह है। यह गाँव से लेकर शहर तक फैला हुआ है। सरगुजा से लेकर बस्तर के दुर्गम इलाके तक यह उद्योग संचालित है। इससे अप्रत्यक्ष रूप से बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार मिलता है।  इस उद्योग से सीधे तौर पर करीब 85 हजार मजदूरों को रोजगार मिलता है। करीब सवा चार लाख परिवारों का भरण दृ पोषण होता है। कुक्कुट – आहार, सालवेंट प्लांट, पावर प्लांट, शराब उद्योग आदि चावल मिलों पर आश्रित उद्योग हैं। लेकिन चावल उद्योग समस्याओँ से घिरा हुआ है। जिसमें सबसे अहम् मुद्दा यह है कि सरकार नें किसानों का समर्थन मूल्य बढ़ा दिया है। लेकिन कस्टम मीलिंग दर जस की तस है। 2001 से कस्टम मीलिंग दर 40 रुपए प्रति क्विंटल है। जो 2019 मे भी मात्रा 40 रूपए  अठारह साल में इसमे कोई बढ़ोतरी नहीं की गई है। जबकि इस दौरान मजदूरी- बिजली दर और अन्य खर्चों में भारी बढ़ोतरी हो गई है।  राइस मिलर्स विगत 10 वर्षो से कस्टम मिलिंग चार्ज बढाने की मांग लगातार कर रहे है।   जानकारी के अनुसार केन्द्र सरकार द्वारा वर्ष 94-95 मे अरवा हेतु 10 रूपए एवं उसना कस्टम मिलिंग के लिए 20 रूपए प्रति क्विंटल मिलर्स को देना निर्धारित किया गया था वही दरे आज भी निर्धारित है प्रदेष सरकार को इस दिषा मे भी दरो मे सुधार हेतु ठोस पहल करने चाहिए  एक तथ्य यह भी है कि वर्ष 2001-02 धान का समर्थन मूल्य मात्रा 530 रूपए था जो आज बढकर 2500 रूपए हो गया है। इस बात से षासन प्रषासन अवगत हैॅ कि प्रदेष की अरवा राईस मिलो मे चावल की झरती मात्र 50 से 55 किलो और उसना मे 60 से 62 किलो तक झरती आती है. मिलर्स को षासन द्वारा निर्धारित अरवा 67 और उसना मे 68 प्रतिषत चावल जमा देना होता है। अर्थात बचत चावल की पूर्ति मिलर्स को अपने पास से करना होता है. जबकि पंजाब मे चावल की झरती 67 किलो ही आती है और कस्टम कार्य का नीति निर्धारण भी केन्द्र पंजाब प्रदेष को लेकर ही करती है   ।

राइस मिलर्स को उम्मीद है कि प्रदेश सरकार उन्हे मंडी टैक्स में राहत देगी । क्योंकि कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में मंडी टैक्स में छूट देने का एलान किया है। सरकार नवंबर से फरवरी तक धान खरीदी करती है। उसके बाद फरवरी से अक्टूबर तक मिलर्स को मंडी टैक्स में छूट देना चाहिए। यह उनके लिए व्यावहारिक होगा।

इस समय प्रदेश में अरवा मिलों की हालत सबसे  अधिक खराब है। उसना मिलें फिर भी एक्सपोर्ट और अन्य कारणों  से किसी तरह संचालित हो रही हैं। लेकिन अरवा मिलें साल में बमुश्किल कुछ महीने ही चल पाती हैं। बाकी साल के मार्च से अक्टूबर – नवंबर तक मिलें बंद रहती हैं। जिससे मिलर्स तो बेरोजगार होते ही हैं, वहां काम करने वाले मजदूरों और अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार करने वालों को भी कोई काम नहीं मिल पाता है। 2016 – 17 से अरवा मिलों की हालत अधिक खराब है। इसके पहले सरकार की नीति थी कि अरवा और उसना दोनों तरह की मिलों को कस्टम मीलिंग के लिए एक बराबर धान दिया जाता था। लेकिन 2017-18 से केन्द्र सरकार ने अरवा चावल लेने पर पाबंदी लगा दी और एफसीआई ने अरवा चावल लेना बंद कर दिया । ऐसे में पीडीएस में खपत के अनुसार 22 लाख मिट्रिक टन अरवा चावल ही सरकार लेती है। जिसके लिए 33 लाख मिट्रिक  टन धान अरवा मिलों को मीलिंग के लिए दिया जाता है। जिससे अरवा मिलों को पूरे बारहों महीने काम नहीं मिल पाता है और करीब 9 महीने तक मिलें बंद रहती है। 2018-19 में भी 83 लाख मिट्रिक टन धान की खरीदी हुई है। जिसमें से 33 लाख मिट्रिकत टन धान कस्टम मीलिंग के लिए अरवा मिलों को दिया गया है। इसकी मीलिंग फरवरी महीने में ही पूरी हो जाएगी और फिर मार्च से मिलें फिर बंद हो जाएंगी। इससे फिर मजदूरी की बेरोजगारी बढ़ेगी और चावल उद्योग पर आश्रित उद्योग भी प्रभावित होंगे। हालांकि राज्य शासन ने केन्द्र सरकार से अनुरोध किया है कि बचे हुए 14 लाख मि.टन धान की कीमत दी जाए । राज्य सरकार के इस अनुरोध के केन्द्र सरकार ने ठुकरा दिया है।   ऐसी स्थिति में राइस मिलर्स के हगित में  राज्य शासन को चाहिए कि वह बचे हुए 50 लाख मिट्रिक टन धान में से 14 लाख मिट्रिक टन धान कस्टम मीलिंग के लिए अरवा मिलों को प्रदान करे। जिससे इन मिलों को लगातार चलाया जा सके। इसके बिना अरवा मिलें नहीं चल सकती । इसकी एक बड़ी वजह यह भी है कि धान के बढ़े हुए मूल्य के कारण अरवा मिलर्स अन्य राज्यों के राइस मिलर्स के साथ प्रतिस्पर्धा करने की स्थिति में नहीं हैं। अपनी मिल बंद करना उनकी मजबूरी है। जिसके चलते अरवा मिलों की हालत दयनीय है औऱ सरकार ने यदि इस बीच ठोस कदम नहीं उठाए तो आने वाले एक – दो साल में मिलें बंद होने की कगार में पहुंच जाएँगी।  

छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद शुरूआती दौर में 2001-02 में सरकार की उदारता पूर्ण नीति के कारण चावल उद्योग को बढ़ने का मौका मिला। जिससे व्यवसायी भी इस उद्योग को लेकर उत्साहित हुए। लेकिन पिछले तीन दृचार साल में हालात कुछ ऐसे बने कि यह उद्योग चरमराने लगा है। जिसके पीछे शासन की नीतियां ही जिम्मेदार नजर आती हैं। एक तरफ व्यवस्था इस तरह बनाई गई है कि नफा हो या नुकसान कस्टम मीलिंग अनिवार्य है। लेकिन इस बात की फिकर किसी को नहीं है कि चैतरफा दबाव के बीच मिलर्स की हालत लगातार खराब होती जा रही है। छत्तीसगढ़ में धान से जो चावल बनता है, वह भारत सरकार के  मान्य प्रतिपूर्ति प्रतिशत ( झरती ) 67 प्रतिशत से बहुत कम है। छत्तीसगढ़ के धान में टूटन अधिक होती है और 55 प्रतिशत से अधिक चावल नहीं मिल पाता है। जानकार बताते हैं कि भारत सरकार ने पंजाब के धान के हिसाब से झरती तय की है। पंजाब के धान में इसके अनुरूप झरती मिल जाती है। लेकिन जलवायु अलग होने के कारण छत्तीसगढ़ के धान में यह संभव ही नहीं है। इस बारे में सभी जानते हैं । लेकिन इस दिशा में कभी कोई ठोस पहल नही कि गई है। देष के अलग-अलग प्रदेषो मे जलवायु एवं पानी की भरपूर उपलब्धता के कारण चावलो की झरती मे अंतर आता है। अतः प्रदेष सरकार को केन्द्र ष्षासन को पहल करनी चाहिए कि केन्द्र प्रदेष अनुसार झरती का प्रतिषत तय करे इस वर्ष उत्तर प्रदेष ष्षासन ने  हाईब्रिड धान के लिए तीन प्रतिषत झरती कि छुट दी है प्रदेष सरकार को भी चावल उ़द्योग की बेहतरी के लिए ऐसे कदम उठाना की अपेक्षा है।

इसी तरह धान के लिए भी गुणवत्ता के मापदण्ड हैं। लेकिन उसकी भी अनदेखी की जी रही है। जिसके चलते निम्न गुणवत्ता के धान से भी चावल बनाकर देना मिलर की मजबूरी बन गई है। एक तरफ छत्तीसगढ़ में किसानों को धान की ऐसी किस्म के उत्पादन के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, जिसमें उत्पादन भले ही अधिक हो , लेकिन चावल तैयार करते समय टूटन अधिक होती है। वहीं मिलर्स पर अधिक चावल देने का दवाब बनाया जाता है। जबकि इस सिलसिले में यह मुद्दा भी विचारणीय है कि जलवायु के कारण प्रदेश के हर एक दस किलोमीटर में फसल में अँतर आ जाता है। यह सब समझकर भी प्रदेश के अफसर मौन हैं।

शासन की ओर से चावल की उद्योग नीति को प्राथिमकता से अलग कर दिया गया है। जिससे इस उद्योग को नवीनीकरण दृ आधुनीकीकरण समेत सभी सुविधाएं नहीं मिल पा रही है।  जबकि यह राज्य का सबसे बड़ा कृषि आधारित उद्योग है। आज एक तरफ उद्योगों को बढ़ावा देने के लिए अन्य प्रदेश सस्ती बिजली दे रहे हैं। जबकि छत्तीसगढ़ अपने प्रदेश को मंहगी बिजली और अन्य प्रदेशों को सस्ती बिजली दे रहा है। बड़े औद्योगिक घरानों को देने के लिए हमारे पास सस्ती दर पर जमीनें हैं। लेकिन चावल उद्योग को न सस्ती जमीन मिलती है और  न ही लोन मिलता है। प्रदेष सरकार से अपेक्षा है कि जिस तरह धान उत्पादन हेतु कृषको से बिजली षुल्क न्युनतम रूप से ली जा रही है इसी तरह  कृषि पर आधारित चावल उ़द्योग से भी बिजली षुल्क न्युनतम रूप से लिया जावे। ऐसा होने से निष्चित रूप  से चावल उद्योग प्रोत्साहित होगा 

छत्तीसगढ़ में हाल ही में बनी नई सरकार जब प्रदेश में कृषि और किसानों को बढ़ावा देने का दावा कर रही है और कदम भी उठा रही है,ऐसे में राइस मिलर्स भी अपनी बेहतरी के लिए ठोस कदम उठाए जाने की उम्मीद कर रहे हैं । उनका मनना है कि यहां कि जलवायु के हिसाब से चावल गुणवत्ता और झड़ती आदि के मापदण्ड बनाए जाएं। मंहगाई को देखते हुए कस्टम मीलिंग दर में भी बढ़ोतरी की जानी चाहिए। परिवहनकर्ता ठेकेदार के बराबर मिलर्स को  भी परिवहन दर मिलना चाहिए। सरकार चावल उद्योग में चल रहे भ्रष्टाचार पर भी कड़ी नजर रखे। साथ ही नई उद्योग नीति बनाते समय कृषि आधारित दृ रोजगारमूलक चावल उद्योग को भी सस्ती जमीन दृ सस्ती बिजली मुहैया कराए। छत्तीसगढ़  में सुगंधित धान का भी बाजार विकसित हो सकता है। इस दिशा में भी पहल जरूरी है। जिससे प्रदेश के किसानों को भी सही दाम मिलेगा और यहां का चावल एक्सपोर्ट हो सकेगा। इसके लिए प्रदेश सरकार को केन्द्र से बातचीत कर उचित समाधान निकालना चाहिए ।

                                     

 

 

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