मुद्दा लीडरशिप के खालीपन को भरने का…उल्टी गिनती शुरू… सवाल कद्दावर नेता के तलाश की…अटेंशन हुई जनता

महामंत्री अटल श्रीवास्तव ,congress,bilaspur,news,atal shriwasvata,भाजपा सांसद,छत्तीसगढ़ राज्य, बिलासपुर जिले, बिलासपुर–(सीजी वाल )-लोकसभा चुनाव में  तारीख नजदीक आने के साथ ही अब मुकाबले की तस्वीर भी उभरकर सामने आने लगी है। बिलासपुर लोकसभा सीट पर कांग्रेस के अटल श्रीवास्तव और बीजेपी के अरुण साव के बीच सीधा मुकाबला नजर आ रहा है। दो चेहरों पर केन्द्रित होते जा रहे इस चुनावी मुकाबले में यह सवाल भी उभर रहा है कि क्या इस चुनाव से बिलासपुर मे नेतृत्व शून्यता की भरपाई हो सकेगी। इस इलाके को पहले की तरह मजबूत और कद्दावर नेता मिल सकेगा…..?  इस मुद्दे पर लोगों को कांग्रेस उम्मीदवार अटल श्रीवास्तव से बड़ी उम्मीदें नजर आ रहीं हैं। तो वहीं कानूनी जानकार अरूण साव को लेकर भी लोग गंभीर हैं।
                     वर्तमान लोकसभा चुनाव को लेकर देश में इस बात की चर्चा है कि इस बार के चुनाव कई मायने में महत्वपूर्ण है। चूंकि इसके जरिए देश के लोकतंत्र का बड़ा फैसला होने जा रहा है। बीजेपी की पांच साल की सरकार का कामकाज कसौटी पर है। वहीं कांग्रेस ने गरीब परिवारों के खाते में हर साल 72 हजार रुपए जमा करने और किसानों के लिए बड़ी राहत की घोषणा कर मुकाबले को दिलचस्प बना दिया है। धीरे –धीरे निर्णायक दौर की ओर बढ़  रहे चुनावी माहौल में कई तरह के सवाल और मुद्दे चर्चा में आ रहे हैं। बिलासपुर लोकसभा क्षेत्र में चुनाव स्थानीय नेतृत्व के मुद्दे पर केन्द्रित होता नजर आ रहा है। यहां  भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और राहुल गाँधी के नाम की चर्चा तो है। लेकिन अहम्  सवाल यह है कि क्या यह चुनाव बिलासपुर क्षेत्र में नेतृत्व के खालीपन को भर पाएगा। इस लिहाज से लोग कांग्रेस के अटल श्रीवास्तव और बीजेपी के अरुण साव को कसौटी पर रखकर देख रहे हैं।
    बिलासपुर इलाके को लोगों की इस सोच की बड़ी वजह यह है कि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था लागू होने के बाद से ही बिलासपुर के नेतृत्व की अपनी पहचान रही है। कांग्रेस को दौर में डॉ. शिवदुलारे मिश्र, डॉ. रामाचरण राय, डॉ. श्रीधर मिश्र, बी.आर. यादव से जैसे नाम दिए। बिलासपुर इलाके से राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल, चित्रकांत जायसवाल, अशोक राव, बंशीलाल धृतलहरे  जैसे कांग्रेसी दिग्गजों नें मध्यप्रदेश मंत्रिमंडल में अपनी जगह बनाई थी। बीजेपी में भी निरंजन प्रसाद केशरवानी, मदन लाल शुक्ला, मनहरण लाल पाण्डेय और मूलचंद खंडेलवाल जैसे नेताओँ  ने बिलासपुर को पहचान दी थी। हाल के दिनों तक लगातार बीस साल विधायक और छत्तीसगढ़ सरकार में मंत्री रहते हुए अमर अग्रवाल बिलासपुर का नेतृत्व करते रहे। लेकिन अब एक तरह से नेतृत्व शून्यता जैसी स्थिति बन गई है। जिससे बिलासपुर इलाके की पहचान को लेकर एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है।
                      इसके मद्देनजर लोग यह सवाल कर रहे हैं कि क्या इस लोकसभा चुनाव में बिलासपुर में यह खाई पट सकेगी..? लिहाजा लोग दोनों प्रमुख पार्टियों के उम्मीदवारों की शख्सियत को कसौटी पर रखकर देख रहे हैं। बिलासपुर लोकसभा चुनाव के पिछले कई चुनाव बीजेपी जीतती रही है। लेकिन पार्टी ने इस बार अरुण साव के रूप में नए चेहरे को सामने लाया है। हालांकि अरुण साव एवीव्हीपी और युवा मोर्चा में रहकर बीजेपी को अपनी सेवाएँ देते रहे हैं। लेकिन सड़क की राजनीति और स्थानीय मुद्दों की लड़ाई में उनकी हिस्सेदारी नजर नहीं आती। स्थानीय नागरिक सुविधाओँ,समस्याओँ, किसान – मजदूर – छात्र – युवा – महिलाओँ के मुद्दों पर किसी आँदोलन को लेकर उनकी कोई पहचान नहीं रही।
                                   दूसरी तरफ कांग्रेस उम्मीदवार अटल श्रीवास्तव एएसयूआई – युवक कांग्रेस के दौर से राजनीति में हैं और पिछले काफी समय से छत्तीसगढ़ प्रदेश कांग्रेस महामंत्री के रूप में बिलासपुर ही नहीं पूरे प्रदेश में अपनी पहचान रखते हैं। मध्यप्रदेश की राजनीति के दौर में कद्दावर नेता अर्जुन सिंह के करीबी रहे अटल श्रीवास्तव ने बिलासपुर के हित से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय हिस्सेदारी निभाई है। बिलासपुर रेल जोन आँदोलन के दौरान उनकी अहम् हिस्स्दारी रही। बिलासपुर के गुरूघासीदास विश्वविद्यालय को सेन्ट्रल युनिवर्सिटी का दर्जा देने के लिए चलाए गए आँदोलन में अटल श्रीवास्तव की भूमिका काफी सशक्त रही। स्थानीय स्तर पर युवाओँ, छात्रों, व्यापारियों से जुड़े मुद्दों को लेकर कई ऐसे अवसर आए , जब अटल श्रीवास्तव जुझारू नेता के रूप में सबके साथ खड़े नजर आए। बिलासपुर के विकास की उपेक्षा के खिलाफ आवाज उठाने पर उन्हे पुलिस की लाठियां भी खानी पड़ी। जिसे लेकर अटल श्रीवास्तव काफी चर्चा में भी रहे।
                                      दोनों उम्मीदवारों के बीच इस तरह की तुलना करते हुए लोगों की प्रतिक्रिया है कि जुझारू और हर समय लोगों के साथ खड़े होने वाले उम्मीदवार को अवसर दिया जाना चाहिए। जिससे प्रदेश ही नहीं दिल्ली के स्तर पर भी बिलासपुर इलाके को उसकी पुरानी  पहचान फिर से मिल सके। साथ ही बिलासपुर में उभर आए नेतृत्व के खालीपन को भरा जा सके।  अब चुनाव नतीजों से ही साफ हो सकेगा कि बिलासपुर में लीडरशिप के खालीपन को भरने के मामले में मतदाता अपनी कसौटी पर किसे खरा साबित करते हैं।

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