गेवरा पेन्ड्रा रेल प्रोजेक्ट..NGT से मिला आधा न्याय…वकील सुदीप ने कहा..फैसले को सुप्रीम कोर्ट में दूंगा चुनौती

बिलासपुर–सुप्रीम कोर्ट वकील सुदीप श्रीवास्तव की याचिका पर एनजीटी ने माना कि गेवरा पेन्ड्रा रेल कारिडोर प्रोजेक्ट का वन्य जीवों पर प्रभाव पड़ेगा। एनजीटी ने मामले की जांच का जिम्मा नेशनल वाइल्ड लाइफ बोर्ड को दिया है। एनजीटी ने क्षेत्र को हाथी और टाइगर रहवासी जोन मानते हुए अपने फैसले में एनजीटी ने कहा कि वन जीव रहवास क्षेत्र को लेकर विशेषज्ञों से सुझाव लिए जाएं। नेशनल वाइल्ड लाइफ बोर्ड की मंजूरी के बाद सुझावों को अमल में लाया जाए।

                      सुप्रीम कोर्ट अधिवक्ता सुदीप श्रीवास्तव ने बताया कि गेवरा पेन्ड्रा रोड लाइन को लेकर तीन बिन्दुओं समेत अन्य बातों को एनजीटी के सामने रखा था। एनजीटी ने अपने फैसले में कुछ बिन्दुओं को माना है..तो कुछ को इंकार कर दिया है। कुछ बातों पर गौर नहीं किया है। सुदीप श्रीवास्तव ने बताया कि गेवरा पेन्ड्रा रेल लाइन प्रोजेक्ट को लेकर तीन प्रमुख बिन्दुओं के साथ चुनौती पेश किया था।

                          एनजीटी को बताया कि वनभूमि से जुड़े कई तथ्यों को रेलवे और राज सरकार ने छिपाएं है। जबकि रेल लाइन ऐसे क्षेत्र से भी निकाला जा सकता है जहां वनों को कम हानि और जीवों का रहवास भी बहुत अधिक प्रभावित नहीं हो। जानते हुए भी कि वर्तमान प्रस्तावित रेल लाइन को अचानकमार टाइगर रिजर्व और हसदेव अरण्य के बीच दस किलोमीटर के दायरे से निकाला जा रहा है। यह क्षेत्र अचानकमार टाइगर हाथी रहवास वाला है। हाथियों का आज भी आना जाना है। टाइगर की भी उपस्थिति है। वन्य प्राणी संरक्षण प्रबंधन ने प्रोजेक्ट तैयार करते समय मामले को गंभीरता से नहीं लिया है। प्रोजेक्ट तैयार  करने वाली संस्था ट्रॉपिकल फारेस्ट रिसर्ज इन्स्टीट्यूट को प्लानिंग का कोई अनुभव भी नहीं है। उनका काम भी नहीं है। रेलवे प्रबंधन और तत्कालीन  प्रदेश सरकार ने रिपोर्ट अपने अनुसार तैयार कराया है। प्लानिंग में जगह जगह अधिकतम छोटे पैच में हाथियों और जानवरों को गुजरने के लिए कही अन्डर तो कही ओव्हर पास बनाया है। जो निश्चित रूप से हास्यास्पद है।

                     सुदीप ने बताया कि वन अधिकार का निर्धारण सही तरीके से नहीं किया गया है। रिपोर्ट तैयार करते हुए तथ्यों को छिपाया गया है। वास्तविक लोगों को मुआवजा भी नही दिया गया है। इसलिए तमाम विसंगतियों को दूर करने के लिए रेल लाइन को उस स्थान से निकाला जाए जहां से वनअधिकार और जन्तुओं का रहवास कम से कम प्रभावित हो। ऐसा संभव भी है।

                            सुदीप के अनुसार एनजीटी ने तर्कों को आंशिक रूप से स्वीकार कर केन्द्रीय वन पर्यावरण मंत्रालय को निर्देश दिया है। मंत्रालय ने प्रकरण को नेशनल टाइगर कन्जर्वेटर ऑथारिटी को जांच का जिम्मा दिया है।

                          जबकि राज्य सरकार और रेल मंत्रालय एक सिरे से नकार रहे हैं कि क्षेत्र में हाथी का रहवास है। सरकार और रेल प्रशासन का तर्क है कि कभी कभी हाथी का आना जाना होता है। जबकि मानव द्वन्द्व के आंकड़े कहते हैं कि क्षेत्र में हाथी की हमेशा से उपस्थिति रही है। इस बात को एनजीटी ने भी माना है। क्षेत्र में हाथी और टाइगर के अलावा दुर्लभ जीवो, वनस्पति है। वन्यप्राणी से जुड़ी संस्थाओं ने भी सुझाव दिए हैं। उसके अलावा नेशनल वाइल्ड लाइफ बोर्ड योजना की जांच कर अतिरिक्त सुझावों को लागू करे।

            सुदीप ने  कहा कि वन अधिकार और प्रतिबंधित क्षेत्र से प्रस्तावित रेल लाइन प्रोजेक्ट को लेकर एनजीटी के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट जाउंगा। 135 किलोमीटर रेल लाइन प्रोजेक्ट पर कुल पांच सौ करोड़ खर्च होंगे। दुर्लभ जीव जन्तु प्रभावित होंगे। कोर्ट को बताउंगा कि वनअधिकार क्षेत्र को बहुत कम प्रभावित कर प्रोजेक्ट को पूरा किया जा सकता है।

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