“घुमक्कड़ राम की डायरी” … हिमाचल के गांव में अब भी सुरक्षित है… कुदरत का अनमोल तोहफा…

 ट्रेड यूनियन – कर्मचारी नेता पी.आर. यादव पर्यटन के शौकीन हैं। हर साल किसी इलाके का सफर उनका शगल है। हाल के दिनों में उन्होने हिमाचल प्रदेश की यात्रा की है। घुमक्कड़ राम की डायरी के नाम से उन्होने अपनी इस  यात्रा  का संस्मरण सोशल मीडिया पर साझा किया है। जिसे हम यहां प्रकाशित कर रहे हैं।
 पी.आर. यादव का लिखा…….
       हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार “पंच कैलाश ” बताया गया है ,पहला- कैलाश मानसरोवर, दूसरा- किन्नर कैलाश, तीसरा -श्रीखंड महादेव ,चौथा -मणिमहेश और पांचवा आदि कैलाश, जहां भगवान शिव निवास करते हैं। किन्नर कैलाश की यात्रा अत्यंत दुर्गम है ।कहते हैं कि जीवन काल में एक बार ही यहां की यात्रा की जा सकती है । मान्यता है कि सावन के महीने में शिवजी का शीतकालीन प्रवास किन्नर कैलाश मे होता है। 6050 मी. ऊंचे किन्नर कैलाश के शिखर पर 98 फीट ऊंची शिवलिंग है ।उसके चारों ओर श्रद्धालु परिक्रमा करते हैं ।यहां ब्रह्मकमल खिलता है ।  मान्यता है कि ब्रह्म कमल  का फूल शिवजी पर अर्पण करने से मन की मुराद पूरी होती है। पौराणिक कथा अनुसार महाभारत काल में इसी पर्वत पर भगवान शंकर और अर्जुन के बीच युद्ध हुआ था। किन्नर कैलाश का शिवलिंग दिन में तीन बार रंग बदलता है। वैज्ञानिक इसे स्फटिक रचना का कारण बताते हैं। इस पर्वत पर बौद्ध मंदिर भी है। इसलिए बुद्धिस्ट भी यहां की दुर्गम यात्रा करते हैं ।यात्रा के रास्ते में एक पार्वती कुंड है या छोटा सा झील है।
              यायावर या घुमक्कड़ी आप की हॉबी है और आपको एडवेंचर पसंद  हैं तो आपके लिए हिमाचल प्रदेश के पूर्वोत्तर के कोने में स्थित ,शिमला से ढाई सौ किलोमीटर दूर बहुत सुंदर स्थान जाँस्कर, ग्रेटर हिमालय और धौलधारा तीन उच्च पर्वत तथा सतलुज मुख्य नदी और उसके सहायक बसपा और सप्तयक नदी की घाटी बगीचे …….  जिसमें सेब , अखरोट , एप्रीकॉट (खुमानी )   फलो एवं घने जंगलों में देवदार पाइन और भोजपत्र के वृक्षों से आच्छादित मनोरम स्थान किन्नौर मे आप का स्वागत है। एक महान विचारक ने कहा है कि  “जिसने यात्रा नहीं की और किताबों का अध्ययन नहीं किया वह इस दुनिया और इस में रहने वाले लोगों को समझ नहीं सकता।” वह निरक्षर के समान है।
    किन्नौर का जिला मुख्यालय रिकांग पिओ नाम का छोटा सा शहर है ।यह जिला पूरी तरह ट्राइबल जिला है। जैसे छत्तीसगढ़ का बस्तर ।जिले की कुल जनसंख्या लगभग एक लाख है। यहां साक्षरता दर 80% से अधिक है ।खूबसूरत मनोरम क्षेत्र पर्यटकों से अछूता है ।भीड़ – भाड़ ,प्रदूषण से दूर यदि आप कुछ पल प्रकृति की गोद में बिताना चाहते हैं तो आपके लिए किन्नौर सबसे बेहतर विकल्प है।
       साहसिक रोमांच प्रिय पर्यटकों के लिए किन्नौर की यात्रा दुर्गम होने के बावजूद आप को आकर्षित करेगी। शिमला से रामपुर -बुशहर तक रोड बेहतर है ।इसके बाद किन्नौर का क्षेत्र आरंभ होता है और यहीं से टूटी फूटी सड़कें ,बर्फ से आच्छादित ऊंचे ऊंचे पर्वत श्रृंखला और गहरी घाटी के बीच यात्रा रोमांच से भरपूर है।कभी कभी अत्यंत सकरी सड़कों से गुजरते हुए नीचे खाई की ओर नजर जाने पर रूह कंपा देने वाली गहराई भयभीत भी करती है।
       महाभारत काल के किन्नर प्रदेश आज किन्नौर के नाम से विख्यात है ।हिंदू धर्म ग्रंथों के अनुसार पांडव अज्ञातवास में किन्नौर के गुफाओं में निवास किए थे। आदिवासी जिले के दूरदराज पहाड़ों में अभी भी बहुपति प्रथा प्रचलित है ।परिवार में तीन भाई हैं तीनों की पत्नी एक ही होती है ।वे पांडव कालीन द्रोपदी के पद चिन्हों पर चलती है ।घर की मुखिया भी महिला होती हैं। मेरे विचार से बहुपति प्रथा  संपत्ति के बंटवारे से भी जुड़ा हुआ आर्थिक मामला है। पहाड़ों में कृषि उद्यान के लिए स्थान कम है और जो है उसमें भी बंटवारा होने से परिवार को विकट स्थितियों का सामना करना पड़ेगा  ।  क्योंकि रोजगार के दूसरे साधन भी नहीं है। यहां के निवासी खूबसूरत पहाड़ों को छोड़कर रोजगार के लिए कहीं और जाना भी नहीं चाहेंगे।
       मुझे किन्नौर इस कदर भाया है कि मैं विगत 3 वर्षों में दूसरी बार यहां की यात्रा पर आया हूँ। इस बार मैं अपने साथ 9 दोस्तों को भी लेकर आया हूं ।जिसमें ज्यादातर सीनियर सिटीजंस और गवर्नमेंट एम्पलाइज एसोसिएशन के पदाधिकारी  औरऑफिसर हैं। सिविलियन मित्रगण भी हमारे ग्रुप में हैं। ग्रुप का एक संक्षिप्त परिचय एसपी करोसिया, प्रकाश सिंह परिहार  दुर्ग अध्यक्ष रमन साहनी ,जीआर चंद्रा ,सुंदर सिंह ठाकुर, आनंद भारती, जेपी उपाध्याय ,संतोष चंद्रम और मैं पीआर यादव शामिल हैं।
        हमने यात्रा की शुरुआत हिमाचल की राजधानी शिमला से की। हमारे कुछ साथी शिमला घूमना चाहते थे, इसलिए मजबूरी में यहां रुकना पड़ा यहां की धूल भरी सड़कें ट्रैफिक जाम जैसी दिक्कतों के बीच साथियों के साथ माल रोड, प्रमुख बाजार ,जाकू पर्वत ,कुफरी घूमकर दूसरे दिन सुबह हम किन्नौर के लिए निकले ।सड़क के दोनों ओर सेब की बगीचों एवं देवदार के वृक्षों से आच्छादित जंगलों के सुंदर दृश्यों का आनंद  लेते  हुए  हम नारकंडा होकर रामपुर बुशहर पहुंचे। उसके आगे हाइड्रोलिक पावर प्रोजेक्ट झांकड़ा और वहां से सराहन जहाँ भद्रकाली की हजार वर्ष पुरानी मंदिर में मां काली का दर्शन किए। लकड़ी और पत्थरों के तिब्बत एवं  हिंदू स्थापत्य कला का मिश्रण  अद्भुत मंदिर का अवलोकन करते हुए हमारी किन्नौर यात्रा आरंभ हुई ।
          हमें रास्ते भर सतलुज और उसकी सहायक नदियों में बड़े-बड़े हाइड्रोलिक पावर  प्रोजेक्ट निर्माण  देखने को मिला ।पहाड़ों मे टनल( सुरंग )बनाकर जल विद्युत स्टेशन बने हुए हैं  ।जहां हजारों मेगा वाट बिजली उत्पादन होता है तथा कुछ निर्माणाधीन भी हैं ।करछाम में बसपा नदी पर एक बड़ा डैम बना हुआ है। इस बांध में अत्यंत ठंडे बर्फीले पानी में पाए जाने वाली ट्राउट मछली पाली जाती है ।यह मछली अत्यधिक स्वादिष्ट एवं महंगी और दुर्लभ होती है।
सांगला…. यहां से हम अत्यंत संकीर्ण और चट्टानों को काटकर बनाए गए सड़क जहां एक और चट्टानों का दीवार ऊपर चट्टानों का छत और नीचे हजारों फीट गहरी खाई 90 डिग्री के कोण के मोड  पर सामने से आती गाड़ियों की क्रॉसिंग के समय कलेजा मुंह पर आ जाता है। कभी-कभी टायरों से टकराकर पत्थरों के टुकड़े जब खाई में गिरते है तो एहसास होता है यह रोड दुनिया के दुर्गम एवं डेंजरस मार्गो में से एक है ।लगभग 25 किलोमीटर यात्रा के बाद हम सांगला पहुंचते हैं। यह  2621 मीटर ऊंचाई पर  स्थित है ।बसपा नदी के तट पर अत्यंत सुंदर ,सेबों के बगीचों के बीच छोटी सी बस्ती। सामने ऊंचे पहाड़ों पर बर्फ आच्छादित ऐसा प्रतीत होता है जैसे वह हमारे सिर पर मुकुट के सामान चमक रहा है। बसपा नदी के तेज बहाव कि कल -कल की आवाज होटल के कमरे तक सुनाई दे रही है। रात्रि विश्राम पश्चात हम 2000 साल से अधिक पुराने नाग देवता का मंदिर एवं बौद्ध मंदिर का दर्शन कर बस्ती का भ्रमण करते हुए दोपहर बाद चितकुल  के लिए रवाना हुए।
           चितकुल. … भारत का अंतिम गांव है ।  इसके आगे भारत- तिब्बत बॉर्डर पुलिस का बैरियर है ।  जहां प्रवेश प्रतिबंधित है। चितकुल 3450 मीटर ऊंचाई पर बसपा घाटी का अंतिम और ऊंचा गांव है ।बसपा नदी के तट पर गांव बसा है। गांव के बीचो-बीच तीव्र गति से बहता हुआ झरना को कंक्रीट नाले के रूप में तब्दील करने इसका बहाव और तेज हो गया है। इसी झरने के पानी से  पनचक्की चलाई जाती है। जिसमें पूरे गांव के लोग गेहूं, जौ और अन्य अनाज का आटा पीसते हैं। यहां का स्थानिय देवता “माथी”का मंदिर है ।यह लकड़ी का मंदिर हजारों साल पुराना है। सांगला से चितकुल जाने के रास्ते में पाइन ,देवदार एवं भोजपत्र के घने जंगलों और ऊंचे पहाड़ों से बर्फ पिघल कर कल- कल बहते झरनों के रूप में अत्यंत मनोरम दृश्य उत्पन्न करते हैं ।स्वच्छ ,निर्मल पारदर्शी ठंडा पानी चट्टानों से अठखेलियां करते हुए नीचे बसपा नदी में मिल जाती है ।यहां से हमने भोजपत्र के वृक्ष से कुछ टहनियां तोड़कर स्मृति के रूप में अपने साथ लाए हैं ।
       चितकुल के आसपास घूमने के और रात्रि विश्राम पश्चात हम अपने अंतिम पड़ाव किन्नर कैलाश पर्वत के गोद में बसा कल्पा के लिए रवाना होते हैं ।फिर वही टूटी-फूटी सड़कें ,  संकीर्ण रास्ते और बसपा और सतलुज नदी के तेज बहाव की गरजती हुई तेज आवाजें पहाड़, घाटियां होते हुए अनेक हाइड्रोलिक पावर स्टेशन निर्माणाधीन एवं कुछ बिजली उत्पादन कर रही हैं को रुकते -रुकाते  अवलोकन करते हुए किन्नौर का जिला मुख्यालय रिकांग पिओ पहुंचते हैं। यहां से सीधी चढ़ाई चढ कर हमें कल्पा जाना है ।इसलिए रिकांग पिओ को लौटते में देखने का निश्चय कर हम बाईपास रोड से कल्पा रवाना हुए।
        कल्पा…… भारत तिब्बत मार्ग पर स्थित कल्पा 2559 मीटर  ऊंचाई पर स्थित है इस के सबसे निकट किन्नर कैलाश  पर्वत 6050 मीटर की ऊंचाई  है । मौसम साफ होने पर कल्पा से किन्नर कैलाश का शिवलिंग स्पष्ट दिखाई देता है । कल्पा शिमला से लगभग 300 किलोमीटर दूर है । कल्पा से नाको होते हुए लाहौल स्पीति जा सकते हैं ,जो मनाली से जाने वाली लेह -लद्दाख मार्ग से मिल जाती है।
        किन्नर कैलाश पर्वत के गोद में बसा कल्पा इस बस्ती सिर पर मुकुट के सामान सफेद बरफो से आच्छादित है।नीचे सतलुज नदी बहती है जो दुनिया की सबसे अधिक गहराई में बहने वाली नदी है ।गहरी अत्यंत गहरी घाटी के बीच सतलुज नदी बहती है। उसकी तेज बहाव की आवाज हजारों फीट ऊपर तक सुनाई देती है। कल्पा नगर पंचायत में जितने स्थानीय निवासियों का मकान हैं उससे कहीं 4 गुना ज्यादा होटल और गेस्ट हाउस हैं। फिर भी पर्यटकों की बहुत भीड़ -भाड़ नहीं है। यहां जितने पर्यटक हैं उनमें सबसे बड़ी संख्या में बंगाली पर्यटको की हैं। यहां 3000 वर्ष पुराना नाग माता का मंदिर है और एक विष्णु मंदिर भी है। 15-20 दुकानों का बाजार ,चारों ओर बागानों की हरियाली ,इनमें सेब, अखरोट, एप्रीकॉट और भी अनेक स्थानीय फलों के वृक्षों से आच्छादित कल्पा बस्ती।
   कल्पा से 4 किलोमीटर दूर रोघी ऐतिहासिक गांव है  जो यूनेस्को द्वारा संरक्षित है ।इसका इतिहास 3000 वर्ष पुराना बताया जाता है ।लकड़ी के मकान, झरनों, बहते पानी में पनचक्की बनाकर स्थानीय नागरिक अपना अनाज पीसते हैं ।कुछ अत्यधिक पुराने मकानो में अभी भी लोग निवास करते हैं ।पर्यटकों एवं अगस्त -सितंबर में फलों के व्यापारियों के लिए रोड पर अब स्थानीय लोगों ने पक्के मकान ,गेस्ट हाउस और होटल भी बनाने लगे हैं। इस गांव के ऊपर पहाड़ों में अभी भी दूरदराज में लोग रहते हैं ।यहां के स्थानीय निवासी के यहां हमारे ग्रुप ने दोपहर का भोजन किया। उनकी संस्कृति और परंपराओं से अवगत भी हुए।यह क्षेत्र पूरी तरह ट्राईबल निवासियो का है ।यह जानकारी भी मिली कि दूरदराज गांवों में अभी भी बहुपति प्रथा प्रचलित है ।लेकिन यह सिर्फ एक परिवार में ही होता है। जैसे दो या तीन भाई हैं तो वे सभी एक साथ दूल्हा बनकर एक ही कन्या से विवाह करते हैं और किसी एक भाई के मृत्यु होने पर विवाहिता विधवा नहीं होगी। हमें इस गांव में एक ऐसा परिवार से परिचय भी हुआ जिनके परिवार में दो भाइयों की एक पत्नी है।
      कल्पा से 20 किलोमीटर दूर कोठी नाम के गांव में देवी चंद्रिका का मंदिर है। इसका इतिहास भी लगभग 3000 वर्ष पुराना बताया जाता है ।पुराने मंदिर के स्थान पर नया लकड़ी का मंदिर बनाया गया है जो बहुत खूबसूरत है, जिसमें नक्काशी की गई है।
        कल्पा से लौटते हुए हम किन्नौर का जिला मुख्यालय रिकांग पिओ का भ्रमण किये।साथियों ने ड्राय फूड्स खासतौर पर कागजी बादाम, कागजी अखरोट एप्रीकॉट (खुमानी) काला जीरा और किन्नौरी टोपी -शॉल आदि यादगार के रूप में खरीदें।
       यात्रा की समाप्ति करते हुए वापसी में एक रात शिमला के पहले ठियोग नामक प्राकृतिक रूप से मनोरम सुंदर बस्ती में रुके। और अगले दिन हम चंडीगढ़ होते हुए अंबाला कैंट से ट्रेन पकड़ कर वापस अपने शहर अपने परिजनों और मित्रों के बीच पहुंच गये।
 सम्यक विचार मंच से जुड़े कुछ मित्रों ने फोन कर किन्नौर के सामाजिक एवं आर्थिक स्थिति के बारे में जानना चाहा है ।जितना मैंने देखा और समझा उसके अनुसार यहां अभी बस्तर के समान प्रकृति का दोहन करने और आदिवासियों का शोषण करने वाले वर्ग का पदार्पण नहीं हुआ है ।फलों के सीजन में निश्चित ही बड़ी कंपनियों के प्रतिनिधि की उद्यान मालिक  किसानों को वाजिब दाम ना देकर  शोषण करते हैं ।लेकिन प्रकृति अभी सुरक्षित है। यहां बाहरी व्यक्ति जमीन नहीं खरीद सकता इसलिए भी यहां के आदिवासी अभी अपने संस्कृति- सभ्यता को सुरक्षित एवं संरक्षित रखें हुए हैं। लेकिन होटल, गेस्ट- हाउस लीज पर लेकर दिल्ली, चंडीगढ़ के व्यापारी टूरिज्म के क्षेत्र में व्यवसाय कर रहे हैं ।यहां अपराध नगण्य है ।यहां के मूल निवासी अपने इष्ट देवी-देवता का ही पूजा करते हैं अन्य हिंदू देवी देवताओं से लगाव नहीं है ।आदिवासी परंपरा के अनुसार फलो के सीजन में संरक्षित फलों से शराब बनाकर सेवन करते हैं लेकिन झगड़ा फसाद नहीं।
          किन्नौर में भवन एवं रोड निर्माण के कार्य में बिहार से आए मजदूर लगे हुए हैं ।कहीं-कहीं राजस्थानी मजदूर भी मिले ।इस कार्य में लगे मजदूरों को प्रतिदिन ₹700 मजदूरी मिलती है ।स्वयं के द्वारा निर्मित पॉलीथिन के टेंटों में रहते हैं शीतकाल में वापस चले जाते हैं।
           यहां पब्लिक ट्रांसपोर्टेशन के लिए स्टेट ट्रांसपोर्ट की बस एकमात्र सुविधा है ।सीढ़ी नुमा खेतों में गेहू ,जौ, राजमा और कुछ स्थानीय अनाज उगाई जाती है,लेकिन मुख्य फसल फलों का बागान से सेब , एप्रीकॉट ,अखरोट और स्थानीय फलो यहां के स्थानीय मसाले का उत्पादन होता है।

 

 

 


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