जब पिता की तरह छलछला गयीं कलेक्टर की आंखे…सजायाफ्ता कैदी की बच्ची को मिला नया जीवन…स्कूल देख भौचक्क हुई खुशी

बिलासपुर– वाह कलेक्टर साहब…जो कहा..कर दिखाया…। जब आपने कहा था…तो लगा मामला कुछ फिल्मी है। लेकिन जब कर दिखाया तो लगा…कि फिल्में भी सामाजिक तानाबाना के बीच से ही बनती है। अब कहा जाए कि आपने समाजसेवी संस्थाओं से लेकर मंच से अपनी खूबियां गिनाने वालों के लिए मिसाल पेश किया है.. तो कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी। आश्चचर्य तो इस बात की है..आपकों इतनी बड़ी पहले करन की जरूरत ही क्या थी। आपकों को भी आदेश देकर आगे बढ़ जाना चाहिए था। लेकिन आप ऐसा नहीं कर सके….। क्योंकि आप अन्य अधिकारियों की तरह रिमोट पर चलने वालों से हटकर पहले आम इंसान जो ठहरे।

                    पिता अपनी बेटी को खुद से विदा करता है….तब दोनों तरफ से आंसूओं की धार बहती है। बिलासपुर केंद्रीय जेल में ऐसा ही नजारा देखने को मिला। जेल में बंद एक सजायफ्ता कैदी अपनी 6 साल की बेटी खुशी ( बदला हुआ नाम) से लिपटकर खूब रोया। इतना रोया कि पत्थर दिल भी फफक कर रो पड़ा। वजह बेहद खास थी। आज से उसकी बेटी जेल की सलाखों के भीतर नहीं बल्कि आजाद पंछियों की तरह खुले वातावरण में चहकेगी। बड़े स्कूल के हॉस्टल में ट्विंकल ट्विंकल लिटिल स्टार से लेकर..भविष्य में पायथागोरस के जटिल प्रमेय को हल करेगी।यह् सब कुछ लगता तो लगफिल है…लेकिन हम दावा कर सकते हैं कि फिल्में यहीं से बनती है। ऐसा कर दिखाया है बिलासपुर कलेक्टर डॉ.संजय अलंग ने।

                                      करीब एक माह पहले जेल निरीक्षण के दौरान कलेक्टर डॉ संजय अलंग की नजर महिला कैदियों के बीच बैठी खुशी पर गयी। खुशी ने कलेक्टर के सामने इजहार किया कि वह पढ़ना चाहती है। बड़ा इंसान बनना चाहती है। फिर क्या था…बाहर से सख्त कलेक्टर का अन्दर कोमल नाजुक दिल धड़का। उन्होने तत्काल कहा कि तुम ना केवल पढ़ोगी..बल्कि बड़ा इंसान भी बनोगी। दाखिला किसी बड़े स्कूल में करायेंगे। कलेक्टर ने ना केवल वादा निभाया..बल्कि केंद्रीय जेल पहुंचकर खुशी को अपने कार में बैठाया। इसके बाद सीधे जैन इंटरनेशनल स्कूल छोड़ने पहुंच गए। कार से उतरते जब खुशी ने बड़े स्कूल को देखा तो कलेक्टर के आखों में खुशी के आंसू छलछला रहे थे। यद्यपि उन्होने पीने का प्रयास किया..लेकिन देखने वालों ने देख लिया।

                      एक पिता की तरह डॉ.सजंय अलंग खुशी को उंगली पकड़ा कर स्कूल के अंदर तक ले गए। क्योंकि खुशी सुबह से ही एक हाथ में बिस्किट और दूसरे में चॉकलेट लिये स्कूल जाने के लिये जाने के लिए तैयार जो बैठी थी।

                    आमतौर पर स्कूल जाने से बच्चे रोते हैं। लेकिन खुशी बेहद खुश थी। क्योंकि जेल की सलाखों में बेगुनाही की सजा काट रही खुशी आज आजाद हो रही थी। कलेक्टर की पहल पर शहर के जैन इंटरनेशनल स्कूल ने खुशी को अपने स्कूल में एडमिशन दिया। खुशी स्कूल के अब हॉस्टल में ही रहेगी। कलेक्टर की पहल पर खुशी के लिये विशेष केयर टेकर का भी इंतजाम किया गया है। स्कूल संचालक ने बताया कि खुशी की पढ़ाई और हॉस्टल का खर्चा स्कूल प्रबंधन ही उठायेगा। खुशी को स्कूल छोड़ने जेल अधीक्षक एस एस तिग्गा भी मौजूद थे।

                 बताते चलें कि खुशी के पिता केंद्रीय जेल बिलासपुर में सजायफ्ता कैदी हैं। पांच साल की सजा काट ली है, पांच साल और जेल में रहना है। खुशी जब पंद्रह दिन की थी तभी उसकी मां की मौत हो गयी। पालन पोषण के लिये घर में कोई नहीं था। जेल में ही पिता के पास रहना पड़ रहा था। जब वह बड़ी होने लगी तो उसकी परवरिश का जिम्मा महिला कैदियों को दे दिया गया। जेल के अंदर संचालित प्ले स्कूल में पढ़ रही थी। लेकिन खुशी जेल की आवोहवा से आजाद होना चाहती थी। संयोग से एक दिन कलेक्टर जेल निरीक्षण करने पहुंचे। महिला बैरक में देखा कि महिला कैदियों के साथ एक छोटी सी बच्ची बैठी है। पूछने पर बच्ची ने बताया कि जेल से बाहर जाना चाहती है। किसी बड़े स्कूल में पढ़ना चाहती है। बच्ची की बात सुनकर कलेक्टर भावुक हो गए। उन्होंने तुरंत शहर के स्कूल संचालकों से बात की और जैन इंटरनेशनल स्कूल के संचालक खुशी को एडमिशन देने को तैयार हो गये।

                      खुशी के स्कूल प्रवेश के बाद कलेक्टर ने मंशा जाहिर किया है कि जेल में रह रहे 17 अन्य बच्चों को भी जेल से बाहर स्कूल में एडमिशन कराया जाएगा। इसके लिए उन्होने सामाजिक संस्थाओं को सामने आने को कहा है।

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