छत्तीसगढ़:मिड डे मील में अंडे का फंडा…कोई समर्थन तो कोई विरोध में…एमडीएम में सुधार की फिकर किसी को नहीं

सुरजपुर-राज्य में स्कूली बच्चों को दिए जाने वाले मध्यान्ह भोजन में सरकार अंडा परोसने की तैयारी में है। पिछले दिनों जनप्रतिनिधियों के एक प्रतिनिधिमंडल ने स्कूली बच्चों में पोषण के स्तर को बढ़ाने के लिए मिड डे मिल में अंडा को शामिल करने के लिए मुख्यमंत्री भुपेश बघेल को ज्ञापन दिया था। अंडे में प्रोटीन की भरपूर मात्रा होती है। पोषण का स्तर बनाए रखने के लिए आहार में अंडा दिए जाने की कवायद की जा रही है ।सीजीवाल डॉटकॉम के व्हाट्सएप ग्रुप से जुड़ने के लिए यहां क्लिक करे

लेकिन अंडे के फंडे के पीछे कुछ धार्मिक आस्थाओं को मानने वाले विभिन्न मतावलंबी समान मंशा नहीं रखते, उनके द्वारा मिड डे मील में अंडा परोसे जाने पर आंदोलन की चेतावनी भी दी गई है। उनका कहना है कि पोषण का स्तर बनाए रखने के लिए सोयाबीन की सब्जी दी जानी चाहिये।सोयाबीन में अंडे से भी ज्यादा प्रोटीन होता है। इससे शाकाहार की भारतीय परंपरा का निर्वहन हो सकेगा।

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ज्ञातव्य हो कि सरकारी स्कूलों के मध्याह्न भोजन में बच्चों को अंडा देने का पंथश्री प्रकाश मुनि नाम साहेब कबीर आश्रम दामाखेड़ा ने विरोध किया है। धर्म-संस्कृति के विरुद्ध कार्य बताते हुए उन्होंने इस कदम को बच्चों को मांसाहारी बनाने वाला निर्णय बताया है।

मिड डे मिल में अंडा दिये जाने का पूर्व मुख्यमंत्री डॉ रमन सिंह ने भी विरोध किया है और सरकार से इस फैसले पर चिंतन किये जाने की मांग की है. उन्होंने कहा कि ये धार्मिक आस्था और वैचारिक बात है. ये ऐसे लोग हैं जो कबीर पंथ को मानते है जो किसी जाति या धर्म से नही है ये उचित नही है. फैसले पर सरकार को चिंतन करना चाहिए।

आला अधिकारियों ने कहा कि अंडा खाना स्वैच्छिक है। शाकाहारी बच्चों को अंडा नहीं दिया जाएगा। बच्चों में कुपोषण को देखते हुए अंडा खिलाने का निर्णय लिया गया है।इससे जहां राज्य के बच्चों को कुपोषण से मुक्ति दिलाने में मदद मिलेगी, वहीं स्वस्थ छत्तीसगढ़ का निर्माण भी किया जा सकेगा।स्कूल शिक्षा विभाग से इस संबंध में जारी आदेश में स्पष्ट कहा गया है कि जो बच्चे अंडा खाना नहीं चाहते हैं, उनके लिए दूध या सोया से बनी चीजें उपलब्ध कराई जाएंगी।

मध्यान्ह भोजन में चाहे कितने नेता और अफसर बच्चो के साथ शामिल होकर स्वाद लेतें हुए फ़ोटो उतरवा लेवे लेकिन स्कुलो में मध्यान्ह भोजन में मेनू का पालन केवल कागजो में ही होता है।एम डी एम में अंडा हो या न हो,शाकाहार बनाम मांसाहार से ज्यादा जरूरत है।शालाओ में मध्यान्ह भोजन में व्यवस्था सुधार किये जाने की।

विभाग से जारी निर्देशो में मिड डे मील में अचार, पापड़,मीठा, सलाद,हरी सब्जियां शायद ही कही नियमानुसार दी जाती है।खाने के तेल की किस्म और पानी जैसी दाल के क्या कहने।कभी कभी तो फाके चावल या चना मुर्रा में निपटा देते है।

मिड डे मील के मेनू में अंडा शामिल होता है। तो कौन सा अण्डा बच्चो कब मिलेगा ये अन्नदाता ही जाने लेकिन अंडा से समूह वालो की सेहत जरूर सुधार जावेगी …!

एमडीएम संचालन में लापरवाही,धांधली आम बात है।बच्चो की दर्ज और उपस्तिथि के आंकड़ो में प्रतिदिन हेरफेर कर मनमर्जी संचालन किया जा रहा है।जितने बच्चे खाना नहीं खाते या स्कूल नही आते उससे ज्यादा बच्चो का मिड डे मिल का बिल बनता है,विभाग की एमडीएम शाखा वालो की सेवापानी से सब कुछ सही हो जाता हैं।

मेनू में अंडे का फंडा फिट हो भी गया तो बच्चो की सेहत में जब सुधार होगा तब होगा….! लेकिन एमडीएम और समूह वालो का पोषण स्तर जबरदस्त उछाल में होगा। शालाओ में वास्तविक जरूरत निर्धारित मेनू अनुसार गुणवत्ता युक्त मिड डे मिल परोसे जाने की है न कि अंडे के फंडे में मटर पनींर का दाम ढूंढने की …..!

अंडे की बजाय सरकार मिड डे मिल व्यवस्था के संचालन पर ध्यान देते हुए निर्धारित मेनू का गुणवत्तापूर्ण प्रदायगी के साथ,सोशल आडिट, वित्तीय अनुशासन एवम नियंत्रण का डंडा सही मायनों में चला ले तो…. कुछ ही दिनों व्यवस्था स्वयमेव सुचारू हो जाएगी और यह कदम बच्चो के पोषण स्तर में सुधार के लिए अंडे को मेनू में शामिल करने से भी कही ज्यादा कारगर साबित होगा।

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