बिलासपुर का दायरा बड़ा हो गया …… अब दिल भी बड़ा कर लीजिए ….. साहेब

(गिरिजेय)कभी हम लोग ही इस तरह की खबरें लिखते – छापते रहे कि बिलासपुर में एसईसीएल का हेडक्वार्टर बनना चाहिए ….. मेडिकल कॉलेज खुलना चाहिए ….. हाईकोर्ट बनना चाहिए …. सेन्ट्रल युनिवर्सिटी स्थापित होना चाहिए…. अपोलो अस्पताल बनना चाहिए …। लोगों ने इसकी लड़ाई लड़ी और जो चाहिए था , वह बिलासपुर को मिल गया । अपनी लड़ाइयां जीतकर बिलासपुर ने अविभाजित मध्यप्रदेश में भी अपनी अलग पहचान बनाई और उस समय के छत्तीसगढ़ में दूसरे बड़े शहर के रूप में जाना जाता था । लेकिन पिछले कोई डेढ़ – दो दशक का वक्त ऐसा बीता कि हम सिकुड़ते चले गए। हमारी तमाम चीजें शहर के नाम पर थीं। मगर नगर निगम सीमा के करीब – करीब बाहर हों गईं। अब अरसे के बाद एक अच्छी खबर आई है कि बिलासपुर नगर निगम का दायरा बढ़ गया है और शहर से सटे तिफरा – सकरी – सिरगिटी नगरीय निकाय सहित कई गाँव भी निगम की सीमा में शामिल गए हैं। अब अपना बिलासपुर छत्तीसगढ़ का दूसरा सबसे बड़ा नगर निगम बन गया है और अब बी ग्रेड शहर का दर्जा मिल गया है ।  शहर का दायरा तो बढ़ गया । अब दिल भी बड़ा करने की दरकार नजर आती है। जिससे पिछले वक्त की तंगदिली से बाहर आएं और शहर के लोगों के साथ ही अपने साथ नए – नए जुड़े इलाके के लोगों को भी इस बात का अहसास कराएँ कि हम सचमुच बड़े हो गए हैं।

पुराने लोग जानते हैं कि बिलासपुर शहर कभी लम्बाई में बसा था। एक तरफ अरपा नदी और दूसरी तरफ रेल लाइन के बीच लम्बाई में ही इसकी बसाहट फैल रही थी। नब्बे के दशक में उस समय के विधायक और प्रदेश सरकार के मंत्री  रहे बी.आर.यादव ने तरक्की के नजरिए से शहर की इस तस्वीर को सामने रखकर नए ठंग से प्लानिंग शुरू की । उस समय बिलासपुर विकास प्राधिकरण के गठन औऱ उसके पहले अध्यक्ष के रूप में राम बाबू सोंथालिया ने शिल्पकार की भूमिका में कई बड़े काम किए । इधर अरपा के उस पार राजकिशोर नगर और उधर रेल लाइन के उस पार यदुनंदननगर बसाने के पीछे शहर को चौड़ाई में भी विस्तार देने की कल्पना थी। उस समय रेल्वे स्टेशन से सटकर चल रहे संभाग के सबसे बड़े थोक बाजार माल धक्का को धक्का – मुक्की से बाहर निकालकर खुली सांस मुहैया कराने में भी उनकी अहम् भूमिका रही। उस समय रखी गई बुनियाद पर शहर को तरक्की को नई राह पर आगे बढ़ने की पूरी जगह मिली और आज शहर जिस रूप में नजर आता है, वह आगे बढ़ने और बड़ा बनने की इस सोच की ही नतीजा है।

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लेकिन इसके बाद के दौर में वक्त ने पलटा खाया और आज यह कहने में कोई संकोच नहीं होता कि पिछले कोई डेढ़ – दो दशक में हम फैलने की बजाय सिकुड़ते चले गए। उस समय व्यवस्था के जिम्मेदार रहे लोगों से आज कोई पूछ सकता है कि नगर निगम का दायरा बढ़ाने के लिए क्यूं पहल नहीं की गई और इसे ठंडे बस्ते में क्यूं डाल रखा था। उस समय के लोगों का दिल भी कितना छोटा था , इसे कोई आज भी तिफरा रेल्वे ओव्हरब्रिज के बीच खड़े होकर समझ सकता है। जिसकी प्लानिंग करने वाले की सोच पर तरस कताने को जी करेगा । उस समय के लोगों की सोच की तरह संकरे से इस पुल को देखकर लगता है कि उनका इरादा उस पार को बिलासपुर शहर से जोड़ने का भी नहीं रहा होगा। पुल बनना था , इसलिए बन गया और उस पार का हिस्सा जुड़ गया । सोचने की जरूरत थी कि इस पुल के जरिए न्याधानी को राजधानी से जोड़ा जा रहा था। फिर भी इतना तंग नज़रिया …… ?

आखिर इस संकीर्ण पुल के बनने के कुछ बरस के बाद ही वहां पर फ्लाईओव्हर बनाने की जरूरत महसूस होने लगी । इसे अगर पहले ही बना लिया जाता तो बार- बार न दिक्कतों का सामना करना पड़ता और न सरकारी खजाने पर बोझ पड़ता। लगता है शायद यह सोचकर संकरी पुलिया बना दी गई कि बिलासपुर को अब आगे और नहीं बढ़ना है और न आगे जाना है। याद कीजिए उस समय सरकार चला रही पार्टी ने शहर में अपनी संगठन इकाई को ही कई टुकड़ों में बांट दिया था । जब अपनी ही पार्टी के संगठन को बड़ा नहीं करना चाहते थे और उसे ही छोटा कर दिया तो शहर को बड़ा करने के लिए कहां सोचते….. ?  आज भी यह सवाल अपनी जगह पर कायम है।

हालांकि एक तरफ आबादी के साथ लोगों की जरूरतें बढ़ने के साथ ही बिलासपुर को चारों तरफ रिहाइशी इलाकों का फैलाव होता रहा । जिससे कई नई कालोनियां और बहुमंजिला फ्लैट खड़े होते गए । इसके पीछे क्या खेल रहा होगा… पता नहीं । लेकिन नए रिहाइशी इलाकों को नगर निगम की सरहद में लाने की दिलचस्पी नजर नहीं आई। और इस खेल का नतीजा यह निकला कि तमाम बड़ी चीजें बिलासपुर नगर निगम के बाहर होती चली गईं । यह तो गनीमत है कि धरम अस्पताल अपनी जगह पर ही खड़े –खड़े सिम्स में तब्दील हो गया ।

इसलिए शहर के भीतर ही रह गया। वैसे मध्यप्रदेश के जमाने में ही रेल्वे इलाके को नगर निगम में शामिल कर लिया गया था । जिससे रेल्वे को जोनल मुख्यालय निगम की सीमा में आ गया । नहीं तो अपोलो अस्पताल से लेकर युनिवर्सिटी – हाईटेक बस स्टेंड – इंडस्ट्रियल एरिया  सहित कई बड़ी चीजें नगर निगम सीमा से बाहर ही चले गए।

व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों की इस तंगदिली ने बिलासपुर का यह बड़ा नुकसान भी किया कि शहर की तरक्की के कामों पर धीमी चाल का रोग लग गया । सीवरेज प्रोजेक्ट ने तो इस मामले में शहर को मशहूर कर दिया । ऐसे पता नहीं कितने काम हैं , जो वक्त पर पूरे नहीं हुए और आज भी अधूरे हैं ….। खुद भी घिसटते रहते हैं और शहरवालों को भी अपने साथ घिसटाते रहते हैं।

अपने तरह की अलग लाइलाज बीमारी से ग्रसित शहर में अभी भी कोई देख सकता है कि जो नगर निगम वाले गरमी के दिनों में प्यास बुझाने के लिए ट्यूबवेल खोदते रहते हैं , वही इस बरसात में पानी निकालने के लिए नाली खोद रहे हैं। व्यापार विहार की सड़क पर निकलिए तो मन खुद से पूछने लगता है कि क्या अपना शहर अधूरेपन से मुक्त नहीं हो पाएगा और चाहे सरकार बदले या अफसर बदल जाएं, मगर हम अपनी किस्मत को कभी नहीं बदल सकते ।

बहरहाल अब वक्त है बदलाव का….. और बिलासपुर नगर निगम के नक्शे में बड़ा बदलाव हो गया है। शहर का दायरा बढ़ गया है। मुहावरा तो है – देर आए दुरुस्त आए……। लेकिन देर से होने वाली हर चीज दुरुस्त नहीं होती …. उसे दुरुस्त करना भी पड़ता है। कम से कम बिलासपुर में अब तक चल रहे ढर्रे को बदलने के लिए तो बहुत कुछ करने की जरूरत नजर आती है।

पहली जरूरत तो शायद यही है कि हमें दायरे के साथ अपना दिल भी बड़ा करना पड़ेगा। हम बड़े हो गए हैं। हमारे साथ तिफरा – सकरी – सिरगिटी सहित कई गाँव भी जुड़ गए हैं। उनकी भी अपनी उम्मीदे हैं। शहर को लोगों के साथ उनकी उम्मीदों को भी पूरा करा पड़ेगा। …. और कुछ नहीं तो कम से कम  इतना तो  करें कि जो काम शुरू करें उसे सही वक्त पर पूरा कर लें…..। तभी शहर के लोग भी जुड़ेंगे और नए लोग भी मन से जुड़ पाएंगे….।

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