बिलासपुर नगर निगम चुनावःक्या विधानसभा और लोकसभा चुनाव में नाकाम रहे जिला संगठन के भरोसे ही मैदान में उतरेगी कांग्रेस….?

बिलासपुर।नगर निगम के चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं। यह सवाल भी सियासी फिजां में तैरने लगा है कि इस बार चुनाव में बिलासपुर नगर निगम के महापौर और पार्षद पद के लिए उम्मीदवार कौन होगा …. और किसे जीत हासिल होगी । लेकिन छत्तीसगढ़ में सरकार चला रही कांग्रेस पार्टी को लेकर एक अहम् सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अपने मौजूदा जिला संगठन के सहारे ही चुनाव मैदान में उतरेगी। जिसके नाम अब तक कोई जीत दर्ज नहीं हो सकी है। इस संगठन के भरोसे कांग्रेस को विधानसभा चुनाव में भी उम्मीद के हिसाब से जीत हासिल नहीं हो सकी और लोकसभा चुनाव में भी हार का मुंह देखना पड़ा था। लोग यह सवाल कर रहे हैं कि क्या कांग्रेस पार्टी अपने इसी जिला संगठन पर भरोसा करेगी …. या चुनाव से पहले नए लोगों को जिम्मेदारी सौंपी जाएगी।आने वाले महीनों में नगर निगम के चुनाव होंगे। इस बार बिलासपुर नगर निगम का चुनाव काफी अहम् होगा । चूंकि नगर निगम की सीमा में बढ़ोतरी के बाद पहली बार चुनाव हो रहे हैं। अब करीब दोगुने मतदाता शहर की सरकार चुनेंगे । शहर में अब सत्तर वार्ड बन चुके हैं और करीब पांच विधानसभा क्षेत्रों के बीच से महापौर का चुनाव होगा। साथ ही कांग्रेस की  प्रतिष्ठा  भी इस चुनाव में दाँव पर होगी ।सीजीवालडॉटकॉम के व्हाट्सएप् ग्रुप से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक कीजिए

प्रदेश में सरकार बनने के बाद पार्टी चाहेगी कि वह नगर निगम में भी अपनी सत्ता कायम करे। वैसे तो हर एक चुनाव में पार्टी संगठन की भूमिका अहम् होती है। लेकिन नगर निगम के चुनाव में स्थानीय स्तर के मुद्दे और स्थानीय संगठन पदाधिकारियों के चेहरे का अपना अलग प्रभाव होता है। ऐसे में कांग्रेस के मौजूदा संगठन को कसौटी पर रखकर देखा जा रहा है कि नगर निगम के चुनाव में कांग्रेस को  जीत दिलाने में यह किस हद तक कामयाब हो सकेगा।Hindi News से जुड़े, अन्य अपडेट के लिए हमें फेसबुक पेज,ट्विटर फॉलो करें

इस नजरिए से देखें तो बिलासपुर जिला कांग्रेस का मौजूदा संगठन अब तक फिसड्डी ही साबित हुआ है। संगठन के मौजूदा पदाधिकारियों को करीब डेढ़ साल पहले जिला कांग्रेस की कमान सौंपी गई थी। जिम्मेदारी मिलने के बाद शुरूआती दौर में संगठन को  विपक्षी पार्टी के रूप में किरदार निभाना था। जिसमें उस समय की बीजेपी सरकार के खिलाफ  आंदोलनों की लम्बी फेहरिश्त थी । साथ ही पार्टी के संगठनात्मक ढाँचे को मजबूत करना था। मौजूदा पदाधिकारी अपनी इस भूमिका के निर्वहन में कितने कामयाब रहे , इसका अंदाजा पिछले विधानसभा चुनाव को समाने रखकर लगाया जा सकता है। 2018 के उस विधानसभा चुनाव में जब कांग्रेस को पूरे छत्तीसगढ़ में उम्मीद से काफी अधिक 68 सीटें मिलीं। तब कांग्रेस पार्टी बिलासपुर जिले में बमुश्किल दो सीटें ही जीत सकीं। जिले में बिलासपुर शहर और तखतपुर विधानसभा सीट क्यों कांग्रेस के खाते में गईं।

स्थानीय समीकरण और उम्मीदवारों की उसमें क्या भूमिका रही, इसका काफी विष्लेषण को चुका है। लेकिन यह बात सो साफ है कि जिस दौर में काग्रंस को पूरे छत्तीसगढ़ में उम्मीद से अधिक कामयाबी मिली , ऐसे अनुकूल समय में भी बिलासपुर जिले में कांग्रेस पिछड़ गई थी। यह तब भी कांग्रेस के लिए सोचनीय बात थी कि बिलासपुर जिले के मरवाही और कोटा की दो सीटें जोगी कांग्रेस की झोली में चली गईं। जबकि बेलतरा, मस्तूरी और बिल्हा में विधानसभा क्षेत्र में बीजेपी का परचम लहराया। यानी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बिलासपुर जिलें में जोगी कांग्रेस की बराबरी पर रही और बीजेपी से पिछड़ गई।

अब लोकसभा चुनाव की बात करें तो बिलासपुर जिले में कांग्रेस संगठन पूरी तरह से फेल रहा और  यहां पर कांग्रेस पार्टी को करारी हार का समाना करना पड़ा था। कांग्रेस बिलासपुर  लोकसभा सीट तो हार ही गई। जिले की किसी भी विधानसभा सीट पर कांग्रेस को बढ़त नहीं मिल सकी थी। ज़ाहिर तौर पर लगातार दो चुनाव में बिलासपुर जिले में कांग्रेस को मिली पराजय का ठीकरा जिले के संगठन पर ही फूटना था। सियासी हल्कों में माना जा रहा है कि यदि चुनावों में जिले में कांग्रेस को कामयाबी मिलती तो उसका श्रेय संगठन को मिलता औऱ जब नाकामी हाथ लगी है तो उसकी जिम्मेदारी भी संगठन के ही हिस्से में आएगी । साफ है कि बिलासपुर जिले का संगठन कांग्रेस पार्टी के मुद्दों को अपने कार्यकर्ताओँ  और आम मतदाताओँ तक पहुंचाने में पूरी तरह से असफल रहा।


इऩ दोनों ही चुनावों के नतीजे सामने आने के बाद से इस बात की चर्चा समय – समय पर  होती रही है कि कांग्रेस के प्रदेश संगठन ने इसकी समीक्षा की है या नहीं औऱ इसकी पुनरावृत्ति रोकने के लिए कोई कदम उठाया है या नहीं। चूंकि अब तक इस तरह के किसी कदम की जानकारी सार्वजनिक नहीं हुई है। इसलिए लोगों की जिज्ञासा अब भी बनी हुई है। हालांकि प्रदेश कांग्रेस की कमान संभालने के बाद पहली बार बिलासपुर के दौरे में आए मोहन मरकाम के सामने भी यह सवाल उठा था। उन्होने भी इस बात पर गौर किया था। लेकिन अब तक इस बारे में किसी तरह का कदम उठाए जाने की खबर नहीं है। लिहाजा यह सवाल अब भी अपनी जगह पर कायम है कि क्या अब तक नाकाम रहे जिला संगठन के सहारे ही कांग्रेस पार्टी नगर निगम के चुनाव मैदान में उतरेगी और क्या फिर वहीं नतीजा दोहराया जाएगा। हालांकि प्रदेश संगठन के स्तर पर जिले में फेरबदल की सुगबुगाहट है । लेकिन क्या चुनाव के ठीक पहले इस तरह का कोई कदम उठाया जाएगा , इसे लेकर सवालिया निशान बना हुआ है।

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