बांटने वाले लगे टिकट की कतार में….समर्थकों की जगह खुद में जगी पार्षद बनाने की चाहत..वार्डों की होने लगी तलाश

बिलासपुर— पिछले 24 घंटों में एक अजीब वाकया हुआ। सरकार ने उपसमिति गठन कर पन्द्रह अक्टूबर तक मेयर और अध्यक्षों का चुनाव प्रत्यक्ष कराया कराया…मामले में रिपोर्ट तैयार कर पन्द्रह अक्टूबर तक पेश करने को कहा है।  खबर ही कुछ ऐसी थी कि राजनीति में हलचल मच जाए। समिति गठन की सूचना मिलते ही देखने में आया कि कल तक जिनके पास पार्षद टिकट मांगने वालों की लम्बी कतार लगी रहती थी..आज वही लोग पार्षद टिकट के लिए खुद कतार में लग गए है। क्योंकि कल तक समर्थकों के लिए पार्षद टिकट दिलाने वालों को पूरा भरोसा है कि इस बार चुनाव अप्रत्यक्ष ही होगा। ऐसे में क्यों ना अपने लिए टिकट मांगा जाए। क्योंकि बिना पार्षद बने मेयर बनना नामुमकिन है।

                            मुख्यमंत्री के फैसला के बाद लिया कि भाजपा के साथ ही कांग्रेस नेता भी भौचक हो गए हैं। मुख्यमंत्री ने उपसमिति का गठन कर कहा कि मेयर और अध्यक्षों का चुनाव प्रत्यक्ष हो या अप्रत्यक्ष 15 अक्टूबर तक रिपो्ट पेश करें। खबर मिलते ही भाजपा और कांग्रेस नेताओं के खान खड़े हो गए।  समिति गठन की खबर सुनते ही 24 घण्टों में तस्वीर भी बदल गयी है। कल तक जो नेता पार्षद टिकट देने या दिलवाने का दावा कर रहे थे। आज वही लोग अपने आप को टिकट की कतार में खड़े पा रहे हैं। क्योंकि उन्हें भी मालूम है कि समित गठन का फैसला मात्र औपचारिक है। क्योंकि प्रत्यक्ष चुनाव प्रक्रिया को हटाने के लिए रस्म अदायगी का होना जरूरी है। रस्म अदायगी के तहत ही सरकार ने समिति का गठन किया है। तीन सदस्यीय समिति रिपोर्ट में अप्रत्यक्ष चुनाव की अनुशंसा करेगी। ऐसे में मेयर या अध्यक्ष बनने के लिए पार्षद का चुनाव लड़ना बहुत जरूरी है।

                                   बहरहाल समिति की रिपोर्ट रिपोर्ट 15 को आएगी। लेकिन हलचल अभी से है। कल तक नेता प्रत्य़ाशी लड़ाने की बात करने वाले नेता अब सुरक्षित वार्ड तलाश करने लगे हैं। मजेदार बात है कि परिसीमन के बाद दोनों पार्टियों की हालत पतली है। चाहे सामान्य वर्ग का नेता हो या आरक्षित वर्ग का नेता पार्षद चुनाव नहीं लड़ने के इच्छुक सुरक्षित वार्ड तलाशना शुरू कर दिया है। मेयर बनने से पहले ही जोड़ तोड़ का खेल भी शुरू कर दिया है। कई वार्ड तो ऐसे हैं जहां ना तो कांग्रेस को जीत मिली है और ना ही भाजपा को फतह हासिल हुई है।. आज उसी वार्ड से चुनाव हारने की डर से चुनाव लड़ाने वाले नेता पार्षद प्रत्याशी होने के लिए टिकट का दावा करने का मन बना लिया है। कहने का मतलब कल तक हारे हुए वार्ड के लिए गरदन तलाशाने वाले अब अपनी गरदन फंसाने को तैयार हैं।

                   दोनों दलों में ऐसे कई नेता हैं जो मुर्गा लड़ाकर खुद को किंगमेकर की नजर से देखते थे…आज वही नेता लडने के लिए मजबूरी में ही सही खाम ठोकने लगे हैं। कांग्रेस में ऐसे चेहरों की भरमार है जो पर्दे के पीछे खूब बोलते देखे जाते रहे अब सामने तो आ गए हैं लेकिन अब भी खुलकर बोलने से बच रहे हैं। ऐसे चेहरों में नौजवान से लेकर सीनियर के चेहरे शामिल हैं। यदि शेख गफ्फार, बसंत शर्मा, विजय पाण्डेय, महेश दुबे, अशोक अग्रवाल,शिवा मिश्रा,विजय केशरवानी,नरेन्द्र बोलर,राकेश शर्मा,डॉ विवेक वाजपेयी, रामशरण यादव रविन्द्र सिंह, देवेन्द्र सिंह बाटू, विष्णु यादव…यदिपार्षद का चुनाव लड़ें तो समझा जाए कि वह मेयर बनने की तमन्ना रखते हैं। और मजबूरी में पार्षद चुनाव लड़ रहे हैं।

                 इसी तरह भाजपा में रामदेव कुमावत,प्रवीण दुबे,व्ही.रामाराव, राजेश मिश्रा, अशोक विधानी, विनोद तिवारी, पूजा विधानी, गुलशन ऋषि,महेश चन्द्रिकापुरे, मनीष अग्रवाल,धीरेन्द्र केशरवानी,सहदेव कश्यप,गोपी ठारवानी ,बबलू पमनानी की भी मेयर की दौड़ में गिनती हो रही थी। अह इन्गोने मेयर के लिए अभी से वार्ड तलाशना शुरू कर दिया है। यहां भी कमोबेश नियमित हमेशा पार्षद चुनाव लड़ने वाले नेता मन ही मन अप्रत्यक्ष चुनाव को लेकर खुश है। उन्हेे पूरा भरोसा है कि चुनाव जीतेंगे। दमदार चेहरे नहीं होने की सूरत में मेयर भी बनेंगे।

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