कमिश्नर साहब…कभी मेरी गली भी..आया करो…यहां गंदगी के बीच जानवर नहीं..इंसान रहते हैं..आपके अधिकारी भी नहीं सुनते…

बिलासपुर— पहले से ही अव्यवस्था की शिकार लिंगियाडीह ग्राम पंचायत के लोग निगम में शामिल होने के बाद खून के आंसू रो रहे है। निगम प्रशासन लगातार गा केवल गंदा पानी पिला रह है बल्कि बजबजाती नालियों, गड्ढे वाली सड़कों, सड़कों पर पसरी गंदगी और बिल्डिंग मेटेरियल के बीच आम लोगों का जीना दूभर हो गया है।

परिसीमन के बाद नगर निगम की सीमा बढ़ गयी है। वार्डों की संख्या भी बढ़ गयी है। इसके साथ बढ़ गयी है लापरवाह निगम प्रशासन की जिम्मेदारी भी। एक आम नागरिक यही चाहता है कि जहां भी रहे बुनियादी सुविधा जरूर मिले। साफ सुधरा पीने को पानी, अच्छी सड़कें, अच्छा वातावरण आम आदमी की पहली और मूल जरूरतों में शामिल है। लेकिन लिंगियाडीह में आम लोगों में ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा है।

निगम से जुड़े नए क्षेत्र के रहवासी खासकर लिंगियाडीह के लोग अपनी बदहाली के दिन गुजारने के लिए हमेशा की तरह मजबूर है। निगम सीमा विस्तार के साथ ही पंचायत भंग हो चुकी है। निगम के अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों से बचने प्रभार नहीं मिलने का रोना रो रहे हैं। इन सबके बीच लिंगियाडीह पंचायत की स्थिति कुछ ऐसी हो गयी है जैसे एक पिता का व्यवहार अपनी सौतेली संतान के प्रति होती है। जिसे पिता अपनाता तो है लेकिन जिम्मेदारियो से कतराता भी है।

निगम से जुड़ने के बाद कुछ ऐसा नजर आता है कि लिंगियाडीह को निगम प्रशासन ने अपने हाल पर छोड़ दिया है।पंचायत भंग हो चुकी है। बावजूद इसके निगम प्रशासन क्षेत्र की सुख सुविधाओं को लेकर बहुत गंभीर नजर नहीं आता है। यहां ना तो साफ सफाई की व्यवस्था है, ना ही सड़कें है। अमृत मिशन योजना के नाम पर ग्राम पंचायत की तीन सड़कों बुरी तरह से बरबाद कर दिया गया है। हां तहां मिट्टी और गिट्टी पड़ी है। स्थिति यह बताने के लिए काफी है कि निगम के ठेकेदार और सिस्टम कितना निकम्मा है।

नगर निगम बिलासपुर में कुल 70 वार्ड हो गए हैं। यानी नगरीय निकाय चुनाव में पहली बार 70 पार्षद चुने जाएंगे। पहले वार्डों की संख्या 66 हुआ करती थी। नगर पालिका तिफरा,नगर पंचायत- सिरगिट्टी और सकरी, ग्राम पंचायत- मंगला, उस्लापुर, अमेरी, घुरू, परसदा, दोमुहानी, देवरीखुर्द, मोपका, चिल्हाटी, लिंगियाडीह, बिजौर, बहतराई, खमतराई, कोनी और बिरकोना को निगम की जागीर बनाकर बिलासपुर को महापालिका बनाने का प्रयास हुआ है।

बताते चलें कि निगम मे शामिल होने से पहले तक कुछ गांव अपनी बदहाली पर आंसू बहा रहे थे। इसमें एक पंचायत लिंगियाडीह भी है। लिंगियाडीह के लोग ग्रामपंचायत रहने के दौरान ही सफाई व्यवस्था को लेकर त्रस्त थे। अब हालात बद से बदतर हो चुके हैं। नालियां बजबजा रहीं हैं, सड़कें उबड़-खाबड़ है, जहां तहां गड्ढे ही गड्ढे नजर आते हैं। पेयजल की पाइपलाइन नालियों के अन्दर से गयी है। जगह- जगह पाइपलाइन टूटी हुई है। जाहिर सी बात है कि लोगों को गंदा पानी पीने को मजबूर होना पड़ रहा है। पानी टंकी की सफाई शायद ही कभी हुई हो। बावजूद इसके लोग बदबूदार पानी पीने को मजबूर है। लोग इस बात को लेकर भी परेशान हैं कि आखिर अपनी समस्या रखें भी तो कहां रखें।

स्थानीय नागरिक मोहन पाटकर ने बताया कि पिछले 25 सालों से यहां का निवासी हूं। ऐसी बदतल हालत कभी देखने को नहीं मिली। ग्राम पंचायत तो पहले से ही निकम्मा था। अच्छा लगा कि निगम से जुड़कर लिंगियाडीह का कल्याण होगा। लेकिन यहां तो स्थिति अब बद से बदतर हो गयी है। सरपंच-पंच जिम्मेदारी से मुक्त हो गए हैं। निगम के प्रभारी इंजीनियर समस्या सुनने को तैयार नहीं है। जब फोन उठाते हैं..तो रटा रटाया जवाब आता है कि काम चल रहा है।

नगर निगम के स्वास्थ्य अधिकारी डॉ.ओंकार शर्मा से हमेशा की तरह जवाब मिलता है कि साफ सफाई को दुरूस्त कर लिया जाएगा। अब तक समझ मेंनहीं आया कि आखिर वह समय कब आएगा कि साफ सफाई व्यवस्था दुरूस्त हो जाए। सफाई व्यवस्था के लिए जिम्मेदार संजय यादव का तेवर देखते ही बनता है। दो टूक कहता है कि निगम में शामिल होने का अर्थ यह नहीं होता कि व्यवस्था का नााजायज फायदा ना उठाया जाए। इससे पहले यहां सफाई का जिम्मा गिरजा नाम के निजी ठेकेदार पर था। वह अभी भी कार्य कर रहा है। लेकिन साधन का रोना रोता है।

अशोक सिंह ठाकुर 27 साल से लिंगियाडीह के निवासी हैं। अशोक सिंह ने बताया कि अभी कुछ माह पहले ही अमृत मिशन पाइप का काम पूरा हुआ है। 2 माह बाद सड़कों पर लीपापोती की गयी है। मलबे को हटाया नहीं गया है। ठेकेदार को बार बार शिकायत पसंद नहीं है। बात बात पर धमकी देता है कि यदि ज्यादा बोले तो सड़क बनाउंगा ही नहीं। फिर जो करना कर लो। नाला के पास बड़ा गड्ढा खोद कर छोड़ दिया गया है। कभी भी हानलेवा हासदा हो सकता है। लेकिन ठेकेदार कुछ सुनने को तैयार नहीं है।

स्थानीय युवा चेहरा रितेश ने बताया कि सुनने और पढ़ने को मिल रहा है कि कमिश्नर साहब आजकल सायकल से मार्निंग वाक के बहाने साफ सफाई व्यवस्था का जायजा लेने निकलते हैं। मैं….चाहता हूं कि वह मेरी भी गली आएँ। देखें की नाला कि नाला की हालत क्या है। हम से भी पूछे कि क्या यहां सफाई गाड़ी आती है। कमिश्नर अपनी टीम के साथ आएं..और देखें की यहां के तीन चार मोहल्ले गंदगी के बीच में है…या गंदगी मोहल्ले के बीच में है। सतनामी पारा, उमा दुकान, काली मंदिर चौक तक के लोग कचरा फैंकने यहां आते हैं। हमने डॉ. ओंकार शर्मा से कई बार कहा कि यहां एक बड़ी डस्टबिन की व्यवस्था कर दें। पिछले एक महीने से आश्वसन मिल रहा है। आज भी डस्टबिन का इंतजार है।

आश्वासन के बीच स्थिति बद से बद्तर होती जा रही है। जिम्मेदार अधिकारियों को कोई फर्क नहीं पड़ता है। 27 वर्षीय मनोज मेहर कहते हैं कि अमृत मिशन योजना से सड़कें बद से बदतर हो गयी है। जो सड़कें अच्छी थी उनमें भी मलबा फैला है। सफाई की बात ही न करिए। डोर-टू-डोर कचरा कलेक्शन वाली कचरा गाड़ी हम लोगों ने महीनों से नहीं देखा।

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