सागौन में कंकालक रोग…जैविक विधि से होगा नियंत्रित…वैज्ञानिकों ने बताया रासायनिक प्रक्रिया पौधों के लिए घातक

बिलासपुर—छत्तीसगढ़ राज्य के वनक्षेत्रों में मौजूद सागौन और साल को नुकसान पहुंचावे वाले कीटों से जैविक विधि से नियंत्रित किया जाएगा। इसके लिए वन विभाग कैम्पा निधि से वृक्षों की सुरक्षा करेगा।
 
                 छत्तीसगढ़ के वनक्षेत्रों में सागौन और साल में जैविक प्रकोप से नुकसान हो रहा है। कीटों के प्रकोप से पौधों की वृद्धि, उत्पादकता और गुणवत्ता पर ॠणात्मक प्रभाव पड़ा है। सागौन के पौधों और वृक्षों में कीट के प्रकोप से पिछले पांच सालों में पौधों की वृद्धि में लगभग 60 प्रतिशत की कमी आय़ी है। कीटों के प्रकोप से रोकथाम के लिए कीट नाशकों का प्रयोग किया जाना जरूरी है। लेकिन हमें इसके लिए रासायनिक कीटनाशकों के वजाय जैविक नियंत्रण की विधि को अपनाना होगा। यह बातें छत्तीसगढ़ राज्य कैम्पा निधि से पोषित एक दिवसीय कार्यशाला के दौरानऊष्ण कटिबंधीय वन अनुसंधान संस्थान जबलपुर के वरिष्ठ वैज्ञानिक और प्रशिक्षण कार्यक्रम के समन्यवक डाक्टर पवन कुमार राणा ने कही। राणा के सहयोगी नाहर सिंह मावई  टी.एफ.आर.आई. जबलपुर ने भी दुहराया।कार्यक्रम का आयोजन मुख्य वन संरक्षक अनिल सोनी की मुख्य आतिथ्य और डीएफओ बिलासपुर सत्यदेव शर्मा की उपस्थिति में किया गया। 
 
             कार्यशाला का आयोजन मुख्य वन संरक्षक बिलासपुर के सभागार में किया गया। इस दौरान बिलासपुर वन वृत्त के सभी आठ वनमण्डलों से कुल 35 फ्रंटलाइन फिल्ड  स्टाफ और मास्टर ट्रेनर ने शिरकत किया। 
 
                                 फारेस्ट वैज्ञानिक राणा ने बताया कि सागौन पौधों में अक्सर बर्षा प्रारंभ होने से ठंड ऋतु तक कीटों के प्रकोप से पत्ते जालीदार हो जाते हैं। इसे कंकालक रोग कहा जाता है। कुछ पत्तों में पत्तीयों के डंठल ही बचे रह जाते है। कीट के लार्वा पत्तियों को खाते हैं। पत्ती में मात्र मोटे-मोटे डंठल ही रह जाते हैं। इस स्थिति को निष्पत्रक रोग कहा जाता है। इन रोगों का नियंत्रण कीटनाशकों से किया जाना असम्भव है।उष्ण कटिबंधीय वन अनुसंधान संस्थान के बाद जैविक नियंत्रण विधि से मध्य प्रदेश में वनक्षेत्रों के सागौन पौधों में कंकालक और निष्पत्रक रोग पर जैविक विधी से रोग को नियंत्रित किया गया है।
 
                एक दिवसीय कार्यशाला में डाक्टर पवन कुमार राणा ने बताया कि जैविक नियंत्रण के तहत संस्थान ने ट्राईकोकार्ड को  विकसित किया है। एक अण्डा परजीवी कीट प्रजाति ट्राईकोग्रेवा रावी से विकसित किया है। ट्राईकोकार्ड को सागौन प्रजाति के पत्तों में जो पूर्व से रोगी है के शाखाओं में बांध दिया जाता है। सीधे वर्षा से बचाने के लिए इस कार्ड को पत्ते के पीछे बांधा जाता है। ट्राईकोकार्ड में ट्राईकोग्रेवा नामक परजीवी अंडे से अनुकूल परिस्थितियों में बाहर निकल कर नाशी कीटों के अंडों में अंडा देकर उनका जीवन चक्र समाप्त कर देते हैं। ट्राईकोग्रेवा परजीवी अपना जीवन चक्र शुरू कर देता है। इससे सागौन में लगने वाले कंकालक और निष्पत्रक रोग के कीटाणु पूरी तरह नष्ट हो जाते हैं।
 
                कार्यशाला में पहुंचे जबलपुर के वैज्ञानिकों ने बताया गया कि साल में लगने वाले साल बोरर कीट की रोकथाम लिए भी जैविककार्ड विकसित किया गया है। जिसे साल बोरर से प्रभावित बृक्षों में बांध दिए जाने से साल बोरर के कीट का जीवन चक्र समाप्त हो जाता है। दोनों प्रजाति यानि सागौन और साल में रोग नियंत्रणके लिए विकसित जैविक नियंत्रण कीट पेड़ों की बढ़त को बनाए रखने के साथ गुणवत्ता में वृद्धि करता है। छत्तीसगढ़ के वनक्षेत्रों में उपलब्ध साल और सागौन को निरोग रखने के लिए छत्तीसगढ़ राज्य कैम्पा से की जा रही पहल एक महत्वपूर्ण है।

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