मेरा बिलासपुर

शिक्षाकर्मी आंदोलन– 17 साल + 4 सरकार + 22 कमेटियां = 00 परिणाम

teachers_nehru_chowkबिलासपुर– शिक्षाकर्मी 20 नवम्बर से बेमियादी हड़ताल पर है। स्कूलों की पढ़ाई पूरी तरह से ठप हो चुकी है। दो दौर की वार्ता के बाद पुराने अनुभवों को हाजिर नाजिर मानकर एक लाख अस्सी हजार शिक्षाकर्मियों ने शाला बहिष्कार किया। तीन दिनों में ही स्कूलों की पढाई – लिखाई पटरी से उतर गयी। सरकार ने कठोर कदम उठाते हुए तीन दिन में काम पर नहीं लौटने वाले शिक्षाकर्मियों को बर्खास्त करने का फरमान जारी कर दिया है..यह तो होना भी था। देखने वाली बात होगी कि शिक्षाकर्मियों का आने वाला कदम कहां पड़ता है।

                           शिक्षाकर्मियों की मांग और सरकार के बीच संघर्ष काफी लम्बा है। समय  – समय पर शिक्षाकर्मी सड़क पर उतरते रहे। हड़ताल की ताकत पर  कमेटियां भी बनती रहीं। लेकिन आज तक किसी भी कमेटी के सुझाव को पेश नहीं किया गया। कई कमेटियां तो ऐसी बनी..जिनके अध्यक्ष पहले भी कई कमेटियों की अध्यक्षता कर चुके हैं। बावजूद इसके किसी भी कमेटी की रिपोर्ट को सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया। यदि लिया भी तो…उतना ही जिससे शिक्षाकर्मी उम्मीदों पर जिंदा रह सकें।

                  गौरतलब है कि इस बार भी हड़ताल से पहले जब शिक्षा कर्मी संगठन की सचिव  स्तर की बात हुई, इसी दौरान उनकी मुलाकात मुख्यमंत्री से भी कराई गई थी। तब यह खबर भी चली थी कि मुख्यमंत्री ने उन्हे एक कमेटी बनाने की पेशकश की थी। अगर इस हिसाब से कोई कमेटी बनती तो वह 23 वीं कमेटी होती। अब तो यह केवल अनुमान की बात है । लेकिन अगर कमेटियों के पिछले रिकार्ड पर नजर डालें तो पिछली  सभी कमेटियां प्रदेश की चार सरकारों के कार्यकाल में बनाई गयी हैं। इसमें एक सरकार कांग्रेस की है तो तीन भाजपा की ।

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                                छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद पिछले 17 सालों में चार सरकार बन चुकी हैं। पांचवी सरकार किसकी होगी…फिलहाल भविष्य की गोद में है। अनुमान ही लगाया जा सकता है। इन 17 सालों में प्रदेश में एक आंदोलन हमेशा जीवित रहा। जिसका सामना कांग्रेस सरकार IMG-20171122-WA0002के मुख्यमंत्री अजीत जोगी और भाजपा सरकार के मुखिया डॉ.रमन सिंह को हमेशा करना पड़ा है। सत्ता से बाहर रहने वालों ने हमेशा शिक्षाकर्मियों के आंदोलन का समर्थन किया। शिक्षाकर्मियों की मांगो को हमेशा जायज बताया। ताज्जुब की बात है कि सरकार बनाते ही सभी पार्टियों ने पुराने वादों से किनारे करने में देरी नहीं की।

                                                                                   2003 में तात्कालीन भाजपा अध्यक्ष डॉ.रमन सिंह ने वादा किया था कि सरकार बनते ही मात्र 15 दिन में शिक्षाकर्मियों की मांग को पूरा कर दिया जाएगा। कुछ इसी तरह का आश्वासन एक दिन पहले यानी बुधवार को नेहरू चौक स्थित शिक्षाकर्मियों के धरना स्थल पहुंचकर पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने दिया। उन्होने गुरू को प्रथम पूज्य बताया। ऐलान किया कि सरकार बनते ही शिक्षाकर्मियों के पद से कर्मी शब्द  हटाकर सभी मांगो को तत्काल मान लिया जाएगा।

                       एलान के साथ ही लोगों में कानाफूसी शुरू हो गयी। जिसे प्रथम पूज्य बताया जा रहा है…उस पर सबसे पहले पुलिस लाठी अजीत जोगी के शासन में चली। उन्होने तात्कालीन समय लाठी ना चलवाकर मांग को मान लिया होता तो शायद आज 23 वीं कमेटी बनाने की नौबत नहीं आती। क्योंकि पहली कमेटी बनाने का श्रेय भी अजीत जोगी को ही जाता है।

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                                    23 वीं कमेटी बनाने की चर्चा के बीच पिछले 17 सालों में चार सरकारों ने शिक्षाकर्मियों की मांगो को लेकर कुल 22 कमेटियां बन चुकी है। अब तक किसी भी कमेटी की सिफारिशों को लागू नहीं किया गया है। मजेदार बात है कि कुछ अपवादों को छोड़ दें तो किसी भी कमेटी की रिपोर्ट को आज तक सार्वजनिक नहीं किया गया है।

कमेटी बनने का सिलसिला

                    शिक्षाकर्मियों की मांग को लेकर पहली कमेटी जोगी शासनकाल में बनी। 2001 में तात्कालीन शिक्षा मंत्री सत्यनारायण शर्मा की अगुवाई में समान कार्य समान वेतन को लेकर कमेटी का गठन किया गया। दूसरी कमेटी 2002 में ताम्रध्वज साहू की अध्यक्षता में बनायी गयी। तीसरी कमेटी 2003 एमके राउत की अध्यक्षता में बनी। 2003 में ही तात्कालीन चीफ सेक्रेटरी सुयोग्य मिश्रा की अध्यक्षता में चौथी कमेटी बनी। सभी कमेटियों का गठन जोगी शासन काल में हुआ।

                 IMG-20171120-WA0001   2003 में सरकार बदली। प्रदेश को नया मुखिया मिला। शिक्षाकर्मियों ने एक बार फिर सिर उठाया। मुख्यमंत्री डॉ.रमन सिंह ने 2005 में अपर मुख्य सचिव इंदिरा मिश्रा की अध्यक्षता में कमेटी का गठन किया। साल 2006 में तात्कालीन शिक्षा सचिव सुनील कुजूर की अध्यक्षता में फिर एक कमेटी बनायी गयी। सीएम के आदेश पर 2007-08 में प्रमुख सचिव पंचायत पी.जॉय उम्मेन की अध्यक्षता में सातवीं कमेटी बनी। इसी दौरान नंदकुमार की अध्यक्षता में कमेटी बनी। फिर आठवीं नौवी और दसवीं कमेटी का गठन किया गया।

                शिक्षाकर्मियों ने जब-जब आंदोलन को तेज किया। नई कमेटी बना दी गयी। इसी दौरान अपर मुख्य सचिव पंचायत सरजियस मिंज की अध्यक्षता में शिक्षाकर्मियों की मांग को लेकर नई कमेटी का गठन किया गया। साल 2010 में ट्रायवल सचिव मनोज पिंगुआ की अगुवाई में कमेटी बनाई गयी। बाद मेंं वन विभाग अपर सचिव नारायण सिंह की अध्यक्षता में कमेटी बनी। इसके पहले नारायण सिंह रिपोर्ट पेश करते..छुट्टी पर चले गए। नारायण सिंंह के छुट्टी पर जाने के बाद एक बार फिर कमेटी का गठन हुआ…सुनील कुजूर नए अध्यक्ष बनाए गये। पिछली बार की तरह कुजूर ने रिपोर्ट तो पेश किया। लेकिन सुझावों पर आज तक अमल नहीं हुआ।

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                       मुख्य सचिव सुनील कुजूर का प्रमोशन हुआ। शिक्षाकर्मियों की नई कमेटी का अध्यक्ष विवेक ढांढ को बनाया गया। रिपोर्ट आज तक सार्वजनिक नहीं हुई है। इसके बाद चार नई कमेटियां बनायी गयीं। शिक्षाकर्मियों को आज भी नहीं मालूम है कि इन कमेटियों का अध्यक्ष कौन है। रिपोर्ट की जानकारी होना दूर की बात है।     फिलहाल इन कमेटियों को लेकर यह भी चर्चा है कि पिछले 17 सालों में 4 सरकारों ने 22 कमेटियों का गठन किया है। यदि किसी भी कमेटी को गंभीरता से लिया जाता तो…. ना तो हड़ताल की नौबत आती । और ना ही फिर किसी  कमेटी की जरूरत महसूस होती।

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