मेरा बिलासपुर

CG NEWS “भरथरी” नाटक का अद्भुत मंचन…. प्रेम -करुणा और वैराग्य के अनूठे संगम में एक डुबकी !

CG NEWS :बिलासपुर ( रुद्र अवस्थी ) । जिन्होने भरथरी की गाथा पहले से सुन रखी थी….. और जो पहली बार इसे सुन रहे थे , यह कहानी ऐसे सभी लोगों के ज़ेहन में सीधे उतर गई, जब बिलासपुर के सिम्स ऑडिटोरियम में उन्होने भरथरी बैराग्य की गाथा का मंचन देखा। कला अकादमी छत्तीसगढ़ की ओर से आयोजित दो दिवसीय नाट्य उत्सव का समापन  “भरथरी वैराग्य की गाथा” नाटक के साथ हुआ।लोकगाथाओं को सुनते – सुनते बड़ी हुई पीढ़ी ने शायद पहली बार किसी मंच पर भरथरी बैराग्य की कहानी को सुनते – सुनते उसे अपने सामने जीवंत घटते हुए भी देख लिया । रंगकर्मी निर्देशक भूपेंद्र साहू (गरियाबंद ) के निर्देशन में भरथरी नाटक के सभी कलाकारों ने ऐसी प्रस्तुति दी कि पूरा ऑडिटोरियम भावविभोर हो उठा। छत्तीसगढ़ी पारंपरिक गीतों की स्वरलहरियों के बीच प्रेम- करुणा और बैराग्य- संकल्प के अनूठे संगम में डुब़की लगाते हुए शहर के कला – संस्कृति प्रेमी यह भरोसा लेकर भी लौटे हैं कि शहर में ऐसे आयोजन आगे भी होते रहेंगे।

लोक गाथाओं – कहानियों के साथ पीढ़ियों से जुड़ाव रहा है। दादी-नानी के साथ ही लोक गीतों के ज़रिए भी ये गाथाएं लोगों तक पहुंचती रही हैं। लेकिन ऐसा मौक़ा कम ही मिलता है, जब गाथा सुनते – सुनते उसका मंचन भी देखने को मिले । इस मायने में रंग सरोवर के भूपेन्द्र साहू का यह प्रयोग अद्भुत है । जिसमें एक ही मंच पर किस्सागोई के अँदाज़ में गाथा सुनाने वाला भी है,गाथा से तालमेल करते हुए पारंपरिक धुन में गीत भी है…. और गाथा को जीवंत बनाते हुए सजीव मंचन भी साथ -साथ चलता है..। पहला दृष्य ही दर्शकों को अपने साथ जोड़ लेता है,जब मंच पर ठेठ छत्तीसगढ़िया अँदाज़ में एक बुज़ुर्ग से नई पीढ़ी का नाती ( एक बालक ) भरथरी की गाथा सुनाने की चिरौरी करता है और फ़िर दो गायकों द्वारा करुण गीत के माध्यम से कथा आगे बढ़ती है। बालक को कहानी सुनाते हुए बुज़ुर्ग कई बार मंच पर आते हैं और सूत्रधार की तरह गाथा को आगे बढ़ाते रहते हैं।इसके पीछे शायद यह संदेश भी है कि लोकगाथाएं इसी तरह एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक पहुंचती रही हैं।  भरथरी की वैराग्य गाथा पेश करने वाले कलाकारों की यह क़ामयाब़ी है कि आख़िरी सीन में ज़ब़ राजा भरथरी अपनी ही रानी के हाथों भिक्षा लेता है…. तो कहानी का अँत जानने के बाद अपने दादा से कहानी सुन रहा नाती ( बालक ) फूट-फूटकर रोने लगता है ….। और दर्शकों की आँख़े भी नम हो जाती है।भीगी पलकों के साथ दर्शक भी प्रेम-करुणा और वैराग्य संकल्प के इस अनूठे संगम में डुबकी लगा लेते हैं।

सुंदर संगीत – गायन और अभिनय से कलाकारों ने भावविभोर कर दिया।एक संत महारानी की निराशा के बारे में जानकर उसके दुख को दूर करने का आश्वाशन देते है।पूरी कथा बड़े रोचक ढंग से चलती है।रानी की गोद भरने का उत्सव मनाया जाता है।फिर भरथरी वैराग्य की कथा शुरू होती है।हिरण का शिकार,राजा का विवाह,रानी का अलग – अलग रूपों में जन्म और राजा भरथरी का वैराग्य लेने के बाद अपनी रानी से ही भिक्षा लेना… ऐसे कई दृष्य मंच पर से गुजरते हैं । दर्शक पूरे समय मंच के साथ बंधा रहता है ।  भूपेन्द्र साहू ( निर्देशक- रंग सरोवर”भरारी” वैराग्य की गाथा)  ने बताया कि युग आते हैं, युग जाते हैं, पर वे अपने पीछे अपनी निशानी छोड़ जाते हैं । इन्ही निशानियों में होते हैं, लोक साहित्य/लोक गीत और लोक गाथाएं…… जो जन मानस में रच बस जाते हैं, और सदियों तक जीवन्त बने रहते हैं। हमारा छत्तीसगढ़ प्रदेश, देश की मुख्य धारा के साथ जुड़ कर इतिहास के प्रत्येक कालखण्ड में, स्वयं के साक्षीत्व को दर्ज कराते रहा है । यही कारण है कि छत्तीसगढ़ के जन जीवन में सरस लोकगीत, मनमोहक लोक नृत्य और समृध्द लोक गाथाएं हैं । किंवदन्तियों, दंत कथाओं और लोक कल्पनाओं के सतत् प्रवाह के इतर भी कुछ लोक गाथा ऐसे हैं, जो इतिहास के साक्षी रहे हैं। छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक धरातल पर एक ऐसी ही समृध्द लोक गाथा है “भरथरी”…….। जिसमें एक ओर सिसकते दाम्पत्य की विरह वेदना के करुण स्वर हैं, तो दूसरी ओर तपस्या और संकल्पित वैराग्य का प्रसार भाव भी है । भूपेन्द्र साहू बताते हैं कि लोक गाथा “भरथरी देश के अन्य राज्यों में भी अपने पृथक स्वरूपों के साथ विद्यमान है। हमारी प्रस्तुति “भरारी” वैराग्य की गाथा, छत्तीसगढ़ में प्रचलित व मान्य तथ्यों के अध्ययन पश्चात हमारा अपना दृष्टिकोण है। चूंकि छतीसगढ़ में भरथरी गायन शैली में प्रचलित है, रंग सरोवर संस्था, इस भरथरी गायन शैली को पहली बार मंच पर नाटक शैली में प्रस्तुत किया है।

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निर्देशक के बताया कि मंच पर राजा भरथरी की भूमिका में मिथुन खोटे,रानी फुलवा (भरथरी की माँ) भावना वाघमारे,भगवान / गोरखानाथ चन्द्रहास बघेल,रानी सामदेई (भरथरी की पत्नी) योगिता मढ़रिया,रानी रूपदेई (भरथरी की साली) जागेश्वरी मेश्राम / नीलम साहू,कैना जागेश्वरी मेश्राम,चंपा चेरी तनु / नीलम साहू,काला मिरगा / सेउक दीपक कुमार ध्रुव,मिरगिन तनु, निधि, नीलम, योगिता, सिन्धु, जागेश्वरी,कथावाचक (बबा)-त्रेता चन्द्राकर (नाती) – उत्तम साहू,गायन स्वर-राजेन्द्र साहू, गंगा प्रसाद साहू, योगिता मरिया, सिन्धु सोन,वाद्य वृन्द- भारत बघेल, सौरभ साहू, शिवम सेन, चन्द्रभूषण साहू.गीलेश पटेल औऱ मंच के पीछे – मंच सज्जा उत्तम साहू, दीपक ध्रुव, चन्द्राहास बघेल,वेशभूषा एवं हस्त सामग्री-भावना वाघमारे, दीपक ध्रुव,ध्वनि प्रभाव-चेतन साहू,प्रकाश प्रभाव-भूपेन्द्र साहू / लव कुमार साहू.प्रस्तुति व्यवस्थापक-संतोष देशमुख / लव कुमार साहू की प्रमुख भूमिका है।

कार्यक्रम की शुरूआत में कला अकादमी के अध्यक्ष योगेंद्र त्रिपाठी ने स्वागत वक्तव्य में  सभी का स्वागत और आभार ज्ञापित किया।श्रीकांत वर्मा पीठ के अध्यक्ष राम कुमार तिवारी ने कलाकारों का पुष्पगुच्छ देकर स्वागत किया।संस्था ने भरथरी गायिका सुरुजबाई खांडे को श्रद्धांजलि दी ।कार्यक्रम का संचालन सुनील चिपड़े, सुमित शर्मा,श्री कुमार ने किया। कार्यक्रम में बडी संख्या में साहित्यकार, साहित्य प्रेमियों, पत्रकारों, समाजसेवी छात्रों नवांकुरों और  शहरवासियों ने भाग लिया । कला अकादमी ने बिलासपुर में दो दिवसीय नाट्य उत्सव का आयोजन किया । जिसके पहले दिन सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की रचना राम की शक्ति पूजा का प्रभावी मंचन किया गया । दूसरे और अंतिम दिन भरथरी बैराग्य की गाथा का यादगार मंचन हुआ । बिलासपुर के संस्कृति – कला प्रेमियों ने इस आयोजन की बड़ी सराहना की और अपनी हिस्सेदारी भी निभाई। यह प्रतिक्रिया भी सामने आई है कि पहली बार कला अकादमी ने राजधानी से बाहर निकलकर न्यायधानी को भी ऐसे किसी आयोजन के लिए चुना है। इस तरह का आयोजन आगे भी होते रहना चाहिए , जिससे लोग इससे जुड़ सकें और रचनाधर्मिता बनी रहे…..।

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