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Assembly Elections: “खिलाड़ी” बदलने के “खेल” में बीता एक साल…2023 में किसके चमन में आएगी बहार…?

बदल जाए अगर माली चमन होता नहीं खाली
बहारें फिर भी आती हैं बहारें फिर भी आयेंगी…..
(रुद्र अवस्थी)यह गाना 1965 में आई फ़िल्म “बहारें फ़िर भी आएंगी”… का है। साल 2022 की विदाई के समय ये गाना हवा में कहीं गूंजता हुआ सुनाई देता रहा …। कुछ शब्द इधर से उधर हो सकते हैं। लेकिन बीते बरस बहुत से लोगों ने यह गीत गुनगुनाया है। तभी तो यह साल बदलाव का साल हो गया । छत्तीसगढ़ के सियासी बगीचे में कई माली बदल गए । कोई चमन को निहार रहा है…। तो कोई बहारों की उम्मीद कर रहा है । कोई पूरे घर के बदल डालूंगा…. के अँदाज़ में नीचे से ऊपर तक सारी बत्तियां बदलने मे लगा है…। तो कोई सिर्फ़ घर के ड्राइंग रूम की लाइट ही बदलकर संतुष्ट है। इस बदलाव ने किसी को अपने वज़ूद के लिए संघर्ष करने पर मज़बूर कर दिया है …। तो किसी की उम्मीदें बढ़ गईं हैं…..।सियासत की बग़िया में टहलने वाला हर कोई इस बदलाव को महसूस कर रहा है और उसके लिए यह बूझना कठिन नहीं है कि 2022 में जो कुछ बदला गया है , उसके पीछे सिर्फ़ यही उम्मीद है कि 2023 में बहुत कुछ बदलने वाला है।यानी 2022 में जो हुआ है, उसका असर 2023 में भी दिखाई देगा।

बीते बरस 2022 में छत्तीसगढ़ की तमाम सियासी हलचल को एक धागे में पिरोकर देखेंगे तो “बहारें फ़िर भी आएँगी”… फ़िल्म के इस गीत को गुनगुनाते हुए कोई भी अच्छे से समझ लेगा कि किस चमन में माली बदला है… और कहां पर बहारों की उम्मीद नज़र आ रही है..? लोग 2022 को क्यों बदलाव का साल मान रहे हैं यह समझना भी उतना ही आसान है, जितना यह कि सब कुछ 2023 में बदलाव की उम्मीद में किया गया है।

बदलने का यह खेल प्रमुख विपक्षी दल बीजेपी ने पहले शुरू किया । पार्टी ने पहले विष्णु देव साय की ज़गह अरुण साव को प्रदेश अध्यक्ष की क़मान सौंपी । यह भी दिलचस्प है ना कि साय और साव में सिर्फ़ एक ही अक्षर का फ़र्क़ नज़र आता है। लेकिन महज एक अक्षर के बदलाव ने ऊपर के नीचे तक सभी ज़गह पार्टी का पूरा ख़ाका ही बदल दिया । जिसकी झलक साल के जाते- जाते भाजयुमो की नई टीम में भी दिखाई दी ।

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इस एक अक्षर ने कई लोगों के सपने बदल दिए और उनकी सियासत का तरीक़ा भी बदल दिया ।पार्टी ने धरम लाल कौशिक को बदलकर नारायण चंदेल को नया नेता प्रतिपक्ष बना दिया ।बीजेपी ने प्रदेश प्रभारी भी बदल दिए । बीजेपी का आलाकमान लम्बे समय तक इस सवाल का जवाब खोजता रहा कि पन्द्रह साल तक सरकार चलाने के बाद 2018 के विधानसभा चुनाव में पार्टी को जबरदस्त हार का सामना क्यूं करना पड़ा… और देश भर में आगे बढ़ रही भाजपा छत्तीसगढ़ में क्यूं सुस्त नज़र आ रही है..? पार्टी ने नीचे से ऊपर तक बड़ा बदलाव कर यह अहसास करा दिया कि उसे सवालों का जवाब मिल गया है।और पार्टी ने बरसों बरस तक पार्टी की पहचान बने पुराने चेहरों को बदलकर नए चेहरों पर अपना भरोसा जताया है। इसी साल गुजरात के चुनाव हुए और पार्टी को ऐतिहासिक जीत मिली तो यह सवाल भी सियासी फ़िज़ाँ में तैरने लगा कि क्या गुजरात फ़ार्मूला छत्तीसगढ़ में भी लागू किया जाएगा।

ज़ाहिर सी बात है कि बीजेपी 2023 में होने वाले विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने की पूरी तैयारी कर रही है और इसके लिए वह ऐसा रास्ता भी चुन सकती है, जिस पर चलकर उसे दूसरी जगह भी क़ामयाब़ी मिली है । मुमकिन है कि यहां पर गुजरात का फ़ार्मूला पूरी तरह से ना लागू कर कोई ऐसा मिक्स फ़ार्मूला बनाया जाए । जिसमें कुछ पुराने और कुछ नए चेहरों को कमान सौंपी जाए। इस बीच साल के आख़िर में बीजेपी के बड़े नेताओँ की एकाएक सक्रियता बढ़ने और दौरे की शुरूआत से भी संकेत मिल रहे हैं कि पार्टी में वज़ूद बचाने की लड़ाई भी शुरू हो गई है।चुनाव के साल 2023 में यह लड़ाई किस शक्ल में सामने आएगी… अब यह दिलचस्पी के साथ देखा जाएगा। लेकिन आम लोगों के लिहाज़ से छत्तीसगढ़ में बीजेपी को अभी भी ऐसे मुद्दे ( नैरेटिव) की तलाश है, जिसके सहारे वह 2023 के विधानसभा चुनाव में अपनी जीत का रोड मैप लोगों के सामने रख सके।इस लिहाज़ से बीजेपी की कमान संभाल रहे नए चेहरों के सामने एक बड़ी चुनौती नज़र आती है।

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उधर 2018 से छत्तीसगढ़ में सरकार चला रही कांग्रेस पार्टी ने भी एक बदलाव किया औऱ 2018 के चुनाव से पहले प्रदेश के प्रभारी रहे पी.एल. पुनिया की जगह शैलजा कुमारी को नया प्रभारी बना दिया । खैरागढ़ और भानुप्रतापपुर उपचुनाव में जीत भी कांग्रेस के ख़ाते में दर्ज हुई। मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भेंट – मुलाक़ात कार्यक्रम शुरू किया । जिसे कांग्रेस पार्टी के चुनाव अभियान की शुरूआत के रूप में देखा गया ।

सियासी नज़रिए से देखें तो 2022 के साल भी कांग्रेस छत्तीसगढ़ की राजनीति को किसान- खेत- खलिहान और छत्तीसगढ़िया कल्चर के ईर्द – गिर्द रखने में कामयाब रही । इससे जुड़े मुद्दे ही छाए रहे।सरकार के मंत्री टी.एस.सिंहदेव के पंचायत/ग्रामीण विभाग से इस्तीफे और हाल के दिनों में चुनाव लड़ने को लेकर दिए गए बयानों से सियासी माहौल में हलचल ज़रूर हुई है। लेकिन कांग्रेस की सियासत जैसे चल रही थी, वैसे ही चलती रही ।

इस तरह का मुद्दा पिछले कोई दो साल से समय – समय पर सुर्ख़ियों मे रहा है। मगर इस विवाद से अब तक ऐसा कुछ निकलकर नहीं आया है, जिसे नतीजे के कॉलम में दर्ज़ किया जा सके। फ़िर भी ऐसा मानने वालों की भी अपनी दलील है कि जिस तरह भेंट – मुलाक़ात से लेकर बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं की सक्रियता तक कांग्रेस पार्टी की तमाम कोशिशों का असर 2023 में नज़र आएगा। उसी तरह 2022 में समय – समय पर सुर्ख़ियां बटोरने वाले विवाद का भी अपना असर हो सकता है। भानुप्रतापपुर उपचुनाव से सर्व आदिवासी समाज का उभरना और आरक्षण को लेकर चल रही तक़रार भी कहीं- ना- कहीं अपना असर डालेगी । इसके संकेत भी लोगों को मिल रहे हैं।

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राष्ट्रीय स्तर पर 2022 में राहुल गाँधी की पदयात्रा, बिहार में नीतीश – तेजस्वी के साथ आने ,यूपी – उत्तराखंड-गोवा-गुजरात में बीजेपी की जीत, पंजाब-एमसीडी में आम आदमी पार्टी की जीत व गुजरात में दस्तक के साथ ही महाराष्ट्र में शिवसेना के टूटने के घटनाक्रम को सामने रखकर लोग अँदाज़ा लगा रहे हैं कि इन सबका असर 2023 में नज़र आएगा ।

2022 में इस तरह का कोई घटनाक्रम छत्तीसगढ़ में तो सामने नहीं आया। लेकिन कुछ ऐसे बदलाव ज़रूर हुए हैं,जिससे सियासत के मैदान में कई ख़िलाड़ियों की पोजीशन बदल गई है।2023 विधानसभा चुनाव के मैदान में ही इस बदलाव का सही असर समझ में आएगा और तभी इन खिलाड़ियों की असली परीक्षा भी होगी । तब देखेंगे – कौन गुनगुनाता है – “बदल जाए अगर माली, चमन होता नहीं ख़ाली, बहारें फ़िर भी आएंगी….”।

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