VIDEO-बिलासपुर कांग्रेस में शह और मात का खेल…पढ़िए विसात पर कहां हैं-राजा,वज़ीर और प्यादा.. ?

रुद्र अवस्थी।कांग्रेस छत्तीसगढ़ में पिछले 2 साल से सरकार चला रही है। इसके पहले 15 साल तक पार्टी ने प्रदेश में विपक्ष की राजनीति की। सरकार में आने के बाद पार्टी में भी बदलाव की बय़ार का कुछ ऐसा असर  है कि खेमेबाजी जैसी कुछ पुरानी बीमारियां फिर से सताने लगी हैं । लंबे समय तक पार्टी का झंडा उठाने वाले संगठन के लोग एक बार फिर हाशिए की ओर अपना नया रास्ता तलाश रहे हैं।बदलाव की इस हवा के झोंके में यह सवाल भी फ़ड़फ़ड़ा रहा है कि – संगठन के लोगों को अब किसके हिसाब़ से चलना पड़ेगा… ?लेकिन इन सबके बावजूद कांग्रेस संगठन ने एक “अच्छा मैसेज” यह दिया है कि पार्टी में अनुशासनहीनता को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। बिलासपुर में सीएम भूपेश बघेल  के दौरे के समय तंजकशी को लेकर उभरे विवाद के बाद कांग्रेस संगठन ने जिस तरह कदम उठाया है, उससे कुछ ऐसी ही तस्वीर उभर कर सामने आती है। तारीखों का सिलसिला कुछ यूं है कि 4 जनवरी को घटना हुई..8 जनवरी को कमेटी ने आकर जांच भी पूरी कर ली…और  16 जनवरी को अपनी  रिपोर्ट भी सौंप दी । फिर 20 तारीख को फैसला भी आ गया । जिसमें हाल ही में नियुक्त किए गए संगठन के एक ओहदेद़ार  की छुट्टी कर दी गई । तारीख़ पर तारीख़ देने और मामले को पेंडिंग करने के पुराने ढर्रे पर चलने की  बजाय घटना के सिर्फ 16 दिन बाद  मामले का “वारा – न्यारा” कर दिया गया। प्रदेश संगठन के लोगों ने इस मामले में “समय की पाबंदी” पर जोर अधिक दिया और कई दूसरी औपचारिकताओं में बेवजह समय नहीं गंवाया। मसलन झगड़ा शहर कांग्रेस का था।click here to join my whatsapp news group

लेकिन शहर कांग्रेस प्रभारी को न जांच में बुलाया गया और न ही शहर  कांग्रेस के अध्यक्ष से रिपोर्ट मंगाकर बेवजह वक्त जाया किया गया । अलबत्ता जिला ग्रामीण कांग्रेस के प्रभारी को भेज कर तय समय के भीतर सारी रस्म पूरी कर दी गई। दिलचस्प बात यह भी है कि ब्लॉक अध्यक्ष को हटाते समय  इस बात को भी तवज़्ज़ो नहीं दी गई कि उनकी गिनती कांग्रेस के ताक़तव़र   खेमे में होती है। पूरी तरह से “निष्पक्ष – साफ़सुथरी” और “समय सीमा” के भीतर की गई इस कार्यवाही के जरिए  यही संदेश देने की कोशिश की गई है कि कांग्रेस संगठन के कामकाज का तौर तरीका अब बदल गया है और सही रास्ते पर है। लेकिन सरकारी तर्ज पर नोटिस- नोटशीट- इंक्वायरी रिपोर्ट जैसे जुमलो से भरे इस  एक्शन के बीच कांग्रेस संगठन जिस तरह मामले को घर की बात घर के भीतर आपस में सुलझाने की बजाए ठोंक – पीटकर बराबर करने की तैयारी में नज़र आया , उससे यह तो साफ़ हो गया कि सरकार में आने के बाद पार्टी अब ऐसी नहीं रह गई है, जैसी विपक्ष में रहते हुए थी । बदलाव का यह फ़ार्मूला बीसों साल से पार्टी में अपना सब कुछ लगाने वालों को ख़लनायक और पार्टी में गिनती के दिन गुज़ारने वालों को नायक तो बना सकता है।

मगर बदलाव की इस क़वायद में कांग्रेसी ख़ेमों  के बीच की खाई कम होने की बजाय बढ़ती दिखाई दे रही है। बिलासपुर शहर कई दशकों से कांग्रेस की राजनीति के इस “गुणधर्म” का गवाह रहा है और पार्टी को यहां से चुनाव -दर -चुनाव लगातार हारता हुआ देखता रहा है। अब यह पुराना घाव फ़िर से उभरकर अगर नासूर में तब्दील हो जाए तो फिर कांग्रेस को अपने पुराने दिनों की ओर लौटने के लिए इससे बेहत़र और कोई रास्ता नहीं मिल सकेगा।सियासत के मैदान और शतरंज़ की बिसात में समानताएं तो कई हैं। लेकिन एक बड़ा फ़र्क यह है कि शतरंज में प्यादा अगर किसी तरह आख़िरी घर तक पहुंच जाए तो वज़ीर बन जाता है। लेकिन सियासत में किसी प्यादे को मारने के बाद वज़ीर को यह गारंटी कहां मिलती है कि वह सिर्फ़ इस दाँव के भरोसे राज़ा को शह और मात दे सकता है……?

किसानों के मुद्दे पर सरकार को घेरने बीजेपी की रणनीति

बीज़ेपी पन्द्रह साल तक छत्तीसगढ़ मे सरकार चलाती रही । अब विपक्ष में है। सत्ता की कुर्सी से उतरने के बाद पार्टी ने पहली बार सड़क पर आकर बड़ा प्रदर्शन किया । यह प्रदर्शन धान ख़रीदी के मुद्दे को लेकर था और छत्तीसगढ़ के सभी जिला मुख़्यालयों में एक साथ हुआ । बिलासपुर में भी पार्टी ने किसानों के मुद्दे पर सरकार को ललकारने के साथ ही अपनी एकजुटता की भी नुमाइश की  । बिलासपुर जिले में बीजेपी के दो कद्दावर नेता अमर अग्रवाल औऱ धरमलाल कौशिक एक – दूसरे के कंधे से कंधा मिलाकर  ज़िगरी दोस्त की तरह एक ही बैलगाड़ी पर सवार होकर धरना स्थल पर पहुंचे। पार्टी के विपक्ष में आने के बाद सड़क पर यह बड़ा प्रदर्शन था । जिसमें प्रदेश की मौजूदा सरकार पर किसानों के साथ वादाख़िलाफ़ी का आरोप लगाया गया । जिस तरह भूपेश बघेल की अगुवाई में प्रदेश की कांग्रेस सरकार हर एक मामले में किसानों के साथ ख़ड़े होने का दावा करती है । इस दावे को ख़ोख़ला साबित करने की गरज़ से बीज़ेपी ने किसानों के मुद्दे को लेकर सरकार को घेरने की अपनी रणनीति पर काम शुरू कर दिया है। जिससे सत्ता पक्ष के सबसे मज़बूत खंभे पर चोट की जा सके। इस मुहिम मे बीज़ेपी को कितनी कामय़ाबी मिल पाएगी……. ? यह तो आने वाला वक़्त ही बताएगा। लेकिन बिलासपुर जिला मुख़्यालय के इस प्रदर्शन में 6 विधानसभा क्षेत्रों के भाजपाइयों की हिस्सेदारी और प्रदर्शन के दौरान शहर की सड़कों पर भाजपा के झंडों के साथ नज़र आ रही भीड़ से फ़िलहाल पार्टी कार्यकर्ताओँ – नेताओँ का हौसला बढ़ाने में कामय़ाबी ज़रूऱ दिख़ाई दे रही है।

शेल्टर होम कांड के बाद उठ रहे सवाल

शहर के एक शेल्टर होम में महिलाओं के शोषण की खबर को लेकर  न्यायधानी का नाम पिछले हफ्ते सुर्खियों में रहा। यह शेल्टर होम एक एनजीओ की ओर से संचालित किया जाता रहा है। जहां की 3 महिलाओं ने शेल्टर होम में चल रहे दैहिक शोषण और प्रताड़ना का ब्यौरा मीडिया के सामने आकर दिया। इन महिलाओं ने यह भी बता दिया कि पुलिस ने उनकी रिपोर्ट नहीं लिख़ी।  बाद में महिलाओं ने अदालत में भी यही बात दोहराई। इसके बाद मामला दर्ज कर शेल्टर होम के संचालक को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस मामले की आगे जांच कर रही है । जिससे शेल्टर होम को लेकर सही तस्वीर सामने आने की उम्मीद है। जांच में शायद यह बात साफ हो सकेगी कि अब तक शेल्टर होम में क्या चल रहा था और कब से चल रहा था ।  क्या इसके पहले वहां के हालात को लेकर शिकायतें हुई थी और यदि हुई थी तो क्या कार्यवाही की गई थी। हालांकि शेल्टर होम को लेकर जिस तरह से महिलाओं ने मीडिया के कैमरों के सामने अपनी बात रखी है ,उसके बाद से यह सवाल जरूर अस्तित्व में आ गया है कि क्या निर्भया कांड के बाद कानून की सख्ती की चर्चाओं के बीच अभी भी इस बात की गुंजाइश है कि दैहिक शोषण और प्रताड़ना जैसी शिकायतों के बावजूद महिलाओं की रिपोर्ट दर्ज करने में भी देरी हो जाती है। शेल्टर होम की घटना की जांच के साथ ही शायद इस बात का भी खुलासा हो सकेगा ।

राममंदिर के नाम पर फ़र्ज़ीवाड़ा

अयोध्या में राम मंदिर भव्य राम मंदिर बनाने की तैयारी शुरू हो गई है। इसके साथ ही देशभर में लोगों को राम मंदिर निर्माण से जोड़ने के लिए भी अभियान चलाया जा रहा है। इस अभियान के दौरान लोगों से सहयोग – समर्पण भी लिया जा रहा है। जिसके तहत लोगों से सामर्थ्य के अनुसार सहयोग करने की अपील की जा रही है। लेकिन इस माहौल में लोगों से चंदा उगाही की शिकायतें भी मिलने लगी है। ऐसा ही मामला न्यायधानी  में भी सामने आया है। जिसमें श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र समिति के पदाधिकारियों ने सिविल लाइन लाइन थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि एक महिला ने फर्जी बिल बुक और पंपलेट छपवा कर अपने अकाउंट में कई लोगों से चंदा जमा कराया है। पुलिस ने शिकायत दर्ज कर छानबीन शुरू कर दी है। पुलिस की कार्यवाही आने वाले समय में सामने आ जाएगी। लेकिन आस्था के नाम पर इस तरह की वसूली बाजी की शिकायत को गंभीर माना जाना चाहिए। क्योंकि इस तरह की वसूली करने वाले कई जगह सक्रिय हो सकते हैं। आस्था के साथ खिलवाड़ कर मौक़े का फ़ायदा उठाने वालों की हरक़तों को उज़ागर करना इसलिए भी ज़रूरी है , ताकि लोग ऐसे तत्वों की सचाई ज़ान सकें।  

ओपन युनिवर्सिटी की शिकायतों की जाँच

छत्तीसगढ़ के गांधी कहे जाने वाले पंडित सुंदरलाल शर्मा के नाम पर बने बिलासपुर के मुक्त विश्वविद्यालय में चल रही गड़बड़ियों की चर्चा भी सुर्खियों में आ रही है। हाल ही में छत्तीसगढ़ की राज्यपाल अनुसुइया उइके के चकरभाटा दौरे के समय उनके सामने भी यह सवाल उठाया गया। विश्वविद्यालय में आरक्षण और दूसरे नियमों को ताक पर रखकर की गई नियुक्तियों और यूजीसी के मापदंडों की अनदेखी किए जाने के मामले में अब तक हुई कार्यवाही को लेकर सवाल पूछे गए थे ।  जिस पर राज्यपाल ने जवाब दिया है कि मामले की जांच के लिए शासन को लिखा गया है। उन्होंने जांच किए जाने की बात भी कहीं। राज्यपाल के संज्ञान में मामला आने के बाद उम्मीद की जा रही है कि निष्पक्ष जांच के आधार पर कार्यवाही होगी। पंडित सुंदरलाल शर्मा ओपन यूनिवर्सिटी अनियमितताओं की चर्चा पहले भी होती रही है। छत्तीसगढ़ की राजनीति से जुड़े दिग्गज नेताओं से जुड़े कुछ मामले अब भी लोगों को याद हैं। विपक्ष में रहते हुए कांग्रेस भी यहां के मुद्दे उठाती रही है। मुख्यमंत्री बनने के बाद यूनिवर्सिटी के जलसे में शामिल होने आए सीएम भूपेश बघेल ने भी अपने भाषण में यह बात कही थी कि विश्वविद्यालय में अब “मुन्ना मुन्नी” को लेकर सुर्खियां नहीं बनेगी। लेकिन फिर भी यदि शिकायतों का सिलसिला जारी है तो दो ही बातें लगती हैं की या तो शिकायतें फर्जी हैं या सरकार में आने के बाद लोगों ने इसे भुला दिया है। इसमें से कौन सी बात सही है इसे समझने के लिए आने वाले कल का इंतजार करना ही बेहतर होगा।

अवैध प्लाटिंग पर कैसे लगेगी रोक

वक्त बदलने के साथ ही शहर की तरक्की भी हो रही है। लगातार हर साल शहर में नई कॉलोनियां बस यही है और नए मकान खड़े हो रहे हैं। कुल मिलाकर जमीन पर रिहायशी इलाक़े का दायरा बढ़ता जा रहा है। जैसा हर जगह होता है तरक्की में कहीं  नियम – कायद़े  के हिसाब से काम होते हैं तो कहीं नियमों को ताक पर रखकर भी लोग काम कर जाते हैं। इसी तरह नए रिहायशी इलाकों की तरक्की के लिए अवैध प्लाटिंग की शब्दावली प्रचलन में आई है। जाहिर सी बात है कि नियम कायदे के विपरीत जाकर अवैध तरीके से प्लाटिंग के चलते जहां नियमों की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं , वही सरकार को भी रेवेन्यू का नुकसान हो रहा है। इस तरह का कारोबार कैसे फलता फूलता आ रहा है । इस पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है और लिखा जा रहा है। हाल के दिनों में ऐसे अवैध प्लाटिंग के मामलों पर नगर निगम की कार्यवाही की खबरें भी चर्चा में रही।अवैध प्लाटिंग करने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने के मामले में नगर निगम एक बार फिर सख़्ती दिखा रहा है और निगम प्रशासन अपनी दिलचस्पी बढ़ाई है। लेकिन इस तरह की कार्यवाही में भी निष्पक्षता और  सख़्ती के साथ यह भी  ज़रूरी है कि व्यवस्था के ज़िम्मेदार लोग लगातार इस पर नज़र रखें।  जिससे आने वाले समय में अवैध प्लाटिंग पर सही में रोक लग सके।

बिलासपुर की पहचान से जुड़ी वह ख़बर….

बिलासपुर शहर अपनी हरियाली की वजह से भी जाना जाता रहा है।  आज भी उस दौर को  याद किया जाता है जब बिलासपुर की हरियाली लोगों को अपनी ओर ख़ींचती रही ।जिसकी वजह से लोग कहते थे कि बिलासपुर आने वाले ज्यादातर अफसर- कर्मचारी  -व्यापारी – कामगार यही बसना चाहते हैं। इस शहर की कई सड़कें अपने किनारे लगे बड़े- बड़े पेड़ों की वजह से भी पहचानी जाती रही है। लेकिन तरक्की के नाम पर पेड़ों की कटाई ने कई सड़कों की तस्वीर बदल दी है। कुछ ऐसी ही तैयारी देवरीखुर्द ओवर ब्रिज से जगमल चौक के बीच भी चल रही है। जहां सड़क चौड़ीकरण की वजह से बड़ी तादाद में पेड़ काटे जाने का फरमान जारी हो गया है। सड़क किनारे के कई पेड़ छायादार हैं और रास्ते पर चलने वालों को राहत देते हैं। इनकी कटाई रोकने के लिए पर्यावरण प्रेमियों ने हाल ही में जिला कलेक्टर से मिलकर फरियाद की है। उन्होंने अपनी ओर से ऐसे सुझाव भी दिए हैं , जिससे पेड़ों को कटने से बचाया जा सकता है । जिला प्रशासन को इन सुझावों पर जरूर गौर करना चाहिए।प्रतिनिधि मंडल – ज्ञापन – विज्ञप्ति के नाम पर यह ख़बर हो सकता है कि विज्ञापनों के बीच कहीं दब गई हो। लेकिन इस मामले में गौर करने की बात यह भी है कि टेक्नोलॉजी के इस दौर में देश – दुनिया में कई जगह बड़े बड़े पेड़ों को शिफ्ट करने की तकनीक का उपयोग हो रहा है। लेकिन ऐसे में व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों से यह पूछने का मन करता है कि क्या हम भी इतने पीछे हैं कि ऐसी तकनीक अब भी हमारी पहुंच से दूर है…..?   जिससे हम अपने पेड़ों के साथ अपनी पहचान को भी बचाने में नाकाम हो जाते हैं….?  कटने से पहले ऐसे किसी पेड़ के नीचे ठंडी – ठंडी छांव में खड़े होकर ठंडे दिमाग से कभी इस सवाल पर भी गौर करना चाहिए।

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