बिलासपुर की संघर्ष यात्रा का एक और पड़ाव…उधर “हवा-हवाई” श्रेय की लड़ाई…

(रुद्र अवस्थी)बिलासपुर को नियमित हवाई सेवा से जोड़ने के रास्ते में एक और अहम पड़ाव पार हो गया है। एविएशन मंत्रालय ने बिलासा एयरपोर्ट को 3सी लाइसेंस की मंजूरी दे दी है। यह न्यायधानी के जन संघर्ष की जीत है। हालांकि अभी महानगरों से नियमित हवाई सेवा शुरू करने के लिए संघर्ष जारी है। लेकिन जिस तरह से रेलवे जोन से लेकर अब तक अपनी पिछली उपलब्धियों के लिए बिलासपुर के लोगों ने सड़क पर आकर संघर्ष किया, उसी तरह हवाई सेवा के मामले में चल रहे संघर्ष में अब तक कई पड़ाव पार होते रहे हैं। लेकिन लगता है कि अपनी सुविधाओं के लिए सड़क पर चल रही जनता की लड़ाई के समानांतर एक और लड़ाई जनता के नुमाइंदों के बीच चल रही है। यह लड़ाई श्रेय को लेकर है । जिसमें प्रशासन के साथ ही धर्मजीत सिंह जैसे नेताओं ने तो खुलकर कह दिया कि – यह जीत जन संघर्ष की जीत है। लेकिन उंगली कटा कर शहीद होने की तर्ज पर कुछ नुमाइंदे उपलब्धि को अपनी कोशिश का नतीजा बताने में भी लगे हैं। हेड लाइन मैनेजमेंट का भी खेल हमेशा की तरह चल रहा है। यह शहर गवाह रहा है कि करीब ढाई सौ से अधिक दिनों तक हवाई सुविधा जन संघर्ष समिति के बैनर तले तीन सौ से अधिक संगठनों ने धरना दिया है। यह धरना बिलासपुर को महानगरों तक जोड़ने की मांग पूरी होते तक जारी रहेगा ।  यही वजह है कि 3 – सी लाइसेंस मिलने की खुशखबरी के बाद तमाम संगठनों ने धरना स्थल पर जश्न मनाया। बिलासपुर के सांसद अरुण साव ने केंद्रीय मंत्री हरदीप सिंह पुरी से मिलकर इसकी मांग रखी थी। इसी तरह धर्मजीत सिंह ने विधानसभा में भी यह मुद्दा उठाया था।   मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने भी केंद्र सरकार को इसे लेकर कई चिट्ठियां लिखी और 3 सी लाइसेंस मिलने के बाद महानगरों से हवाई सेवा शुरू करने एक बार फिर पत्र लिखा है। जिससे रायपुर हवाई अड्डे के लिए एक वैकल्पिक एरोड्रम के रूप में बिलासपुर का हवाई अड्डा विकसित किया जा सके और उत्तर छत्तीसगढ़ को एयर कनेक्टिविटी दी जा सके। हवाई सेवा संघर्ष समिति के लोगों ने शहीद दिवस के दिन चकरभाठा मोड़ से एयरपोर्ट तक पदयात्रा कर अपना संकल्प दोहराया है। फिर भी अगर जन संघर्ष और धरना प्रदर्शन से दूरी बनाए रखने वाले जनप्रतिनिधि  इसे अपनी उपलब्धि के खाते में दर्ज कर रहे हैं तो यह मान लेना भी सही नहीं होगा कि इस शहर के लोगों ने अपनी आंखें मूंद रखी हैं।इतिहास गवाह है कि इस शहर के लोगों ने अपने हक़ की हर एक लड़ाई जीती है। लेकिन श्रेय की लड़ाई का अँजाम क्या हुआ – इसे भी खंगाल लेना चाहिए।

गोलीकांड में पुलिस की कामयाब़ी

गणतंत्र दिवस के ठीक पहले रात के समय नेचर सिटी – सकरी मेन रोड पर सती श्री ज्वेलर्स में हुए गोलीकांड से न्यायधानी में सनसनी फैल गई थी। लूट की नीयत से आए नकाबपोश लोगों का ज्वेलरी शॉप के संचालक आलोक सोनी ने जिस बहादुरी से मुकाबला किया उससे वे अपने मंसूबे पर कामयाब नहीं हो सके । लेकिन जाते-जाते गोली चला कर आलोक सोनी को जख्मी कर गए। गणतंत्र दिवस के ठीक पहले दिन हुई इस वारदात ने यकीनन बिलासपुर पुलिस के सामने बड़ी चुनौती ख़ड़ी कर दी थी । पुलिस ने भी जितनी तत्परता के साथ इस मामले की छानबीन की उसे भी शाबाशी मिल रही है। पुलिस ने जिस तरह स्पेशल टीम बनाकर मामले में गहरी छानबीन की , उसी का नतीजा है कि वारदात के सिर्फ़ 4 दिन के भीतर ही पुलिस के हाथ नकाबपोशों के गिरेबान तक पहुंच गए। इस बीच कई जनप्रतिनिधियों ने अस्पताल में भर्ती आलोक सोनी से मुलाकात कर हाल-चाल भी पूछा।  बहादुरी के लिए उनकी तारीफ की और इस वारदात के आरोपियों को जल्द से जल्द पकड़ने की उम्मीद पुलिस प्रशासन से की । इसके बाद पुलिस ने भी अपनी तारीफ का एक मौका दिया है। मेन रोड पर सारे शाम गोलीकांड जैसी वारदात से शांतिप्रिय बिलासपुर वासियों  की पेशानी में लकीरें पड़ती हैं। ऐसी वारदातों का रिकॉर्ड समय में खुलासा होना सुकून भी देता है। लेकिन यह बात भी उतनी ही सही है कि पुलिस के सामने से चुनौत़ियां कभी ख़त्म नहीं होतीं। लोग उम्मीद तो यही करते हैं कि ऐसी किसी वारद़ात को होने से पहले ही रोकने का सख़्त इंतज़ाम होना चाहिए ।

उज्जवला होम कांड का सच

उज्जवला होम कांड को लेकर भी खबरें सुर्खियों में रही। एक तो इस मामले में कुछ और लोगों पर कार्यवाही की गई है। साथ ही छत्तीसगढ़ महिला आयोग की अध्यक्ष किरणमयी नायक के दौरे के समय भी यह मामला उठाया गया। महिला आयोग अध्यक्ष ने इस मामले में महिलाओं से भी बात की ‌। इसके बाद महिला आयोग अध्यक्ष ने भी माना कि उज्जवला होम को लेकर जो बातें कही जा रही हैं वह पूरी तरह से मनगढ़ंत नहीं है । कहीं ना कहीं सच्चाई तो जरूर है। उनका यह भी कहना था अभी तक सब कुछ पूरी तरह से साफ नहीं हुआ है। लेकिन जांच पड़ताल में सही स्थिति सामने आने की उम्मीद सभी कर रहे हैं। जिससे इस घटना के जिम्मेदार लोगों के खिलाफ कार्यवाही हो सके।

अधूरी सुविधाओँ की पहचान

दिन, हफ्ते ,महीने, साल- कैलेंडर और दशक बदलते रहते हैं। इनके साथ ही शहर में भी बदलाव की उम्मीद बनी रहती है। लेकिन बिलासपुर के ईयर प्लान में अधूरे ढांचों का वजूद हमेशा बरकरार रहता है। साल दर साल, दशक दर दशक कितने भी बदलाव आए हैं ।  लेकिन बिलासपुर की फितरत में शायद अधूरी सुविधाओं के साथ अधूरी जिंदगी जीते रहने  की खासियत बदलती हुई कभी दिखाई नहीं देती। शहर में कई सड़कें ,कई इमारतें ,पुल ,ओवर ब्रिज इसके सबूत है कि अधूरापन किसी पल भी बिलासपुर का पीछा नहीं छोड़ता। शहर के तरक्की की पीठ पर सवार अधूरेपन यह बोझ़ लोग बरसों से उठा रहे हैं। अंडर ग्राउंड सीवरेज को तो लोगों ने अब अधूरेपन का महाकाव्य मानकर उसे पढ़ना ही छोड़ दिया है। लेकिन तिफरा फ्लाईओवर और व्यापार विहार रोड जैसे निर्माण कार्य उधर से गुजरने वाले हर एक शख्स को हर बार बिलासपुरिया होने का एहसास कराते रहते हैं।  न्यायधानी के लोग इस सवाल का जवाब बरसों से तलाश रहे हैं कि क्या आधुनिक युग में जब टेक्नोलॉजी के भरोसे चंद दिनों में बड़े से बड़े ढांचे तैयार हो सकते हैं । तब भी बिलासपुर में छेनी हथौड़ी के भरोसे ही ठुक- ठुक करते हुए छोटे – बड़े हर तरह के काम होंगे। मजेदार बात यह भी है कि बड़ी तकलीफ के साथ रोज रोज ऐसी जगहों से गुजरने वाले लोगों को  कुछ – कुछ दिनों के बाद खबरें मिलती रहती हैं कि प्रशासन ने काम जल्दी पूरा करने के लिए फटकार लगाई है।  अल्टीमेटम दिया है और काम कर रहे लोगों को चेतावनी दी है। लेकिन ऐसी कई तारीख पर तारीख गुजरती जाती है। रो – धोकर किसी तरह खींचते हुए काम पूरा होता है । उद्घाटन का जलसा होता है ।  फीता काटा जाता है।  भाषण बाजी होती है । फिर कुर्सियां उठा ली जाती हैं।शहरवासी भी ताली बजाकर सुख को पा लेते हैं। और बरसों तक उठाई गई तकलीफ भी भुला देते हैं। न देने वाले सोचते हैं और न  लेने वाले सोचते हैं कि किसी 10 वें जन्मदिन का तोहफा 20 वें जन्मदिन पर मिले तो कैसा लगता होगा। जन्मदिन पर तोहफे का यह नया अंदाज ही अब इस शहर की पहचान के रूप में शामिल हो गया है। इस पहचान को अब ना शहर के नेता मिटाना चाहते हैं और ना अफसर….. ?

युनिवर्सिटी के पर्चें में एक अनिवार्य प्रश्न

किसी महापुरुष के नाम पर कोई संस्थान खोलकर यदि वहां  गड़बड़झाला – भ्रष्टाचार का खेल चलाया जाए तो क्या उस महापुरुष का नाम खराब नहीं होगा या उसके नाम के नीचे उस संस्थान का सारा काम छुप जाएगा। यह सवाल किसी परीक्षा में पूछा गया सवाल नहीं है। लेकिन लगता है कि पूरे छत्तीसगढ़  के दायरे में जिस यूनिवर्सिटी का काम फैला है उस यूनिवर्सिटी के मैनेज़मेंट से ही ऐसे सवाल पूछे जाने चाहिए और इस सवाल का जवाब देना अनिवार्य भी कर देना चाहिए । कभी किसी रसूख़दार की पत्नी के नाम पर साली परीक्षा में बैठ जाए …….. ऐसी खबर सुर्खियों में आए और फिर अनियमितताएं दर अनियमितताएं चलती रहे । इसके बावजूद कोई कार्यवाही ना हो तो लगता है कि व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों को जगाने के लिए ऐसा कोई उपाय किया जाना चाहिए कि यूनिवर्सिटी का ही यह सवाल वहां के पर्चे में शामिल हो जाए । छत्तीसगढ़ के ऐसे ही मनीषी पंडित सुंदरलाल शर्मा के नाम पर बने ओपन यूनिवर्सिटी में चल रहे खुले खेल की चर्चा हाल ही में राज्यपाल के दौरे के समय हुई थी। फ़िर बिलासपुर में ध्वजारोहण करने आए प्रदेश के उच्च शिक्षा मंत्री उमेश पटेल के सामने भी यूनिवर्सिटी को लेकर कुछ ऐसा ही सवाल उठा । उन्होने भी माना कि यूनिवर्सिटी में भ्रष्टाचार का आरोप गंभीर है । इसकी जांच कराई जाएगी। लेकिन सौ में सौ नंबर वाले इस सवाल का यह जवाब अगर संतोषजनक है तो फ़िर रिज़ल्ट और मार्कशीट पर यही दिखना भी चाहिए। जाँच भी हो और कार्रवाई भी हो। लेकिन कहानी वही ना रह जाए कि छिपकली कई छोटे-मोटे कीड़े मकोड़ों को अपना शिकार बना कर किसी महापुरुष की तस्वीर के पीछे छिप जाती है।

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