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CG NEWS:क्या अब CIMS के लिए वीआईपी नहीं रहे राज्य मानसिक चिकित्सालय से आए मरीज…. ?

CG NEWS:बिलासपुर (मनीष जायसवाल) । छत्तीसगढ़ राज्य मानसिक चिकित्सालय सेंदरी से रिफर किये हुए मरीज को सिम्स में कभी महत्वपूर्ण यानी वीआईपी मरीज माना जाता था..! अब सिम्स में छाई अव्यवस्था ने हालात बदल दिए है। लेकिन फिर भी उम्मीद की किरण के रूप में जिला प्रशासन के प्रयास से सेंदरी से रिफर इन वीआईपी मरीजों के अन्य बीमारियों के इलाज के लिए सिम्स के रेजिडेंट डाक्टर सहित जूनियर डॉक्टर और पैरा मेडिकल स्टाफ जूझते हुए दिखाई जरूर देते है..!लेकिन सिम्स प्रबंधन और मनोरोग विभाग यहां पर अन्य बीमारियों के इलाज के लिए रिफर हो रहे मानसिक रोगियों और उनके परिजनों की समस्या घटाने की बजाय बढ़ाते हुए दिखाई दे रहे है। यहां रिफर हुई महिला और पुरुष मनोरोगी सिम्स के अन्य जनरल वार्ड में परिजनों की नजर और भगवान के भरोसे है ..! रिफर हुए मनोरोगी के उपचार के दौरान सुरक्षित वातावरण यहां नही दिखाई देता है..। सिम्स की अव्यवस्था की वजह कही पर्दे के पीछे चल रही वर्चस्व की लड़ाई तो नही जिसका खामियाजा मरीज और इनके परिजन उठा रहे है।

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देश में मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम, 2017 लागू है। लेकिन इसका पूर्ण रूप से क्रियान्वन सिम्स के सिस्टम में जमीनी स्तर पर होता हुआ नही दिखाई दे रहा है।सिम्स में छत्तीसगढ़ राज्य मानसिक चिकित्सालय सेंदरी से रिफर किए मरीजों के साथ गोपनीयता नही बरती जा रही है। इन्हे आम मरीजों के साथ रखा जाता है..! मानसिक रोगी सिम्स के अन्य जरनल वार्ड में वह अपने असंयमित व्यवहार की वजह से चर्चा का विषय होता है..! जिससे उसकी पहचान सार्वजनिक होने का खतरा भी बढ़ जाता है..।

मानसिक स्वास्थ्य देखभाल अधिनियम 2017 के तहत मानसिक रोगी को गोपनीयता का अधिकार भी मिला हुआ है। इस अधिनियम के अनुसार मानसिक रूप से बीमार व्यक्ति को उसके मानसिक स्वास्थ्य, मानसिक देखभाल, इलाज और शारीरिक देखभाल के संबंध में गोपनीयता बनाये रखने का अधिकार है। इसमें मानसिक बीमारी के संबंध में सूचना जारी किये जाने पर भी प्रतिबंध है। सिम्स प्रबंधन और यहां का मनोरोग विभाग सेंदरी से रिफर मरीज खास कर महिला मनोरोगियों के हिस्से में एक बड़ी अनहोनी की आशंका को बढ़ा दिए है।

व्यवस्था के नजरिए से देखा जाए तो सिम्स में मानसिक रोग के मरीजों को भर्ती करने के लिए सिम्स में मनोरोग वार्ड भी है..। जहां पर सिम्स ओपीडी से भर्ती मरीज या आकस्मिक रूप से सिम्स में भर्ती किए गए मनोरोगी मरीजों का इलाज होता है।यहां पर मरीज की परिस्थितियों के आधार पर अन्य बीमारियों का भी इलाज संभव हो सकता है। लेकिन मनोरोग विभाग के प्रमुख रिफर मनोरोगियों के अन्य बीमारियों के इलाज के लिए अपने वार्ड में रखने या भर्ती करने तक के लिए मरीज से कन्नी काटते नजर आते है।

मनोरोगी और उनके परिजनों की कई समस्याएं है कई किस्से है। जिसमे एक मुख्य सूत्र यह भी निकल कर आता है कि मानसिक रोगी के इलाज से पहले मानसिक रोगी में और भी अन्य जो बीमारियां है उसे पहले इलाज कर दूर किया जाए..! उसके बाद उसका पूर्ण मानसिक इलाज शुरू किया जाए..! ऐसी स्थिति में रोगी का परिजन सेंदरी , सिम्स और इनके मेडिकल वार्ड के चक्कर लगाते हुए हिम्मत हार जाता है..! रही सही कसर रोगी के द्वारा परिजनों को घर से अस्पताल में भर्ती कराने नाम पर अस्पताल में ही रोगी की ओर से किए जाने वाले व्यवहार से परिजन पूरी तरह टूट जाता है …।क्योंकि रोगी के परिजन मनोरोगी को उसके आक्रमक ,अनियमित व्यवहार की वजह से राज्य मानसिक चिकित्सालय सेंदरी बिलासपुर में भर्ती करते है।

इसका सार कुछ ऐसा भी माना जा सकता है कि अव्यवस्थाओं की वजह से मनोरोगी का परिवार खुद प्रताड़ित न हो जाए इसलिए यहां पर इलाज़ के नाम पर भर्ती हुए मनोरोगी के अधिकांश परिजन मनोरोगी को दोबारा भूल कर भी यहां लाने की कोशिश नही करते होंगे ..! वे रोगी से पीछा छुड़ाना चाहते हैं । यही वजह है कि अस्पताल से छुट्टी होने के बाद मनोरोगियों की स्थिति में सुधार नहीं होता। स्थिति गंभीर होने पर रोगी को राम भरोसे छोड़ दिया जाता है। जिससे इलाज के अभाव में मनोरोगियों की संख्या बढ़ती जा रही है। शायद बहुत से मामलों में अक्सर मनोरोगी सड़को पर ऐसी परिस्थितियों की वजह से दिखाई देते रहते है।

लब्बोलुवाब यह है कि छत्तीसगढ़ आयुर्विज्ञान संस्थान बिलासपुर सिम्स में डॉक्टर, जूनियर डॉक्टर स्टाफ नर्स सहित तमाम पैरा मेडिकल स्टाफ जोश और जुनून के साथ जूझता हुआ काम तो कर रहा है। इनकी मेहनत इमरजेंसी और कुछ वार्ड में देखी जा सकती है ..! उसके बाद भी यहां का सिस्टम यहां पर रंगाई पुताई , उपकरण खरीदी और कागजों की व्यवस्था तक ही सीमित होता दिखाई देता है..! जिला प्रशासन के दखल से व्यवस्था के ज़िम्मेदार लोगो का सुधार यहां हो तो रहा है। लेकिन आंतरिक व्यवस्था और यहां की कार्यप्रणाली पर उनका ध्यान नहीं जाता।जिसकी वजह से मानसिक बीमारियों से पीड़ित लोगों की सुरक्षा और इलाज के लिए जो बहुत ही प्रोग्रेसिव कानून बना उसका प्रभाव यहां रिफर हुए मनोरोगियों के लिए कम हो जाता है। मनोरोगी मरीज और उसके परिजन मेडिकल विभाग के चक्कर काटते काटते हुए त्रस्त हो कर इस अस्पताल और मनोरोगी के इलाज से दूर होते हुए दिखाई दे रहे है। जो चिंता जनक है।

                   

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