VIDEO-धरमलाल कौशिक ने ऐसा क्या कह दिया कि “श्रेय की उड़ान” में सबसे ऊपर निकल गया BJP का हवाई जहाज

(रुद्र अवस्थी)बिलासपुर शहर की वर्षों पुरानी मांग अब जाकर पूरी हो सकी है। यह शहर भी अब देश के हवाई नक्शे में जुड़ गया है। इस बहुप्रतीक्षित शुरुआत के साथ ही जनता के नुमाइंदों के बीच श्रेय की होड़ भी लोगों ने देखी। हालांकि श्रेय की होड़ में शामिल सभी ने यह बात मानी कि यह बिलासपुर की बहुत पुरानी मांग थी और लोगों ने इसके लिए अपनी लड़ाई खुद लड़ी। फिर भी देरी क्यों हुई….?   इस सवाल पर करीब सभी खामोश रह गए। उनकी ओर से इस सवाल का भी जवाब आना था कि बिलासपुर वासियों को अगर अपनी तरक्की से जुड़ी इस सुविधा के लिए बरसों तक इंतजार करना पड़ा और यह शहर तरक्की की दौड़ में बरसों पीछे चला गया तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है या कौन था …. ? क्या इस देरी के लिए जिम्मेदार लोगों को यहां के लोगों से माफी नहीं मांगनी चाहिए। खैर मौजूदा हालात में सियासतदानों से इस तरह की उम्मीद भी नहीं की जा सकती। बहरहाल श्रेय की इस होड़ के बीच हवाई सेवा के उद्घाटन जलसे के दौरान छत्तीसगढ़ विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष धरमलाल कौशिक की ओर से कही गई यह बात गौर करने लायक है कि अटलजी के प्रधानमंत्री रहते बीजेपी की सरकार ने ही बिलासपुर में रेलवे जोन बनाया।बीजेपी की सरकार ने ही छत्तीसगढ़ राज्य की सौगात दी । जिससे बिलासपुर में हाईकोर्ट की स्थापना हो सकी। अब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बीजेपी सरकार ने ही हवाई सेवा की शुरुआत कराई है। इसी तरह उद्घाटन के जलसे में वीडियो कांफ्रेंसिग के ज़रिए ज़ुड़े केन्द्रीय विमानन मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने भी जिस तरह बिलासपुर की हवाई सेवा के लिए पूर्व सीएम डॉ. रमन सिंह और मैजूदा सांसद अरुण साव का नाम ख़ास तौर से लिया उस पर भी लोगों ने गौर किया ।  सौगातों की यह फेहरिस्त खुद बयान कर रही है कि श्रेय की इस होड़ में अगर इस शहर के आम लोगों को नंबर देना हो तो सबसे ऊपर किसे रखना चाहिए…… ?

बिलासपुर में निज़ाम बदला…… और नाम बदला……ख़ोदापुर से गड्ढापुर

बहुत तो नहीं …..लेकिन थोड़ा वक्त तो बीत चुका है ,जब बिलासपुर को खोदापुर का नाम दिया गया था। माउथ पब्लिसिटी में यह जुमला इतनी तेजी से वायरल हुआ कि 2018 के चुनाव में यह भीतर ही भीतर बड़ा मुद्दा बन गया। लोगों को यह मानने में कोई गुरेज नहीं है कि सीवरेज की खुदाई और बिना टाइम टेबल बेतरतीब इसे चले सीवरेज प्रोजेक्ट की वजह से चुनाव के नतीजों पर भी असर पड़ा और  दो दशक के लंबे इंतजार के बाद यहां कांग्रेस का परचम लहराया। दिलचस्प पहलू यह है कि जिस सीवरेज प्रोजेक्ट के नाम पर बिलासपुर को ग्रेडेशन के समय स्मार्ट सिटी की फेहरिस्त में शामिल कराने में बड़ी मदद मिली । वहीं सीवरेज प्रोजेक्ट अपने अधूरेपन – साइड इफ़ेक्ट और मुसीबतों का नासूर बनते –बनते सत्ता पक्ष की हार का सबब बन गया। बाहरहाल साल 2018 के आखिरी दिनों से लेकर अब तक लोग उम्मीद बांधे हैं कि बिलासपुर का निज़ाम बदला है तो ख़ोदापुर का नाम भी बदलेगा……..। अब कोई तो ब्लैकबोर्ड पर ऐसा डस्टर चलाएगा ज़िससे  शहर के नाम से जुड़ गया ख़ोदापुर का विशेषण  मिट जाएगा । समय-समय पर न्यायधानी से राज़धानी तक इसे लेकर बहस भी होती है…… ।  जांच की भी बात होती है और जिम्मेदार ठहराए जाने के लिए चेहरे की भी तलाश होती है। पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल ने भी इस पर खुलकर अपनी बात रखी है । उन्होंने न्यायिक जांच कराने की भी बात कही। लेकिन यह सवाल भी उठा दिया है कि अमृत मिशन के गड्ढे कब भरे जाएंगे। शहर में खोदने का सिलसिला तो अब भी बदस्तूर ज़ारी है। लेकिन गड्ढे भरने के मामले में सिस्टम का ढर्रा वही पुराना है। ऐसे में कोई अगर शहर के नाम पर से ख़ोदापुर को साइन बोर्ड हटा भी देगा तो उसे खूंटी पर फिर से गड्ढापुर की तख्ती लगानी पड़ेगी। नाम तो बदलेगा…….।  लेकिन हाल – फिलहाल पर्यायवाची से ही काम चलाना पड़ेगा। ऐसे में यही मान लेने में तशल्ली होगी कि स्मार्ट सिटी का स्मार्ट चेहरा सामने आने में अभी वक्त का और इंतजार करना पड़ेगा….. ।

गौरेला – पेण्ड्रा – मरवाही….. नए जिले को कद्दावर नेतृत्व की तलाश

बिलासपुर से अलग कर गौरेला- पेंड्रा- मरवाही को नया जिला बनाया गया है। इस नए जिले ने हाल ही में अपनी पहली सालगिरह भी मना  ली है। लेकिन  इस नए जिले में शामिल इलाके का भला चाहने वाले लोगों के मन में नेतृत्व की कमी का एहसास होने लगा है। नए जिले में शामिल गौरेला -पेंड्रा -मरवाही इलाके में राजनीतिक जागरूकता हमेशा से ही रही है। यहां अब भी सियासत को समझने वाले लोग हैं और सियासत पर इतनी बारीक नजर रखते हैं कि आम आदमी की जुबान से निकले दो वाक्यों के मायने निकालने में कई दिन लग जाते हैं। राजनीतिक रूप से सजग इस इलाके में अतीत का दौर काफ़ी समृद्ध रहा है और  इतिहास के पिछले पन्ने सक्षम नेतृत्व के साथ भरे हुए हैं।अविभाज़ित मध्यप्रदेश में विधान पुरुष कहे ज़ाने वाले मथुरा प्रसाद दुबे जैसे  नेता लगातार इस इलाक़े से ही चुनकर जाते रहे । अविभाजित मध्य प्रदेश के सर्वमान्य दिग्गज आदिवासी नेता भंवर सिंह पोर्ते भी इसी इलाके से नुमाइंदगी करते रहे। सर्वोदय से लेकर संसदीय कार्य तक हर क्षेत्र में अपनी विद्वता और काबिलियत का परचम लहराने वाले राजेंद्र प्रसाद शुक्ल भी इसी इलाके से चुनकर आते रहे। जो अविभाजित मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी विधानसभा के स्पीकर रहे। इस इलाके से नुमाइंदगी करने वालों में बड़ा नाम अजीत जोगी का भी है ।  जो छत्तीसगढ़ के पहले मुख्यमंत्री बने और मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद मरवाही सीट से उपचुनाव में जीत हासिल की। वक्त का पहिया घूमता रहा और विधि के विधान ने इन तमाम दिग्गजों को हमेशा के लिए छीन लिया। ये बड़े नाम गौरेला- पेंड्रा -मरवाही के साथ लंबे अरसे तक जुड़े रहे। हालांकि तब इस इलाके को जिले का दर्जा हासिल नहीं हुआ था। लेकिन सियासत की लंबी फेहरिस्त में इन दिग्गजों का नाम सबसे ऊपर की लाइन में शामिल होता रहा। आज इस इलाके  ने जिले का दर्जा हासिल कर लिया है।अज़ीत ज़ोगी के निधन के बाद ख़ाली हुई मरवाही सीट का उपचुनाव हाल हीं में कांग्रेस ने जीत भी लिया है।  मगर अब इस इलाक़े को इतिहास में दर्ज इन बड़े नामों की तरह नए नाम की तलाश है। जिससे बरसों की उपेक्षा से बाहर आकर इस इलाके को तरक्की की नई रफ्तार दी जा सके ।अमरकंटक की तराई से सटे – जंगल, पहाड़ और नदियों से घिरे इस इलाके को कुदरत ने ख़ूब दिया है। लेकिन नेतृत्व को लेकर बने ख़ालीपन – जिसे अंग्रेज़ी में वैक्यूम कहते हैं…. उसकी भरपाई की छटपटाहट भी उस इलाके के सजग सियासतदानों में नजर आने लगी है ।उनक़े चेहरों पर पढ़ा जा सकता है कि “ अँकलों ” का किरदार निभा रहे नेताओँ के भरोसे फ़िलहाल कदमताल करने पर मज़बूर हैं। लेकिन इस इलाके के लोगों को पिता के साये की तरह मज़बूत -कद्दावर नेतृत्व के छाते की छाँव कब तक़ मिल पाएगी यह सवाल आने वाले वक्त पर छोड़ना ही बेहतर होगा।

आख़िर सरकार के बज़ट से हताश क्यूं हैं… सरकारी कर्मचारी…….  ?

छत्तीसगढ़ की मौजूदा कांग्रेस सरकार जन घोषणा पत्र के जिन वादों के सहारे सत्ता में काबिज हुई थी , उसमें प्रदेश सरकार के कर्मचारियों की बेहतरी के लिए भी बहुत कुछ शामिल किया गया था। इनमें से कितने वादे पूरे हो सके । इसका अंदाजा सरकार में बैठे लोगों के सोशल मीडिया अकाउंट पर कमेंट बॉक्स में दर्ज होने वाले शब्दों को पढ़कर लगाया जा सकता है। जिसमें करीब करीब सभी लोग सरकार को उनके दो – ढाई साल पुराने वादों को अक्सर याद कराते रहते हैं। फ़िर भी कुछ बेहतर होने की उम्मीद बांधे सरकारी कर्मचारियों को सरकार के मौजूदा बजट से भी हताशा हुई है। कर्मचारी उम्मीद कर रहे थे कि बढ़ती महंगाई के इस दौर में महंगाई भत्ते में बढ़ोतरी के साथ ही दो साल से बकाया एरियर्स के पेमेंट का भी जिक्र होगा। छत्तीसगढ़ में कर्मचारियों का महंगाई भत्ता दो साल से रुका हुआ है। इसी तरह सातवें वेतनमान के एरियर्स का भुगतान भी दो साल से नहीं हो पाया है। सातवें वेतनमान के एरियर को लेकर छत्तीसगढ़ की पूर्ववर्ती डॉ रमन सिंह की सरकार ने आदेश जारी भी कर दिया था। इसका पेमेंट अब तक पेंडिंग है। नए बजट के जरिए छत्तीसगढ़ की सरकार ने प्रदेश के किस तबके के लोगों को राहत दी है और विकास  के नए रास्ते खोलने का संकेत दिया है। इस पर सत्ता और विपक्ष की अपनी- अपनी प्रतिक्रियाएं सामने आई है। लेकिन कोरोना काल में सरकार के कामकाज को पूरी तरह से दुरुस्त करने में लगे कर्मचारियों को कोरोना काल के इस बजट को देखकर लग रहा है कि उनकी लगन और मेहनत का हिसाब लगाने में सरकार कहीं ना कहीं चूक कर रही है।ज़ाहिर सी बात है कि इससे कर्मचारियों के बीच असंतोष बढ़ेगा और कर्मचारी संगठनों की ओर से जिस तरह की प्रतिक्रियाएं सामने आ रहीं हैं उससे आने वाले समय में इसकी झलक  सड़कों पर दिखाई दे तो हैरत की बात नहीं होगी।

सरकारी स्कूलों में कैसे घट सकते हैं टीचर के पोस्ट

छत्तीसगढ़ सरकार शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने के लिए इंग्लिश मीडियम के सरकारी स्कूल खोल रही है। अब तक प्रदेश में सरकारी इंग्लिश मीडियम स्कूलों की गिनती डेढ़ सौ से अधिक पहुंच गई है। सभी ने इसे बेहतर पहल के रूप में देखा है। और लोग उम्मीद कर रहे हैं कि इससे समाज के कमजोर तबके के बच्चों को इंग्लिश मीडियम में पढ़ाई करने का मौका मिल सकेगा। शुरुआत की वजह से इस मामले में दिक्कतें भी हो सकती हैं और कई तरह की खामियां भी गिनाई जा सकती हैं। सरकार की इस पहल का नतीजा क्या होगा इसके लिए आने वाले वक्त का इंतजार करना ही बेहतर है ।लेकिन सरकार की इस पहल से शिक्षा विभाग में बरसों से अपनी सेवाएं दे रहे शिक्षकों पर को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसकी एक वजह यह भी है कि पुराने हिंदी माध्यम के यू – डाइस पर नए अंग्रेजी इंग्लिश मीडियम स्कूल खोलकर इन पुराने स्कूलों के स्वीकृत पद समाप्त किए जा रहे हैं। एक रिपोर्ट के मुताबिक फिलहाल छत्तीसगढ़ में प्रिंसिपल और हेड मास्टर के 171 ,लेक्चरर के 18 81 और शिक्षक के 1026 पदों के साथ ही दूसरे कर्मचारी संवर्ग के पद समाप्त किए जा रहे हैं। नए इंग्लिश मीडियम स्कूलों में संविदा के नाम पर नई भर्तियां तो की जा रही हैं ।लेकिन जाहिर सी बात है कि इतनी संख्या में पद समाप्त होने से आने वाले समय में इन स्वीकृत पदों पर पक्की भर्ती नहीं हो पाएगी। साथ ही बरसों से अपनी सेवाएं देते हुए प्रमोशन के लिए अपनी बारी का इंतजार कर रहे शिक्षकों को प्रमोशन का अवसर मौका नहीं मिल सकेगा। वैसे भी इस मामले में जानकारों का मानना है कि आज के दौर में नए पद मंजूर कराना वित्त विभाग से नए पद मंजूर कराना कितना दुरूह और कठिन काम है। ऐसे में पहले से मंजूर पद समाप्त करने से लोगों को बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। इससे लगता है कि सरकार ने एक तरफ इंग्लिश मीडियम स्कूल की शक्ल में एक नई सौगात की तरह कमजोर तबके के बच्चों को इंग्लिश मीडियम में पढ़ने का मौक़ा मुहैया कराने की कोशिश तो कर दी। लेकिन सालों साल बच्चों की पढ़ाई में अपना सबकुछ लगाने वाले गुरुजनों के आगे बढ़ने का मौका हमेशा के लिए हाथ से निक़ल भी सकता है।

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