अब ऐसे बेनक़ाब हो रहे हैं घूसख़ोर… आप भी हिम्मत कीजिए..!सिस्टम को लेना पड़ेगा एक्शन

बिलासपुर(रुद्र अवस्थी)।स्कूल के दिनों में हिंदी कक्षा का निबंध लेख़न पाठ सभी को याद होगा….। ज़िसके पर्चे में यह सवाल इंपार्टेंट माना जाता था और अक्सर दोहराया भी जाता था कि – “विज्ञान वरदान या अभिशाप..” विषय पर एक निबंध लिखो। निबंध के सवाल पर हमेशा दो चार विकल्प भी होते थे…। जैसे मेरा स्कूल, गाय वगैरह…। इस निंबंध का क़ुल ज़मा यही सार निकलकर आता रहा है कि विज्ञान का अगर सही इस्तेमाल यानी सदुपयोग किया ज़ाए तो यह वरदान है। और अगर बेज़ा इस्तेमाल यानी दुरूपयोग किया जाए तो यह अभिषाप है। इतनी लंबी भूमिक़ा बांधने का कुल ज़मा मतलब़ यही है कि आज़ के दौर में अगर इंटरनेट और सोशल मीडिया को कई साल पुराने निबंध क़ी लाइन में रख़कर देख़ें तो लगता है कि इसके बारे में भी विज्ञान वरदान या अभिशाप जैसा निबंध लिखा जा सकता है। यानी इसे भी सदुपयोग पर वरदान और दुरूपयोग पर अभिशाप साबित किया जा सकता है।

अब पढ़िए…..अगर कोई निबंध लिखे तो शायद ऐसा भी लिख़ा जा सकता है…। इंटरनेट और सोशल मीडिया हमारे युग का एक ऐसा साधन है जिसमें कोई तार नहीं होता । तार के बिना भी यह हज़ारों- लाख़ों मील दूर तक संदेश भेज सकता है। इंटरनेट का संज़ाल कुछ इस तरह से फैला हुआ है कि आम आदमी को इसका कोई ओर-छोर कहीं भी दिखाई नहीं देता । वह कई बार ख़ुद को इसमें उलझा हुआ पाता है तो कई बार इसी संजाल में से उसे उलझन से बाहर आने का रास्ता भी ख़ोज़ लेता है। इंटरनेट पहले तो केवल कंप्यूटर स्क्रिन पर ही ज़ुड़ता था । लेकिन अब हरएक मोबाइल इससे जुड़ा हुआ है। लोगों को हर एक सवाल का ज़वाब़ भी गूगल बाबा और वाट्सएप युनिवर्सिटी के ज़रिए जहाँ पर चाहो वहाँ पर तुरत ही मिल रहा है। घर में प्लंबर की ज़रूरत से लेकर ट्रेन- हवाई ज़हाज़ की टिकट तक सब कुछ हथेली पर ही मिल जाता है। समझ में नहीं आता कि क़ि आगे यह कहां तक जाएगा … और लोगों को कहां तक लेकर ज़ाएग़ा। इस अवतार में यह लोगों के लिए वरदान बन गया है ।

लोगों का समय बी बच रहा है और लोग झंझट से भी बच रहे हैं। लेकिन इसके ज़रिए कई बुराइयां भी लोगों तक पहुंच रहीं हैं। अपनी हथेली के मोब़ाइल पर ही क़ैद होकर रह गए लोग अपनों से भी कटते जा रहे हैं। ज़िसके चलते इसे एक अभिषाप की शक्ल में भी देखा जा सकता है….। वगैरह…. वगैरह.. ऐसा बहुत कुछ इस निबंध मेँ लिख़ा जा सकता है।लेकिन हाल में ही सामने आई कई ख़बरों को देखकर हम मोबाइल युग की एक ऐसी ख़ासियत की ओर तवज्ज़ो चाहते हैं। जिसे भ्रष्टाचार और घूसख़ोरी को बेनक़ाब़ करने के लिए वरदान की तरह पेश किया ज़ा सकता है। हाल ही में अपने आसपास की तीन ख़बरें सामने आईं हैं।तीनों में ही लोगों से घूस मांगने वालों का वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हुआ था । … और तीनों मामलों में ही विभाग को एक्शन लेना पड़ा । बिलासपुर जिले में मस्तूरी के तहसीलदार का वीडियो वायरल हुआ था । जिसमें वे अपनी पसंदीदा ब्रांड की शराब का ज़िक्र करते हुए नज़र आ रहे थे । इसी तरह बिलासपुर ज़िले के बिल्हा थाने के एक कांस्टेबल का वीडियो भी सामने आया। जिसमे वे घूस मांगते हुए दिख़ रहे हैं। इसक़े बाद कांकेर ज़िले की एक महिला पटवारी का वीडियो सोशल मीडिया में घूम गया । जिसमें लोगों ने उन्हे घूस लेते हुए देखा ।

हालांकि इस तरह के वीडियो की पुष्टि हम नहीं कर सकते।रिवाज़ है कि सचाई जाँच के बाद ही सामने आएगी । लेकिन वाय़रल वीडियो में पहली नज़र में ज़ो कुछ दिख़ाई दिया है,उसके मद्देनज़र तीनों ही मामलों मे विभाग की ओर से तुरत- फ़ुरत कार्रवाई तो की गई है।मस्तूरी के तहसीलदार को पहले तो तुरत वहां से हटाया गया । फ़िर उन्हे सस्पैंड कर दिया गया । बिल्हा के कांस्टेबल को लाइन अटैच किया गया है। उधर कांकेर की पटवारी को भी सस्पैंड कर दिया गया है। इससे यह बात भी निक़लकर सामने आ रही है कि ऐसे मामलों में वीडियो वायरल होने के बाद कुछ तो असर होता है औऱ सिस्टम की मोटी चमड़ी में थोड़ी-बहुत सिहरन तो होती है। ज़ाहिर सी बात है कि इन तीनों ही मामलों में कथित रूप से घूस मांगने वालों से तंग हो रहे लोगों ने ही वीडियो बनाया होगा और सोशल मीडिया के ज़रिए लोगों तक पहुंचाया होगा। यहीं पूरे मामले का प्रस्थान बिंदु नज़र आता है। और बताता है कि घूस मांगने वालों से तंग हो रहे फ़रियादी कैसे अपनी हथेली पर थामें मोबाइल का इस्तेमाल कर सिस्टम का यह सच बेनक़ाब़ कर सकते हैं। बात भी सामने आती है और एक्शन भी होता है।

लगातार इस तरह की कई घटनाओं का समने आना इस बात का संकेत भी माना ज़ा सकता है कि लोग अब अपनी हथेली की इस ताक़त को समझने लगे हैं।जिसका इस्तेमाल भड़काऊ पोस्ट को आगे बढ़ाने में किया जा रहा है। वह अब सिस्टम की इस सचाई को बेनक़ाब़ करने में भी काम आने लगा है। हालांकि यह भी एक पहलू है कि ऐसी सहूलियत का इस्तेमाल किसी अधिकारी/कर्मचारी को फ़र्ज़ी तरीके से बदनाम करने के लिए भी किया ज़ा सकता है। लेकिन ज़ो लोग वाकई पीड़ित हैं, उन्हे घूस मांगने वालों के ख़िलाफ़ शिक़ायत का पुलिंदा लेकर ऐसे रास्ते पर तो भटकना नहीं पड़ेगा, जिसका अँत कभी दिख़ाई नहीं देता। यह भी कहा जा सकता है कि मोबाइल जैसी सुविधा तो सभी के पास नहीं हो पाती। और ऐसा भी हो सकता है कि हर तरह के “रोका-छेंका” की तोड़ निकालने में माहिर घूसख़ोरी के आदी लोग घूस की बात करने से पहले फ़रियादी पर बिना मोबाइल के मुलाकात करने की शर्त भी लगा सकते हैं।

लेकिन जब तक यह सब मुमक़िन है और जिनके लिए मुमक़िन है- कम से कम उन्हे तो इस ताक़त का इस्तेमाल कर सिस्टम और घूसख़ोरों पर चोट करने की हिम्मत दिख़ानी चाहिए। सिस्टम को एक्शन लेना पड़ेगा ….। और घूसख़ोरों की “मोटी चमड़ी” पर सोशल मीडिया का डर “चींटी” की तरह ही सही…थोड़ी सी चुभन तो पैदा करेगा ही….। इसे समाज की बुराई के ख़िलाफ़ लड़ाई में आत्मनिर्भर बनने की तरफ़ एक कदम भी माना जा सकता है…।

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