Chhattisgarh के दिलचस्प उपचुनाव(तीन)–जब जरहागांव सीट में वोट की गिनती से पहले ही नारा गूँज गया था- “जीत गया भई जीत गया…निरंजन भैया जीत गया…”

बिलासपुर।छत्तीसगढ़ में विधानसभा के उपचुनावों का इतिहास दिलचस्प रहा है। अविभाज़ित मध्यप्रदेश के समय से लेकर छत्तीसगढ़ बनने के बाद भी छत्तीसगढ़ की विधानसभा सीटों पर कई ऐसे उपचुनाव हुए हैं, जिनमें मुख्यमंत्रियों की किस्मत का फैसला भी हुआ है। कई ऐसे चुनाव हैं, जिसमें सत्तापक्ष के उम्मीदवार को भी हार का सामना करना पड़ा था । इस सीरीज़ में हम छत्तीसगढ़ के चुनावी इतिहास को खंगालते हुए ऐसे कुछ ख़ास – दिलचस्प उपचुनावों की चर्चा कर रहे हैं…। जरहागाँव का वह उपचुनाव जिसमें वोट की गिनती से पहले ही निकल गया था निरंजन केशरवानी का विजय जुलूस…

आमतौर पर विधानसभा के उपचुनाव को लेकर यह माना जाता है कि इसमें ज्यादातर मौके पर वही पार्टी जीत हासिल कर लेती है जजजजज होती होती होती है जो पा, जिस पार्टी के हाथ में प्रदेश के सत्ता की कम़ान होती है। इसकी एक वजह यह भी मानी ज़ाती है कि मतदाताओं को लगता है कि सरकार चला रही पार्टी को समर्थन देने से उनके काम आसानी से हो सकेंगे। लेकिन कुछ उपचुनाव ऐसे भी हुए हैं, जहां सत्ता पक्ष को हार का भी सामना करना पड़ा और विपक्ष के उम्मीदवार को जीत हासिल हुई। अविभाजित मध्य प्रदेश के दौर में 1974 में ऐसा ही एक उपचुनाव जरहागांव – पथरिया विधानसभा क्षेत्र में हुआ था। उस समय यह बिलासपुर जिले की विधानसभा सीट थी। जहां से पहले बशीर खान विधायक निर्वाचित हुए थे। लेकिन उनके निधन के बाद यह सीट खाली हुई थी और उपचुनाव कराया गया था ।

फरवरी 1974 में छत्तीसगढ़ के तीन विधानसभा क्षेत्रों में एक साथ उपचुनाव कराए गए थे। उस समय बस्तर के कोंटा विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के जोगिया मुका और सरगुजा के लखनपुर से कांग्रेस के ही डॉक्टर राजेश्वरी प्रसाद त्रिपाठी विधायक चुने गए थे। लेकिन बिलासपुर जिले की जरहागांव – पथरिया विधानसभा सीट में दिलचस्प मुकाबला हुआ और जनसंघ की टिकट पर चुनाव मैदान में उतरे कद्दावर नेता निरंजन प्रसाद केशरवानी इस उपचुनाव में विधायक चुने गए। उस समय मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री प्रकाश चंद्र सेठी थे। सेठी खुद भी चुनाव प्रचार के दौरान आम सभा लेने आए थे और कांग्रेस ने पूरी ताकत से यह चुनाव लड़ा था। जरहागांव उपचुनाव में कांग्रेस की ओर से ताहेर भाई को उम्मीदवार बनाया गया था। जनसंघ उम्मीदवार निरंजन प्रसाद केशरवानी के साथ पूरी पार्टी ने भी अपनी ताकत झोंक दी थी। जिससे जरहागांव का उपचुनाव सरकार और विपक्ष दोनों के लिए प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गया था।

पुराने लोगों को अब भी याद है की जनसंघ ने जरहागांव का उपचुनाव बहुत व्यवस्थित ढंग से लड़ा था और पार्टी को चुनाव में जीत को लेकर इतना अधिक भरोसा था कि वोट की गिनती से पहले ही मतदान के बाद उनके समर्थकों ने निरंजन केशरवानी की जीत का जुलूस भी निकाल दिया था। गलियों में “ जीत गया भी ज़ीत गया … निरंजन भैया ज़ीत गया ….” के नारे गूँज गए थे..। मतगणना हुई तो निरंजन केशरवानी ही विधायक चुनकर आए। हालांकि इसके कुछ समय बाद इमरजेंसी लग गई थी। इमरजेंसी के बाद हुए 1977 के लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी ने निरंजन केशरवानी को बिलासपुर लोकसभा सीट से अपना उम्मीदवार बनाया और वे बिलासपुर के सांसद चुने गए थे।

जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी में निरंजन केशरवानी अविभाजित मध्यप्रदेश- छत्तीसगढ़ और बिलासपुर इलाके के बड़े मुखर नेता के रूप में पहचाने जाते थे। संगठन में भी उन्होंने बड़ी जिम्मेदारी संभाली और पार्टी के अंदर भी मुखरता के साथ अपनी बात रखते थे। 1990 में निरंजन केशरवानी लोरमी विधानसभा क्षेत्र से भी विधायक चुनकर आए थे। 1974 के जरहागांव उपचुनाव में उन्होंने अपने कद और शख्सियत का एहसास कराया था।

उपचुनाव में निर्विरोध फैसला
छत्तीसगढ़ में हुए उपचुनाव के इतिहास में रायगढ़ जिले के पुसौर विधानसभा सीट का उपचुनाव भी दिलचस्प रहा। पुसौर उपचुनाव 1969 में हुआ था। जिसमें कांग्रेस की श्रीमती ललिता देवी निर्विरोध विधायक निर्वाचित हुई थी ।

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