50 साल बाद आया एतिहासिक फैसला …हाईकोर्ट का आदेश..3 महीने में करें वितरण..भूमिहीनों को मिले प्राथमिकता

बिलासपुर—-आधी सदी के लम्बे संघर्ष के बाद गंगरेल जलाशय के विस्थापितों को उच्च न्यायालय से न्याय मिला है। हाईकोर्ट अधिवक्ता संदीप दुबे ने बताया कि कोर्ट ने लम्बी लड़ाई के बाद राज्य सरकार को आदेश दिया है कि 3 महीने के अन्दर सभी विस्थापित समिति के सदस्यों को जमीन प्राथमिकता के आधार पर दिया जाए। जो आज भी भूमिहीन हैं।
 
 _       हाईकोर्ट ने गंगरेल बांध भूविस्थापितों के पक्ष में फाैसला देते हुए राज्य सरकार को आदेश दिया है कि विस्थापित भूमिहीन किसासों को तीन महीने के अन्दर जमीन दिया जाए। अधिवक्ता संदीप दुबे ने सुनवाई के दौरान कोर्ट ने बताया कि जमीन आवंटन के दौरान 2004-05 से 2009-10 काल में राज्य की संस्था ने मामले में जांच पड़ताल की। जांच रिपोर्ट को संस्थान ने अभी तक पेश नहीं किया है। इसलिए, याचिकाकर्ता के सदस्य भी भूमि के आवंटन के संदर्भ में उचित विचार के हकदार हैं। जिन्हें एक ही लाइन में जमीन से बेदखल किया गया है। कार्ट ने बताया कि 2004-05 और 2009-10 के बीच आवंटित भूमि के लिए आगे बढ़ रहा है। सदस्यों को भूमि आवंटन के लिए कलेक्टर दुर्ग, धमतरी और कांकेर कार्यालय से शुरू करने की आवश्यकता है।
 
                संदीप दुबे ने बताया कि संविधान के अनुच्छेद 226/227 के तहत गंगरेल डैम धमतरी से प्रभावित गंगरेल प्रभावित समिति ने उच्च न्यायालय में लंबी लड़ाई के बाद पुनर्स्थापन के लिए रिट याचिका दायर की थी। विस्थापित पीड़ितों ने बताया कि साल 1972 से सभी लोग परेशान और पीडित हैं। डैम निर्माण के समय जमीन को राज्य सरकार ने अधिग्रहित कर मुआवजा का वितरण किया। लेकिन राशि बहुत  कम थी। इस दौरान राज्य शासन ने  भूमि के बदले भूमि देने का  लिखित वादा था। 
 
        याचिकाकर्ता के वकील ने बताया कि राज्य शासन से सिर्फ 178 लोगों को ही जमीन दिया। इस दौरान विस्थापित 8 हजार परिवार को वादा के अनुसार जमीन का एक टुकड़ा भी नहीं मिला। जमीन नही पाने वालों में ज्यादातर धमतरी ,दुर्ग,कांकेर के लोग हैं। इस बात को लेकर लोगों ने लगातार मांग आंदोलन किया। 2004 से 2011 तक लगातार आश्वासन दिया गया वंचित लोगों के बीच जमीन वितरण किया जाएगा। लेकिन जमीन का वितरण एक बार फिर कुछ लोगो के ही बीच किया गया। 
 
                  याचिकाकर्ता के वकील संदीप दुबे ने जानकारी दी कि करीब 200 से अधिक विस्थापित पीड़ितों ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर जमीन दिलाने की मांग की। 13 साल की लंबी लड़ाई के बाद न्यायाधीश जस्टिस मनिंद्र मोहन श्रीवास्तव ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि 3 महीने के भीतर समिति के सभी सदस्यों को जमीन दिया जाए। जमीन वितरण के समय इस बात का जरूर ध्यान रखा जाए कि जमीन सबसे पहले प्राथमिकता के आधार भूमिहीन को जमीन दिया जाए।

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