दख़लः हड़ताल पर बैठे कर्मचारियों की मांग…… मंहगाई-बेरोज़गारी को सिर के बल खड़े होकर क्यों नहीं देख लेते हमारे नेता …?

(रुद्र अवस्थी ) बहुत पुरानी फ़िल्म “श्री 420” का एक गाना सभी ने सुना होगा..। “ दिल की बात कहे दिलवाला… सीधी सी बात ना मिर्च मसाला…।” इस गाने के ठीक बाद फ़िल्म के नायक राजकपूर समंदर के किनारे नज़र आते हैं…। वह सीन याद कीज़िए .. जब़ राजकपूर को शीर्षासन .. यानी सिर के बल खड़े देखकर एक पुलिस हवलदार ने टोका…। और पूछा- “सिर के बल क्यों खड़ा है…. ?” तो राजकपूर बोलते हैं- “सच्ची बात तो यह है हवलदार साहब़….इस औंधी दुनिया को सीधा देखना है तो सिर के बल खड़ा होना पड़ता है…। जानते हैं, हवलदार साहब… बड़े-बड़े नेता सब़ेरे उठकर शीर्षासन करते हैं…तब देश को सीधा कर पाते हैं…।” हवलदार यह कहते हुए वहां से वापस लौटता है – “अभी कोई गड़बड़ मत करना , नहीं तो मैं तुम्हे सीधा कर दूंगा…।” जाते-जाते राजकपूर फ़िर सवाल करते हैं कि सिर के बल खड़ा होना कोई गुनाह है क्या….?

इतनी लम्बी भूमिका में श्री 420 के इस सीन को याद दिलाते हुए सवाल भी उठ रहा है कि कई दशक पुरानी इस फ़िल्म के सीन को सामने रखकर क्या आज के दौर के हालात को इस सीन में फ़िट किया जा सकता है… ? हाल के दिनों में जो कुछ देखने को मिला है, उसे सामने रखकर ज़ेहन में यह सवाल भी है कि क्या हमारे आज के नेताओं को भी शीर्षासन… यानी सिर के बल खड़े होने पर ही सब कुछ सीधा दिख सकता है…. ? और कभी सत्ता – कभी विपक्ष का चश्मा लगाकर वे सच नहीं देख पा रहे हैं…? एक – दो नमूने राष्ट्रीय स्तर के देख लीज़िए …। फ़िर छत्तीसगढ़ में हाल में पेश आए कुछ सीन पर बात कर लेंगे…।

पहले हर एक आदमी से ज़ुड़ी मंहगाई पर बात कर लेते हैं….। आज़ के दौर में मंहगाई कुछ लोगों को दिख रही है … और कुछ लोगों को देश में कहीं भी मंहगाई नज़र नहीं आती है। जिस पार्टी के लोग पहले कभी रसोई गैस के दाम दस- बीस रुपए बढ़ने पर ही सिलेंडर लेकर विरोध प्रदर्शन करने सड़क पर उतर जाते थे , उनको आज सिलेंडर के दाम हज़ार रुपए प़ार होने पर सब सस्ता दिखाई दे रहा है। दूसरी तरफ़ ऐसे लोग हैं, जो मंहगाई का पूरा हिसाब़-क़िताब़ लेकर अब सड़क पर प्रदर्शन करते हैं। इस नज़रिए को कोई मंहगा कहेगा या सस्ता….. लेकिन यह मान लेने में किसी को गुरेज़ नहीं होगा कि सत्ता और विपक्ष का चश्मा ही तय करता है कि मंहगाई है या नहीं….।जो सत्ता में होगा उसके चश्मे में मंहगाई कहीं नहीं दिख़ती…। वहीं विपक्ष में खड़े लोग हर ज़गह मंहगाई को देख लेते हैं। उनसे मंहगाई छिप नहीं पाती…।

चश्मा बदलने के इस खेल में एक दिलचस्प बात यह भी है कि अगर कोई पार्टी केन्द्र में विपक्ष की भूमिका निभा रही है और प्रदेश में सरकार चला रही हो तो वह दिल्ली में जाकर प्रदर्शन करेगी। यहां तक कि अपने प्रदेश में भी धरना देगी । लेकिन उनके ही प्रदेश में कोई तब़का अगर मंहगाई का हवाला देकर भत्ते की मांग करे तो उसे ज़ायज़ नहीं मानेगी।
एक नमूना और देखिए….। अब बात कर लेते हैं, बेरोज़गारी की…। पिछले काफ़ी समय से बेरोज़गारी की बात हो रही है। कोरोना काल के बाद तो इस मुद्दे से जुड़ी ख़ब़रें सुर्ख़ियों में रहीं हैं। हर साल दो करोड़ नौक़री देने का ज़ुमला तो पुराना हो गया । लेकिन समय- समय पर बेरोज़गारी के मुद्दे पर केन्द्र सरकार के ख़िलाफ़ नौज़वानों के प्रदर्शन भी सुर्ख़ियों में आते रहे हैं। यहां भी चश्मे का क़माल देख सकते हैं…।

केन्द्र और राज्य में अलग – अलग पार्टी की सरकार होगी तो बेरोज़गारी को देखने का नज़रिया बदल जाएगा। और विपक्षी दल की भूमिका निभाते हुए बेरोज़गारी के मुद्दे पर प्रदर्शन करने में कोई हिचक नहीं होगी । जो मानते हैं कि केन्द्र में बेरोज़गारी नहीं हैं, उन्हे प्रदेश में बेरोजगारी दिखती है….। और जो लोग केन्द्र में मंहगाई देख रहे हैं, उन्हे अपने प्रदेश के लोगों पर मंहगाई का कोई असर नज़र नहीं आता।
अब एक और दिलचस्प वाक़्या देखिए। ज़ो छत्तीसगढ़ में इन दिनों चल रही कर्मचारियों की हड़ताल के दौरान भी सामने आया है। कर्मचारी डीए और एचआरए की मांगों को लेकर बेमुद्दत हड़ताल पर हैं। इस दौरान उन्हे प्रदेश की उस पार्टी का भरपूर समर्थन मिल रहा है, जो इस समय विपक्ष में है। इस पार्टी के लोग कर्मचारियों के धरना पंडाल में जाते हैं …। ख़ुलकर साथ देने का एलान करते हैं।

पहले कई बरसों तक सूब़े के मुखिया रह चुके इसी पार्टी के बड़े नेता ने तो यह बयान भी दे दिया कि – हमारे कर्मचारी चिंता ना करें…. सवा साल बाद हमारी पार्टी की सरकार आएगी तो सारी मांगें पूरी हो जाएगी। कर्मचारी संगठन के लोग याद दिलाते हैं कि इस तरह का बयान देने वालों के कार्यकाल के समय का ब़क़ाया पैसा कर्मचारियों को अब तक नहीं मिला है। यही हाल मौज़ूदा सरकार में बैठे लोगों का भी है। कर्मचारियों की ओर से उनका वीडियो भी दिखाया जाता है । जब वे ख़ुद विपक्ष में थे, तब कर्मचारियों के आंदोलन पंडाल में आकर किस तरह का वादा करते रहे। विपक्ष में रहकर जो मांगें ज़ायज़ लगती है, वही मांगें सरकार में बैठकर बोझ़ लगने लगती हैं।

ऐसे में श्री 420 में राजकपूर का डॉयलाग आज के सियासतदानों के सीन पर फ़िट करके देखें तो यह पूछने का मन करता है कि क्या आज के रहनुमाओं ने शीर्षासन करना छोड़ दिया है। तभी तो सत्ता में आते ही सचाई को सीधा करके देख नहीं पाते…? या सचाई को देखना नहीं चाहते…? मंहगाई,बेरोज़गारी से लेकर हड़ताली कर्मचारियों की मांगों तक सचाई से रू-ब-रू होने के लिए एक ब़ार ही सही श्री 420 का फ़ार्मुला आजमाते हुए सिर के बल खड़े होकर अपनी नज़रों की टेस्टिंग कर लें … तो कैसा रहेगा…? शायद उन्हे यह समझ में आ जाए कि सरकार की कुर्सी में बैठकर जो देखते हैं, वह सही है …। या विपक्ष में रहते हुए जो सड़क पर नज़र आता है, वह सही है…?

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