वट-सावित्री बरसाईत के बड़ महिमा – डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा

वट मूल स्थित ब्रह्मा, वट मध्ये जनार्दन

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वटाग्रे तु सिवोदेवः सावित्री वट संप्रिता….

 

बर के रूख म देवी-देवता मन रथें, एकरे र बट-बर पेड़ ल देवता रूख मानके पूजा करथें, पानी चढ़ाथें, बरके जरी म ब्रह्मा मझोत म बिस्नु अऊ बरों (पेड़ की दाढ़ी) म सावित्री देवी के निवास हे, रूख राई म बर, पीपर, लीम बेल, परसा, मउहा, कउहा, सरई, सागौन, डूमर, आमा, अमली, मनखे बर ओखद अमृत हवा-पानी देथें, बिसहर वायु ले बचायें, वातावरनल सुद्ध सफ्फा करथें- घाम म छांव, बरसात म छावा, जाड़ मं खोंधरा, बीमार बर फोंक म दूध, बतासा म पुस्टई, बर्रो म सोभा।  कथें बर-तरी सती सावित्री अपन सत पुत्र-परताप ले अपन सेंदुर सोहाग मरे सत्यवान ल जिया डारे रहिस, एकरे बर जेठ अमावस के वट सावित्री बरसाईत बर के साइत निरजला उपवास रथे- अऊ ब्रह्मा, जम देवता, सावित्री के संग बर-पेड़ के सूत-लपेट के भांवर पारथें…बर देवता के चौदह भांवर-फेरी सूत लपेट के पूजा करय…. कई झन नोनी मन एक सौ आठ फेरी लेथें….अऊ पिपरमेंट, रेवड़ी, चाकलेट चढ़ा के चोचला करथें… अवैधव्यं च सौभग्य म देहिल मय सुब्रते…मतरा ले अरध देना चाही, बर के जरी म माटी-पानी खचित डज्ञरय, भीजे चना, रूपिया, सोहाग के झपुलिया-सौभाग्य पिटारी-सेंदूर, टिकली, काजर-चूरी, साड़ी लुगरा, गहना-गरिया-अपन सासु-सास ल देके-पांव परय असीस ओली म झोंकय।

एकर एकठन किस्सा हावय मदू देस के राजा अस्वपति नाव के रहिस, राजा के कोना लइका-पिचका नई रहिस, राजा बड़ धर्मात्मा रहिस- फेर संतान बर जप करिस, त एक ठन नोनी जनमिस, नोनी के नाव सावित्री रखे गईस, जन नोनी बाढ़ के बिहाव लाइक होस…त सावित्री सवांगे – स्वयंबर – बर छोट बर निकरिस, सत्यवान् अपना अंधरा दाई-ददा के सेवा करय…. ओला देखके सावित्री सत्यवान संग बिहाव करे बर संकलप कर लेईस…जब नारद मुनी ल गम मिलिस…. त नारद राजा ल बतावत हे के सत्यवान् बने गुनी हे, फेर ओकर अवरदा कमती हे…. याने एक बछर ओकर जिनगानी हे… फेर सावित्री जुच्छा हाथ हो जाही।  नारद मुनी के वचन पहली बेर ले सावित्री बर-असत होय हे।  दूसर बर…सती हव करके,.. निहीं मानिस…हिंदू कइना एक्के बर सेंदूर – सोहाग लेथे……सेंदूर के छुआ एक बार…..तिरिया तेल हमीर हठ चढ़ैं न दूजी बार…. राजा जंगल म जाके कइना दान दाइज डोर सहित कर देईस।  अब सती सावित्री बिहान ले अपन सास-ससुर-पति के सेवा कर… बछर पूरे लागिस त सावित्री उपास रहिके अपन धनी संग जंगल लकड़ी काटे बर गईस….सत्यवान् टंगिया धर के रूख म चढ़िस के चक्कर आगे….मूड़-पीरा म व्याकुल सत्यवान् सावित्री के केरा म ढलंग गे…वोती सत्यवान् के चांउर पुरिस… के साच्छात् जमराज भईसा के असवार – आगे अऊ सत्यवान के जीव – रक्छाहू (दक्षिन) कती ले के चल दिहिस… फेर सती घलाय पाछू पाछू पाय लागिस तब जमराज बरदान देके लहुटे बर कहिस …. पहिली वरदान सास-ससुर के आंखी दिख जाय…तभी ले सती जमराज ल नई छोंड़त हे…. फेर दूसर वरदइान मांगे बर कहिस…. त सती अपन ससुर के राजपाट मांगिस… ये हूं ल पाके जमराज के पाछू सती जावत हे- तिरिया हठ देखके…. जमराज तीसर वरदान देहे बर तियार होगे…. मैं…मैं मोर धनी ले सौ बेटवा के दाई बने चाहत हौं। …..अरे। ….अरे।।  सती सतवंतिन सच्ची अऊ नारद के वचन लबारी…. एकरे बर चार चूरी बर, सेंदूर सोहाग बर, देस के सुवारी अपन धनी बर-पति के जीवन बर-वट सावित्री के निरजला उपास रहय।

 

डॉ. पालेश्वर प्रसाद शर्मा

विद्यानगर, बिलासपुर छ.ग.

                   

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