जब रायपुर में फटा था दिग्गी राजा का कुर्ता,छत्तीसगढ़ की पहली सरकार,गुलाम नब़ी आज़ाद..और कांग्रेस की सियासत

(गिरिजेय)यह ख़ब़र शुक्रवार को दिन भर सुर्ख़ियों मे रही कि गुलाम नब़ी आज़ाद ने कांग्रेस छोड़ दी….। वैसे गुलाम नब़ी आज़ाद के नाम से ज़ुड़ी ख़ब़र वह समय भी सुर्ख़ियों में रही है , जब करीब़ दो दशक पहले छत्तीसगढ़ राज्य अस्तित्व में आया था और कांग्रेस के नेता अजीत जोगी पहले मुख्यमंत्री बने थे । सन् 2000 में वह अक्टूबर की विदाई और नवंबर की आगवानी का वक़्त था । नया राज्य,नई सरकार, नई राजनीति …. और नया महीना.. सबकुछ नया था। गुलाम नब़ी आज़ाद को कांग्रेस प्रमुख सोनिया गांधी ने ऑब्जर्वर बनाकर रायपुर भेजा था। तब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री की हैसियत से दिग्विजय सिंह भी उनके साथ थे। जिन्होने मिलकर छत्तीसगढ़ के नए मुख्यमंत्री के रूप में अजीत जोगी की ताजपोशी की थी और वरिष्ठ कांग्रेस नेता विद्याचरण शुक्ल के फ़ार्महाउस में ख़ीचतान के बीच दिग्विजय सिंह का कुर्ता फ़टा तो उसके भी गवाह बने थे ।

गुलाम नब़ी आज़ाद की छत्तीसगढ़ कांग्रेस की सियासत में इतनी ही हिस्सेदारी रही।यह इत्तफ़ाक की बात है कि सीएम बनने के करीब़ डेढ़ दशक बाद अजीत जोगी ने कांग्रेस छोड़ दी थी और पर्यवेक्षक बनकर आए गुलाम नब़ी आज़ाद ने भी अब कांग्रेस को अलव़िदा कह दिया है। उनके कांग्रेस छोड़कर जाने की ख़ब़र से छत्तीसगढ़ के उन पुराने काग्रेसियों के बीच हलचल ज़रूर हुई है, जो इस समय अपने आपको हासिए पर देख रहे हैं …। और नीचे से ऊपर तक बदले हुए हालात में कांग्रेस पार्टी के आने वाले दिनों को भी सवालिया नज़रों से देख रहे हैं।

छत्तीसगढ़ में इन दिनों कांग्रेस की सरकार है और कांग्रेस के राष्ट्रीय नेतृत्व को छत्तीसगढ़ से उम्मीदें भी हैं। लिहाज़ा राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस से जुड़ी कोई बड़ी ख़बर आती है तो यह जानने की दिलचस्पी राजनीतिक प्रेक्षकों को भी होती है कि इसका छत्तीसगढ़ के कांग्रेसियों पर क्या असर हो रहा है और वे क्या सोच रहे हैं। शुक्रवार को जब़ गुलाम नब़ी आज़ाद के कांग्रेस छोड़ने की ख़ब़र आई तब भी इसकी चर्चा हुई। लोगों ने अव्वल तो याद किया कि गुलाम नब़ी आज़ाद छत्तीसगढ़ की पहली सरकार के गठन के समय पर्यवेक्षक बनकर आए थे और उनकी मौज़ूदगी में क्या कुछ घटा था ।

याद इस बात को भी किया गया कि वे अस्सी के दशक में उस समय के दिग्गज़ नेता विद्याचरण शुक्ल के क़रीब़ी रहे। युवक कांग्रेस के राष्ट्रीय महामंत्री के रूप में गुलाम नब़ी आज़ाद 1978-79 में युवक कांग्रेस के एक सम्मेलन में हिस्सा लेने ब़िलासपुर आए थे । तब युवक कांग्रेस में सक्रिय वी.सी.शुक्ल के क़रीब़ी फ़िरोज़ क़ुरैशी और राधे भूत उन्हे बिलासपुर से गाड़ी में साथ लेकर रायपुर से जबलपुर होते हुए भोपाल तक छोड़कर आए थे । गुलाम नब़ी आज़ाद के कांग्रेस छोड़ने की ख़बर सुनकर फ़िरोज़ कुरैशी बोले कि उनके साथ अच्छे तालुक़ात रहे हैं। सतत संपर्क भी रहा है। उनका कांग्रेस छोड़कर जाना अच्छा नहीं है। दुर्भाग्यपूर्ण है।

कांग्रेसियों के बीच आपस की गपशप में भी इस ख़ब़र का ज़िक्र होता रहा । गुलाम नब़ी आज़ाद की पहचान कभी जनाधार वाले नेता की नहीं रही। शुरूआती द़ौर में जब वे जम्मू कश्मीर से चुनाव हार गए थे । तब वी.सी. शुक्ल ने उन्हे नागपुर के पास वासिम सीट से चुनाव लड़ाया था । लेकिन पार्टी संगठन में उनकी हमेशा ही सक्रिय भूमिका रही। कई मौक़ो पर उन्हे पर्यवेक्षक बनाकर भेजा जाता रहा और इस रूप में वे पार्टी आलाकमान के भरोसेमंद संदेशवाहक का क़िरदार निभाते रहे। छत्तीसगढ़ में भी उन्हे यह ज़िम्मेदारी मिली थी । कांग्रेस में ऐसा मानने वाले लोग भी हैं कि कांग्रेस पार्टी ने आज़ाद को लगातार पदों पर रखा और उन्हे पहचान भी दी। लेकिन पार्टी नेतृत्व को सवालों के घेरे में लेते हुए पार्टी से इस्तीफ़ा देकर उन्होने अपनी वास्तविक पहचान करा दी है। कांग्रेस के लोग मानते हैं कि इस तरह और भी कुछ नेता आने वाले समय में पार्टी छोड़कर जा सकते हैं।जो काफ़ी समय तक सत्ता के बिना नहीं रह सकते। राष्ट्रीय स्तर पर काग्रेस पार्टी जिस दौर से गुज़र रही है, उसमें इस तरह की सोच सही नहीं है।

लेकिन इंदिरा गांधी, संजय गाँधी, राजीव गांधी,सोनिया और राजीव तक गाँधी परिवार के सबसे करीब़ी नेताओं में से एक रहे गुलाम नब़ी आज़ाद ने जिस तरह से मुखर होकर अपनी बात कही है , उसका भी ज़िक्र आपस की बात में लोग कर रहे हैं। बात जी – 23 की भी हो रही है औऱ छत्तीसगढ़ कांग्रेस की सियासत में समय – समय ख़ीचतान की सुर्ख़ियों पर हाइकमान के रुख़ का भी लोग ज़िक्र कर जाते हैं। राज्यसभा चुनाव में छत्तीसगढ़ के स्थानीय लोगों को नुमांदगी का मौक़ा नहीं दिए जाने की चर्चा को भी कांग्रेस के मौज़ूदा हालात से जोड़कर देखा जा रहा है। कुछ महीने पहले हुए राज्यसभा चुनाव के समय यह ख़ब़र सुर्ख़ियों में थी कि स्थानीय नेताओं को मौक़ा देकर 2023 के आने वाले विधानसभा चुनाव के लिए पार्टी को और मज़बूती दी जी सकती थी । लेकिन कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व ने कुछ बेहतर सोचकर ही फ़ैसला किया होगा…। गुलाम नब़ी आज़ाद के इस क़दम की चर्चा के ब़हाने छत्तीसगढ़ के सियासी गलियारों में कई स्थानीय प्रश्न भी घुमड़ रहे हैं। जिन्हे सामने रखकर लोग छत्तीसगढ़ में आने वाले दिनों में कांग्रेस की तस्वीर को लेकर क़यास भी लगा रहे हैं।

Leave a Reply

Your email address will not be published.