सुनिए साहबज़ी की बात…घर बैठे तनख़्वाह लेना चाहते हैं गुरूजी…स्कूल बंद… बच्चे नहीं आ रहे…लेकिन टीचर हाज़िर हो..

( गिरिज़ेय )पहला सीन……रिपोर्टर ने शिक्षा विभाग के एक आला अफसर से बड़ी विनम्रता और शालीनता के साथ सवाल किया…… सर शिक्षकों को स्कूल आना है या नहीं ….उनके लिए क्या दिशा निर्देश हैं…. ? आला अफसर ने झल्लाहट के साथ रिपोर्टर से ही पूछ लिया  क्या  दिशा निर्देश चाहिए। जब ऐसा कोई आदेश जारी नहीं हुआ है… इसका मतलब है कि शिक्षकों को स्कूल आना है। सवाल को आगे बढ़ाने के लिए रिपोर्टर ने कुछ कहने की कोशिश की । लेकिन अफसर ने बीच में ही बात काटते हुए कहा….. अब यह बताइए मुझे क्या मुझे छुट्टी मिल गई है…. ऑफिस आने से…। तो बाकियों को क्यों मिलेगी …….क्या बाकी लोगों को घर बैठकर तनख्वाह मिलनी चाहिए। फिर रिपोर्टर में स्पष्ट करना चाहा कि इसका मतलब सभी को स्कूल आना है…..।

उधर से अफसर ने कहा – सबको अपने अपने ऑफिस में जाना है ।  जब तक सरकार ऑफिस बंद नहीं करती । तब तक सभी को ऑफिस में जाना है। जो नहीं जाएगा उसकी तनख्वाह कटेगी। अभी लॉकडाउन थोड़ी लगा है ।  स्कूल ही शिक्षकों का ऑफिस है। जहां से शिक्षकों को वेतन मिलता है….।  अगर वे अपने ऑफिस नहीं जाएंगे तो वेतन किस बात का लेंगे….। साहब यहीं पर नहीं रुके और आगे बोलते गए मेरी भी छुट्टी करा दो ना यार…… मैं भी घर बैठकर वेतन लूंगा। क्या मुझे घर बैठकर वेतन नहीं मिलना चाहिए….. तो फिर टीचर्स को क्यों घर बैठकर वेतन मिलना चाहिए। बात आगे बढ़ती देख रिपोर्टर ने अफसर को पढ़ाई तुंहर दुआर जैसी अवार्डेड योजना की याद दिलानी चाहिए। बीच में ही अफसर ने रोककर कहा वह पढ़ाई तुंहर दुआर छोड़ दीजिए ….आपने जो सवाल किया मुझे काउंटर क्वेश्चन करना है….।

उन्होंने आगे कहा कि यह सवाल पैदा क्यों हो रहा है …….हमारे आदेश में कहीं लिखा है क्या कि शिक्षकों को नहीं आना है। रिपोर्टर ने कहा – सर कहीं नहीं लिखा है। अफसर ने फिर कहा-  फिर यह सवाल क्यों पैदा हो रहा है। रिपोर्टर ने आगे कहा सर सोशल मीडिया में चर्चा हो रही है। अफसर आगे बोले नहीं ….. क्यों हो रही है चर्चा …… ? इसीलिए तो बोल रहा हूं ये वही लोग चर्चा फैला रहे हैं ,जो काम नहीं करना चाहते। निकम्मे हैं। छाप दीजिए मेरी तरफ से……..।

रिपोर्टर और शिक्षा विभाग के आला अफसर के बीच शब्दशः वार्तालाप उस समय का है, जब मार्च के आखिरी हफ्ते में कोरोना के मामले लगातार बढ़ने की वजह से सरकार ने छत्तीसगढ़ के सभी स्कूलों को बंद करने का फरमान जारी किया था।( यह ऑडियो हमारे पास है )। उस आदेश में स्कूल बंद करने के लिए कहा गया था। शिक्षकों की हाजिरी को लेकर कोई भी बात साफ-साफ नहीं लिखी गई थी। लिहाजा स्कूल बंद करने के बाद बच्चों के साथ ही शिक्षकों की भी छुट्टी का भ्रम लोगों के मन में फैला। जिसकी चर्चा सोशल मीडिया में होने पर रिपोर्टर ने सही स्थिति जानने के लिए विभाग के बड़े अफसर को फोन मिलाया था। लेकिन शिक्षा जैसे बच्चों को तालीम के साथ तमीज भी सिखाने वाले महकमे के आला अफसर ने जिस अंदाज में झल्लाहट के साथ रिपोर्टर से बात की, उसे सुनकर कोई भी अदना सा आदमी भी यह समझ सकता है कि तमीज के मामले में यहां के अफसर किस दर्जे में रखे जाने चाहिए।

रिपोर्टर अपनी ड्यूटी कर रहा था। उसने यह नहीं कहा कि स्कूल बंद करने के साथ शिक्षकों की भी छुट्टी होनी चाहिए। रिपोर्टर ने सिर्फ भ्रम दूर करने के लिए अफ़सर को फ़ोन लगाया था। बहरहाल इस बातचीत के बाद विभाग ने एक साफ-साफ आदेश निकाला । जिसमें शिक्षकों को टाइम टेबल के मुताबिक अपने स्कूल में हाजिर होने कहा गया था। लेकिन इस बातचीत से एक बात खुलकर सामने आई थी की स्कूलों में शिक्षकों की उपस्थिति पर जोर देने के पीछे तनख्वाह का क्या रिश्ता है और इस मामले में उनके विभाग की सोच क्या है। जिस तरह उन्होंने बड़े-बड़े अवार्ड जीतने वाले पढ़ाई तुँहर दुआर जैसी योजना  का नाम लेते ही झिड़क दिया…..। उसमें भी इस योजना से जुड़ी सच्चाई की झलक देखी जा सकती है।जिस योज़ना का गुणगान करते हुए अफ़सर अपनी तस्वीर के साथ प्रोपेगंडा करने में अपनी शान समझते रहे ….. आज़ उस योजना का नाम सुनकर ही भड़क जाते हैं…..।

इस वार्तालाप के बाद अब दूसरे सीन पर आते हैं। इस समय छत्तीसगढ़ में कोरोना की दूसरी लहर का कहर ज़ारी है। रोजाना रिकॉर्ड मामले सामने आ रहे हैं। खबरें आ रही है कि ऑक्सीजन बेड की संख्या जरूरत के हिसाब से कम है। रायपुर सहित कुछ जिलों में लॉकडाउन भी लगा दिया गया है। बाकी जगह लोग प्रशासन के फैसले की ओर टकटकी लगाए हुए हैं। मार्च के करीब आखिरी हफ्ते में सरकार का फरमान जारी होने के बाद रिकार्डो में स्कूल बंद है।( जैसे उसके पहले से लगातार कक्षाएं लगती रहीं हो) ।स्कूल बंद है तो स्वाभाविक रूप से बच्चे नहीं आ रहे हैं । लेकिन टीचर की हाजिरी जरूरी है। कभी इस बात की चर्चा होती है कि रोटेशन के हिसाब से शिक्षकों को स्कूल आना होगा। लेकिन फिर सभी को रेगुलर आने की हिदायत दी जाती है। इस सवाल का जवाब कोई भी जानना चाहेगा कि जब स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे नहीं आ रहे हैं तो टीचर क्या करने के लिए स्कूल जा रहे हैं।

हालांकि इस बारे में बात करने पर हमें यह भी बताया गया कि स्कूलों में बच्चों के मार्कशीट तैयार करने , मूल्यांकन, मध्यान्ह भोजन का सूख़ा राशन बांटने, ज़ाति प्रमाण पत्र बनाने जैसे कई काम हैं। लेकिन इस काम में दो-चार घंटे से अधिक का समय नहीं लगता और टीचर को पूरे समय स्कूल के ख़परे गिनने के लिए बुलाने की ज़रूरत नहीं है। बहरहाल कई स्कूलों में टीचर की संख्या 20 से 25 तक है, जो बिना किसी काम के रोज अपने घरों से निकलकर स्कूल तक पहुंचते हैं। छोटे-छोटे स्टाफ रूम में ठसाठस के हिसाब से बैठते हैं। घड़ी की ओर ताकते रहते हैं। ड्यूटी का वक्त पूरा होते ही वापस घर के लिए रवाना हो जाते हैं। सोशल डिस्टेंसिंग की धज्जियां भी उड़ रही है और मानव श्रम का बेफिक्री से माखौल उड़ाया जा रहा है। सभी जान रहे हैं कि कोरोना की दूसरी लहर कितनी तेज रफ्तार से फैल रही है। खासकर शहरी इलाकों में करीब सभी वार्ड, सभी मोहल्ले कंटेंटमेंट जोन के दायरे में आ गए हैं ।

कई घरों में लोग या तो कोरोना संक्रमित हो चुके हैं या अपने आसपास के लोगों के संक्रमित होने की वजह से खुद भी  होम क्वारंटाइन होकर अपना वक्त गुजार रहे हैं। ऐसे में बिना काम टीचर को स्कूल में बुलाने से उनके जरिए संक्रमण फैलने  के खतरे से इनकार नहीं किया जा सकता । आशंकाओं के बादल तो मंडरा ही रहे हैं। कुछ स्कूलों में शिक्षकों के संक्रमित होने की भी खबर आ रही है। इसके बावजूद टीचर को स्कूल आना है तो आना है….। सिर्फ तनख्वाह को आधार मानकर शिक्षा विभाग पूरी सरकार ,सिस्टम और समाज के सामने ऐसी तस्वीर पेश कर रहा है की शिक्षक समाज बिना काम किए बैठे-बैठे तनख्वाह ले रहा है।

हमने शुरू में जो वार्तालाप का वृतांत लिखा है ।  उसे एक बार फिर पढ़ लीजिए। आपको यह आसानी से समझ में आएगा कि अब तक शिक्षा की अलख़ जगाए हुए समाज के सम्माननीय शिक्षकों पर उसी समाज के सामने निकम्मेपन का तमगा लगाने की बात हो रही है। खुद भी तरह-तरह के भ्रष्टाचार के मामलों में फंस चुके और आरोपों से घिरे अफसर शिक्षकों को यह तमगा बांट रहे हैं।और एक विनम्र रिपोर्टर से बात करते समय तमीज की कमीज़ तार-तार कर ख़ुद भी अपने चेहरे का सच उज़ागर कर रहे हैं।  ऐसा कहते हुए वे कई बातों को भी भूल रहे हैं। यही शिक्षा विभाग है , जिसने पिछले साल कोरोना की पहली दस्तक के बाद पढ़ाई तुँहर दुआर, मोहल्ला क्लास ,ऑनलाइन क्लास जैसे कई प्रयोगों को सुर्खियों में लाकर वाहवाही बटोरी थी। सरकार और समाज के सामने अफसरशाही ने खुद को इस तरह पेश किया था कि हमारे शिक्षकों ने पारंपरिक शिक्षा के विकल्प के रूप में महामारी के दौरान तकनीक का उपयोग कर एक बेहतर मिसाल पेश की है। इन योजनाओं की कामयाबी की कहानियां भी सरकारी विज्ञप्तियों में खूब आती रही हैं।

पढ़ाई तुँहर दुआर जैसी योजना को अवार्ड भी हासिल हुए हैं। हमने भी ऐसे कई शिक्षक – शिक्षिकाओं की कहानियां महिला दिवस पर प्रकाशित की हैं । जिन्होंने पिछले साल कोरोना के दौर में सोशल मीडिया, व्हाट्सएप ,यूट्यूब जैसे माध्यमों का बढ़िया इस्तेमाल कर बच्चों को पढ़ाई लिखाई और सीखने की कला से जोड़े रखा। सवाल यह भी है कि – क्या सरकार के आँकड़े ही झूठे हैं। जो बताते हैं कि वैकल्पिक माध्यमों से शिक्षकों ने बच्चों को पढ़ाई से जोड़े रखा। यदि सरकार के आँकड़े सही हैं तो फ़िर शिक्षकों पर घर बैठे तनख्वाह लेने की तोहमत लगाना कितना सही है……? लेकिन अब  ऐसी योजना का नाम  सुनते ही यदि कोई आला अफसर भड़कने लगे तो क्या यह नहीं समझा जाना चाहिए कि पढ़ाई तुँहर दुआर योजना को मिले अवार्ड भी फर्जी थे। फर्जी तरीके से विभाग ने वाहवाही लूटी और आज इस महकमे के अफसर इसका नाम लेने पर ख़ुद भी गुर्राने लगे हैं।

विभाग की गत समझने के लिए साहब की जुबान से निकले शब्दों को सुनना ही  काफी हैं। जिसमें उन्होंने शिक्षकों की प्रतिष्ठा और समाज के निर्माण में उनकी हिस्सेदारी को सिर्फ तनख्वाह के पासंगे पर रखकर ही तौल दिया है।

अब एक बार फिर कोरोना की ओर लौटते हैं। यह सही है कि सरकार या कोई भी प्रतिष्ठान अपने कर्मचारियों को सेवा या उनके काम के बदले ही तनख्वाह देती है। और काम करने वाले कर्मचारियों को जो आर्डर दिया जाएगा वैसे ड्यूटी उन्हें करनी पड़ेगी।  तभी उनकी तनख्वाह पक सकती है और उसके हकदार हो सकते हैं। लेकिन निकम्मे – कामचोर जैसे शब्दों से नवाजने वाले अफसरों से यह भी पूछा जाना चाहिए कि टीचर स्कूल में बच्चों को पढ़ाने जाता है। टीचर ने बच्चों को स्कूल में आने से मना नहीं किया है।हालात ऐसे हैं कि सरकार ने कोरोना संक्रमण को देखते हुए बच्चों के स्कूल आने पर पाबंदी लगाई है। फिर क्या टीचर अपने स्कूल की दीवारों को देखने के लिए जाएगा। वह भी संक्रमण की इस रफ्तार के बीच में…. जब पता नहीं छोटी सी कौन सी चूक उस टीचर के लिए जानलेवा साबित हो जाए।

हालांकि बाकी के सारे विभागों में काम सामान्य ढंग से चल रहा है और कर्मचारी अपनी ड्यूटी के हिसाब से हाजिर हो रहे हैं। इन विभागों के कर्मचारियों के काम की जरूरत है और पब्लिक डीलिंग वाले विभागों में लोग भी अपने कामकाज के लिए पहुंचते हैं। लेकिन स्कूलों में बच्चों के बिना टीचर की हाजिरी समझ से परे है। जिसे सिर्फ अपनी तनख्वाह पक्की करने के लिए ही रोज जोखिम उठाकर बिना किसी काम के आना – जाना पड़ रहा है और कई लोग संक्रमण के कैरियर भी बन रहे हैं। अब क्या विभाग को हालात़ के बद से बदतर होने का इंतजार है । जब सब कुछ बंद हो जाएगा और शिक्षकों को भी स्कूल आने से मना कर दिया जाएगा। साहब जी…… अगर आपके ही शब्दों में  सही में निकम्मे शिक्षकों की तनख़्वाह के नाम पर सरकार अपने ख़ज़ाने से रुपया लुटा रही है और आपको कोरोना से भी भयानक लग रहे इस आर्थिक समीकरण को लेकर आप वाकई चिंतित हैं तो  कोरोना संक्रमण के हालात बद से बदतर होने के बाद भी अपने इन शब्दों  पर कायम रहना चाहिए और चाहे हालात कितने भी बिगड़ जाएं टीचर को स्कूल में उपस्थिति जरूरी कर देना चाहिए। चाहे बाकी विभागों भी ताला लग जाए। लेकिन स्कूल में ताला नहीं लगना चाहिए।

इसका एक मतलब यह भी मान लेना चाहिए कि विभाग ने बड़े-बड़े अवॉर्ड लेने के बाद पढ़ाई तुँहर दुआर और ऑनलाइन जैसी योजना को अब पिछले साल के कोरोना रिकॉर्ड के साथ बस्ता बंद कर दिया है। लेकिन अभी कोई नहीं जान रहा है कि आने वाला समय कैसा होगा। कई जानकार कहते हैं कि 2020 के बाद 2021 भी इसी तरह गुजरेगा और 2022 के लिए भी पक्के तौर पर कोई गारंटी नहीं दे सकता। तब क्या शिक्षा विभाग बच्चों के लिए स्कूल बंद कर अपने शिक्षकों को इसी तरह बिना काम सिर्फ दौड़ लगवाता रहेगा…… ? और क्या ऐसे में नौनिहालों की शिक्षा के लिए कोई विकल्प बन सकेगा….? शिक्षक तो ड्यूटी पर भी आएंगे और अपनी तनख्वाह भी जीत लेंगे । लेकिन बच्चों का क्या होगा…… ? सीधे मुंह बात करते तो अफसर से इन सवालों को पूछने का मन जरूर करता। लेकिन महान कवि  उनके जैसे अफसरों के लिए ही लिख गए हैं कि… “समरथ को नहीं दोष गुसाईं…….”।

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