विकास के नाम पर 8 गांवों को NTPC का ठेंगा ..5 साल से नहीं हुई प्रबंधन – सरपंचों की बैठक ..ग्रामीणों का सवाल.कौन खा रहा csr का फण्ड

BHASKAR MISHRA
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बिलासपुर—(रियाज अशरफी)— किसी मशहूर शायर ने लिखा है…कहां तय था चरागां हर घर के लिए..कहां मयस्सर नहीं चरागां किसी घर के लिए..यह पंक्तियां हाल फिलहाल सीपत थर्मल पॉवर ताप विद्युत केन्द्र से प्रभावित आठ गांव पर सौ टका खरी उतरती हैं। सीपत थर्मल पावर के स्थापना काल में स्वभाविक करार था कि प्रभावित आठ गांवों का सीएसआर मद से विकास किया जाएगा। हर साल प्रत्येक गांव में 10-12 करोड़ खर्च होंगे।लेकिन गांवों पर खर्च और उनके विकास की बात तो दूर…प्रबंधन की पिछले पांच सालों में आठ गांव के किसी भी प्रतिनिधि के साथ बैठक ही नहीं हुई है। हां..यह आठ गांव धूल फांकने के साथ गंदा पानी पीने को जरूर मजदूर हैं। बावजूद इसके एनटीपीसी प्रबंधन के कान पर जूं नहीं रेंग रहा है। नतीजन आठ गांव के लोग बीस साल पहले की गयी अपनी भूल को लेकर माथा पकड़ किस्मत को जरूर कोश रहे हैं।आज से बीस साल पहले सीपत में सुपर क्रिटिकल पावर की स्थापना हुई। स्थापना काल में लोगों की बड़ी उम्मीदें थी कि कम्पनी में स्थानीय लोगों के लिए रोजगार का दरवाजा खुलेगा। साथ ही गांवों का तेजी से शहरी कल्चर के अनुसार विकास होगा। लेकिन उन्हें क्या पता था कि आने वाले समय में उन्हें विकास नहीं..केवल और केवल विनाश का ही सामना करना होगा।

                     जानकारी देते चलें कि प्रत्येक बड़ी कम्पनियों में सीएसआर फण्ड होता है। फण्ड का उपयोग आस पास के प्रभावित क्षेत्रों के विकास पर होता है। फण्ड भारी भरकम होता है। सीपत स्थित एनटीपीसी का भी अपना सीएसआर फण्ड है। फण्ड करोड़ों का है। फण्ड का बहुत बड़ा हिस्सा नियमानुसार प्रभावित गांवों के विकास पर खर्च होना है। दुर्भाग्य है आठ गांव को आज तक विकास के नाम पर एनटीपीसी ने कानी कौड़ी भी नहीं दिया है।

                               सूत्र ने बताया कि एनटीपीसी प्रभावित क्षेत्रों में आठ गांव शामिल है। प्रभावित गांवों का नाम् सीपत, जांजी, कौड़िया, रांक, दर्राभाठा, कर्रा, रलिया और हरदाडीह है। इन गांवों के विकास पर नियमानुसार एनटीपीसी प्रबंधन को सीएसआर मद से हर साल 10-12 करोड़ रूपए खर्च करना है। लेकिन पिछले पांच साल में एनटीपीसी ने सीएसआर मद से फूटी कौड़ी भी  प्रभावित गांवों के विकास पर खर्च नहीं किया है। 

              सूत्रों की माने तो प्रबंधन का हर साल प्रभावित गांवों के सरपंचों के साथ बैठक होना जरूरी है। बैठक में ग्रामीण जनता के प्रतिनिधि आमजीवन की जरूरतों को प्रबंधन के सामने रखते हैं। इसके बाद प्रबंधन… मांग के अनुसार सभी प्रभावित गांवों में सीएसआर मद से विकास कार्य करता है।

                   चार पांच गांव के सरपंचों ने बताया कि पांच साल से ग्राम विकास की बैठक नहीं हुई है। विकास के नाम पर एक भी रूपया कम्पनी ने नहीं दिया है। मांग करने पर कम्पनी कर्मचारी डरा धमका कर मुंह बन्द कर देते हैं। नियमानुसार हर गांव पर करोड़ों रूपए खर्च होना चाहिए। 

           सरपंचों ने बताया कि एनटीपीसी स्थापना के बाद उम्मीदों के खिलाफ गांव की पहचान मरती जा रही है। गांव की पहचान धूल के बादल, गंदा पानी और राख बनकर रह गयी है। प्रभावित गांवों में इलाज की भी समुचित व्यवस्था नहीं है। तालाब खत्म हो रहे हैं। पर्यावरण संतुलन पुूरी तरह से तबाह हो चुका है। खेत और सड़कों में  राख की परते हैं। प्रदूषण के चलते फसल पैदावार भी बुरी तरह से प्रभावित हुआ है। उडती राख के बीच सांस लेना भी हराम हो गया है। लोग समय से पहले मरने को मजबूर हैं।

                       सरपंचों ने बताया कि ग्राम विकास के मुद्दे और गांवों के विकास पर खर्च होने वाले रूपयों को लेकर एनटीपीसी प्रबंधन पूरी तरह से मौन है। और हम ग्रामवासी अपनी बरबादी का रोना रोने को मजबूर हैं।

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