मेरी नज़र में...

कुदुदण्ड उपचुनाव नतीजे से उठा सवाल–क्या सरकार की प्राथमिकता से बाहर हो गया शहरी इलाक़ा…?क्या उम्मीदें पूरी नहीं कर पा रहे नगरीय निकाय…? 

( गिरिजेय ) “बिलासपुर नगर निगम के अंदर आने वाले कुदुदंड ( विष्णु नगर ) वार्ड नंबर 16 के उपचुनाव में पिछले चुनाव के मुक़ाब़ले कांग्रेस के वोट बढ़ गए….. भाजपा और निर्दलीय के वोट घट गए….। भाजपा ने पिछले चुनाव में करीब 1900 वोट हासिल किए थे। इस बार उसे करीब 1611 मिले। कांग्रेस को पिछली बार 900 वोट मिले थे… इस बार 1346 वोट मिले …..। इसी तरह निर्दलीय उम्मीदवार के वोट भी 12 सौ से घटकर 946 पर आ गए……। कांग्रेस पिछले चुनाव में तीसरे नंबर पर थी… इस बार दूसरे नंबर पर आ गई…।

फिर भी भाजपा जीत गई…..।” उपचुनाव में बीजेपी की जीत के बाद सामने आ रहा यह गणित सरल नहीं है और बीजगणित की तरह उलझा हुआ है। एक पार्टी वोट बढ़ाकर भी हार जाती है और दूसरी पार्टी वोट घटने के बाद भी जीत जाती है। इस उलझे हुए गणित को अगर बड़े पैमाने पर फैला कर देखा जाए तो लगता है कि नंबरों के हिसाब से कहीं अलग कुछ ऐसा भी है जिसे सामने रखकर शहरी वोटर के मन की थाह को नापा जा सकता है।

और इस उपचुनाव में जीत – हार के गणित को प्रदेश की मौज़ूदा सरकार और नगर निगम के कामकाज़ के हिसाब़ – क़िताब़ से भी जोड़ा जा सकता है ।सवाल तो यह भी बनता है कि क्या शहरी आब़ादी सूब़े की सरकार की प्राथमिकता में कहीं नीचे चली गई है…..? ज़िससे नगर निगम शहरवासियों की उम्मीदों में ख़रा साबित नहीं हो पा रहा है…? जो कांग्रेस की हार का बड़ा कारण बन रहा है । सवाल तो बिलासपुर शहर में कांग्रेस की एकजुटता और मज़ब़ूती पर भी उठ रहे हैं…। पार्टी में ब़िख़राव और ख़ीचतान भी इस उपचुनाव में छिप नहीं सकी है। जो इस साल होने वाले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए चुनौती का कारण बन सकती है….।

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वैसे तो किसी नगरीय निकाय के एक वार्ड के चुनाव के नतीज़ों को सामने रखकर बहुत बड़ा आकलन करना ज़ायज़ नहीं होगा । लेकिन चुनाव तो चुनाव है….। और चावल के एक दाने से भात पकने का अंदाज़ लगाने वाला पुराना नुस्खा आजमाया जाए तो बहुत कुछ समझा भी जा सकता है।

जाहिर सी बात है कि नगर निगम की राजनीति से ही बिलासपुर शहर की राजनीत चलती है। इस लिहाज से नगर निगम के दायरे में होने वाले किसी भी चुनावी मुकाबले के नतीजों से संकेतों को समझा जा सकता है। इस नजरिए से कुदुदंड उपचुनाव में कांग्रेस की हार से पार्टी के प्रति लोगों की नाराजगी की झलक मिल रही है। समझा यह भी जा सकता है कि लोग नगर निगम के कामकाज और तौर तरीके से खुश नहीं है।

यदि इस मामले में तह तक जाकर कुछ समझने की कोशिश की जाए तो यह समझ पाना कठिन नहीं है कि छत्तीसगढ़ की मौजूदा सरकार से नगरीय निकायों को मिल रही मदद काफी नहीं है। जिससे लोगों की उम्मीदें पूरी नहीं हो पा रही हैं और लोग नगरीय निकाय के कामकाज से संतुष्ट नजर नहीं आते।

बिलासपुर नगर निगम के एक कुदुदंड वार्ड ही नहीं बल्कि चिरमिरी, बाराद्वार, रायगढ़ नगर निगम वार्डों के उपचुनाव में जिस तरह कांग्रेस उम्मीदवारों को हार का सामना करना पड़ा है, उससे यह सवाल भी उठ रहा है कि छत्तीसगढ़ सरकार की प्राथमिकता में शहरी क्षेत्र कहां पर है… ? हालत यह है कि जनप्रतिनिधियों को मिलने का भी समय नहीं मिल पा रहा है। जिससे वे अपने निकाय की माली हालत और दूसरी योजनाओं के बारे में सरकार के सामने अपने हालात रख सके। बजट के बारे में यह स्थिति बताई जा रही है कि स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के नाम पर ही बजट मिल रहा है। इस प्रोजेक्ट में 50 फ़ीसदी राशि राज्य सरकार को देना है। और यह राज्य सरकार की मजबूरी भी है यदि राज्य सरकार का हिस्सा नहीं मिला तो केंद्र से भी फंड नहीं मिल पाएगा ।

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इस लिहाज से छत्तीसगढ़ नगर निगम को मिलने वाला बजट स्मार्ट सिटी के हिस्से में चला जाता है। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के दायरे में पूरा शहर शामिल नहीं है। बल्कि कुछ वार्ड ही शामिल किए गए हैं। स्मार्ट सिटी का पैसा तो पूरे शहर के नाम पर मिल रहा है। लेकिन फंड सिर्फ कुछ वार्डों तक ही सीमित है । जिसके चलते नगरीय निकाय के क्षेत्र में आने वाले पूरे हिस्सों में बहुत सारे काम अटके हुए हैं और नए काम भी शुरू नहीं हो पा रहे हैं। चुने हुए प्रतिनिधि अपने आप को असहाय भी पा रहे हैं। क्योंकि स्मार्ट सिटी के प्रबंधन में पूरी तरह से अफसरशाही हावी है और चुने हुए पार्षद ,महापौर ,सांसद, विधायक किसी भी दर्जे के नुमाइंदों को इसमें शामिल नहीं किया गया है। लिहाजा इस प्रोजेक्ट में उनकी कोई भूमिका भी नजर नहीं आ रही है। जाहिर सी बात है कि मतदाताओं के बीच सीधे जुड़े जनप्रतिनिधि अपनी जवाबदेही पूरा कर पाने में नाकाम नजर आ रहे हैं।

जनप्रतिनिधियों की ऐसी हालत आने वाले विधानसभा चुनाव में भी कांग्रेस के लिए तकलीफ देह हो सकती है।मौक़ा देखकर पूर्व मंत्री अमर अग्रवाल भी विकास खोजो अभियान चलाकर शहर के मतदाताओं को मैसेज़ देने में पीछे नहीं रहे….। और कुदुदण्ड उपचुनाव में ज़ीत हासिल कर बीजेपी को भी जीत का जश्न मनाने का मौक़ा मिल गया है।

वैसे कुदुदंड उपचुनाव में कांग्रेस की हार के पीछे पार्टी के अंदर के बिखराव को भी जिम्मेदार माना जा सकता है। पूरे उपचुनाव में कांग्रेस एकजुट नजर नहीं आई….। न तो जीतने का जज्बा दिखाई दिया और ना ही कोई टीमवर्क ही सामने आया। हालांकि कांग्रेस ने तारबाहर चुनाव में जिस तरह महापौर रामशरण यादव को वहां प्रभारी बनाया था । एक ज़िम्मेदार पदाधिकारी को प्रभारी बनाकर पूरी टीम को ज़िम्मेदारी दी गई थी और कांग्रेस ने तारबाहर उपचुनाव में ज़ीत भी हासिल की थी । उस तरह से कुदुदंड में किसी को प्रभारी नहीं बनाया गया।

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अलबत्ता एक कमेटी गठित की गई। इस कमेटी और शहर के बड़े कांग्रेस नेताओं के बीच तालमेल की कमी भी पूरे चुनाव के दौरान बनी रही। कांग्रेस के लोग एकजुट होकर मतदाताओं से सीधा संपर्क करते तो चुनाव के नतीजे कुछ और हो सकते थे। चुनाव में तालमेल की कमी के साथ ही श्रेय की होड़ का भी असर लोगों ने देखा। भीतर झांक कर देखने वालों को समझ में आता है कि बिलासपुर शहर में कांग्रेस के नेताओं की संख्या कम नहीं है । लेकिन चुनाव में जीत का श्रेय किसी और को ना मिल जाए…. इस लड़ाई में सभी ने अपने आप को समेट लिया।

कुदुदंड का उपचुनाव जिस समय हुआ है ,उसी साल विधानसभा के चुनाव होने वाले हैं। कांग्रेस के भीतर चल रही खींचतान , ख़ेमेबाजी और अहम की लड़ाई अगर इसी तरह कायम रही और इसका असर विधानसभा चुनाव में भी नजर आए तो हैरत की बात नहीं होगी। कांग्रेस के लोग कुदुदंड चुनाव में अपने वोट बढ़ने…. भाजपा और निर्दलीय उम्मीदवार के वोट घटने का पूरा गणित तो समझा रहे हैं…..।

लेकिन यदि शहरी क्षेत्र सरकार की प्राथमिकता में ऊपर नजर ना आए …… नगर निगम की हालत को देखने वाला कोई ना हो और पार्टी के अंदर बिखराव को समेटने की कोशिश ना हो तो ऐसे ही अंक गणित में उलझकर कांग्रेस को अपना सवाल हल करने में मशक़्क़त करनी पड़ेगी ।

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