MP में अंतरविभागीय संविलयन में आड़े आ रहे विभागों के आदेश..शिक्षकों को नहीं मिल रहा लाभ..संगठन ने जताया विरोध

भोपाल।मध्यप्रदेश में लोक शिक्षण विभाग ने अध्यापक संवर्ग के अन्तर जिला अंतर विभागीय संविलियन के लिये जारी किये थे। ये संविलियन शिक्षा विभाग और आदिवासी विभाग में भी हुए थे जिसकी  लिस्ट निकल चुकी थी।  शिक्षको की कमी का हवाला देते हुए अंतर जिला/ अंतर विभाग में संविलियन के आदेश हो चुके अध्यापक,सहायक अध्यापक, वरिष्ठ अध्यापको को कार्य मुक्त न किये जाने का आदेश जनजातीय कार्य विकास विभाग ने जारी कर दिया है। विभाग के इस आदेश से मध्यप्रदेश के अध्यापकों में रोष व्याप्त है। इस आदेश पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए संचालक सदस्य अध्यापक संघर्ष समिति मप्र /कोर टीम मेंबर NMOPS & भोपाल प्रभारी हीरानन्द नरवरिया  ने बताया कि जनजातीय कार्य  विभाग द्वारा जारी आदेश निंदनीय है ।इसे तत्काल वापस लिया जाना चाहिए ।उन्होने कहा कि राज्य शासन द्वारा अध्यापक की स्थान्तरण ( संविलियन )की नीति बनाई गई थी ।जिसमे हर प्रकार बंधन और शर्तों के बाद  कुछ लोगों को अपने गृह क्षेत्र जाने का अवसर प्राप्त हुआ था। इन सब नियमो के बाद जनजातीय कार्य विभाग यह कहता है ,कि जिनका संविलियन हुआ है वे कार्यमुक्त नही किये जायें । इस प्रकार  के आदेश  जारी करने के पीछे जनजातीय कार्य विभाग की क्या मंशा है समझ से परे है । ऐसे विभाग के अधिकारियों के विरूद्ध सख्त कार्यवाही होना चाहिए ।और आदेश ततकाल वापस होना चाहिए।

वही इस आदेश पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए अध्यापक संघर्ष समिति मध्यप्रदेश प्रान्तीय सदस्य रमेश पाटिल ने बताया कि जनजातीय विभाग के अंतरनिकाय संविलियन मे पात्र अध्यापकों को कार्यमुक्त न करना पूरी संविलियन प्रक्रिया को संदेहास्पद बनाता है।मंत्री और नौकरशाह मे तालमेल की कमी को दिखाता है। यह विभागीय कमी को दिखाता है कि किसी भी योजना को विवादास्पद स्वयं विभाग ही बना देता है और इन सब का शिकार अध्यापक शिक्षक हो जाता है।शासन को चाहिए की अंतरनिकाय संविलियन का पदांकन होते ही तत्काल प्रभाव से कार्यमुक्त कर देना चाहिए।इसमे शिक्षा विभाग और आदिम जाति विभाग का भेद नही होना चाहिए।घर वापसी के लिए तरस रहे अध्यापको को यूं ही परेशान किया जाता रहा तो संतप्त अध्यापको से शैक्षणिक गुणवत्ता की उम्मीद भी नही की जानी चाहिए।विगत कुछ  वर्षो से शासन के शिक्षालयों मे किये गये प्रयोग और योजनाओ की असफलता ना शिक्षा, ना शिक्षक, ना शिक्षार्थी, ना शाला के हक मे है।

मालूम हो कि पिछले कई महीनों पहले मध्यप्रदेश सरकार ने संविदा शिक्षको ,अध्यापकों के अन्तर्निकाय संविलियन (ट्रांसफर) के लिय आवेदन मंगवाए गए थे  ।इसके बाद  अन्तर्निकाय संविलियन की लिस्ट भी जारी कर दी गई थी । पर आदिवासी विभाग का आदेश अध्यापकों के  ट्रांसफर  पर पानी फेर सकता है। मध्य प्रदेश के इस आदेश पर छत्तीसगढ़ में भी चर्चाओं का दौर चल रहा है। छत्तीसगढ़ के शिक्षक मोर्चा के संचालक विकास सिंग राजपूत ने इस मामले में कहा है कि मध्यप्रदेश की इस स्थान्तरण नीति पर हमारी भी नज़र है। इसमेंआखिर में पेच लग ही गया है।

विकास ने बताया कि छत्तीसगढ़ में शिक्षक मोर्चे  ने जो  9 सूत्रीय ज्ञापन सरकार को दिया है उसने  एक प्रमुख मांग  खुली स्थान्तरण नीति की रखी गई है ।  खुली ट्रांफसर नीति और संविलियन आदेश से ही सरकार शिक्षको के अच्छे दिन ला सकती खुली स्थांतरण नीति व्यवहारिक है। वहीं संयुक्त शिक्षा कर्मी की प्रंतीय उपाध्यक्ष माया सिंह ने बताया कि मध्य प्रदेश में हमारे शिक्षक बंधुओं को अधिकारी  आदेश  के नए नए तीर चला रहे है। एक विभाग की हाँ दूसरे विभाग की ना ने शिक्षको का मनबोल तोड़ने का  काम किया है।ऐसा छत्तीसगढ़ में न हो इस लिए हम मुक्त स्थान्तरण नीति की वकालत करते है। माया सिंह ने बताया कि मध्यप्रदेश की इस अन्तर् जिला/अन्तर निकाय संविलियन (ट्रांसफ़र) प्रक्रिया अपनाई गई है उसमें  शिक्षक पति-पत्नी को भी कोई विशेष लाभ नही है। पति पत्नि शिक्षा कर्मी शासन की गलत नीति की वजह से मानसिक रूप से प्रताड़ित हो रहे है।

Comments

  1. By Chandra shekhar soni

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