छत्तीसगढ़ व बिलासपुर में कोरोना संक्रमितों के आंकड़ों पर कैसे करें भरोसा.?जब RTPCR रिपोर्ट मिलने में कई दिन लग रहे,तो कैसे दिखेगी आज की असली तस्वीर?

बिलासपुर । छत्तीसगढ़ में रोज़ सामने आ रहे कोरोना संक्रमण के आंकड़े डरावने हैं……। हालात बेकाबू हो रहे हैं….। आंकड़े भयावह हैं…….। स्थिति गंभीर होती जा रही है…..। मीडिया में रोज आ रही इस तरह की खबरों को लिखते हुए भयावहता को परिभाषित करने वाले अब करीब-करीब सारे शब्दों का विशेषण के रूप में इस्तेमाल हो चुका है। लेकिन कोरोना की दूसरी लहर का कहर शुरू होने के बाद प्रदेश में जो हालात बन रहे हैं ……सभी के सामने हैं। हालात का विश्लेषण करने के लिए लोगों के पास रोज सामने आ रहे आंकड़े ही प्रमुख आधार हैं। लेकिन आरटीपीसीआर टेस्ट का एक और पहलू भी है कि एकाएक टेस्टिंग कराने वालों की तादाद काफी बढ़ जाने की वजह से कई – कई दिन तक रिपोर्ट नहीं मिल पा रही है।हमारे व्हाट्सएप न्यूज़ ग्रुप से जुड़े व रहे लेटेस्ट खबरों से अपडेट

तब इस सवाल पर भी सोचने की जरूरत महसूस हो रही है कि क्या छत्तीसगढ़ रोज सामने आ रहे कोरोना संक्रमण के आँकड़े ताजा तस्वीर का सही ढंग से प्रदर्शन कर पा रहे हैं। यदि जांच रिपोर्ट सामने आने में छह-सात दिन से भी अधिक का वक्त लग रहा है तो फिर कैसे मान लिया जाए की ताजा आंकड़े ताजा तस्वीर को सही ढंग से बयां कर रहे हैं…. ?कोरोना संक्रमण जिस रफ्तार से बढ़ रहा है ,उससे सभी चिंतित हैं। लेकिन इस बार चिंता की बड़ी बात यह है कि पिछले करीब एक पखवाड़े से छत्तीसगढ़ में संक्रमण के आंकड़े पुराने रिकॉर्ड को तोड़ते हुए तेजी से आगे बढ़ रहे हैं।

कोरोना की शुरुआत के बाद पिछले साल सितंबर में पीक टाइम आया था। उस पिक टाइम के आंकड़े अब काफी पीछे छूट गए हैं और आज सामने आ रही गिनती लोगों को डरा रही है । सिर्फ आंकड़े ही नहीं इस बार के वायरस के हमले का अँदाज़ भी पहले से बदला हुआ है। जब एक संक्रमित व्यक्ति से करीब-करीब पूरा परिवार भी संक्रमित हो रहा है। अस्पतालों में बेड नहीं मिलने की खबरें भी सुर्खियों में है। इंजेक्शन की कमी और दूसरी ऐसी दिक्कतें भी पेश आ रही हैं । जो पिछले साल कोरोना के दौर में देखने को नहीं मिली थी। इसके साथ ही टेस्टिंग को लेकर भी चिंताजनक स्थिति सामने आ रही है।

यह सब लिखने के पीछे लोगों को डराना या फैलाना हमारा मकसद नहीं है। लेकिन इस बार टेस्टिंग की स्थिति भी बड़ी चिंताजनक नजर आ रही है। आमतौर पर कोरोना टेस्ट की जो रिपोर्ट अधिकतम 48 घंटे में मिल जाती थी। उसमें अब कई -कई दिन का समय लग रहा है। बिलासपुर शहर में अपने आसपास ही ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे…. जहां लोगों ने करीब 5 से 6 दिन पहलेअपना टेस्ट कराया है। उन्हें एंटीजन की रिपोर्ट तो तुरंत बता दी गई।

लेकिन आरटी पीसीआर की रिपोर्ट अब तक नहीं मिली है। शुक्रवार को जब मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने राजधानी में पत्रकारों की ऑनलाइन मीटिंग ली तब भी यह मुद्दा उनके सामने उठाया गया था। एक पत्रकार ने तो यह भी जानकारी दी थी कि उनके अपने चैनल दफ्तर में काम करने वाले लोगों के सैंपल 3 अप्रैल को लिए गए हैं । 9 तारीख तक उनकी आरटीपीसीआर रिपोर्ट नहीं मिली थी। इस तरह के उदाहरणों से यह साफ है कि न्यायधानी से लेकर राजधानी तक टेस्टिंग कराने वालों की तादात बढ़ने से रिपोर्ट मिलने में भी देरी हो रही है।

जानकार बताते हैं कि ऐसी हालत में सिम्टम वाले मरीजों का इलाज हो पा रहा है। वे या तो होम आइसोलेशन पर रखे गए हैं या तबीयत अधिक बिगड़ने पर अस्पताल में भर्ती किए जा रहे हैं। लेकिन टेस्ट कराने वाले जिन लोगों के शरीर में कोई सिम्टम नहीं नजर आ रहे हैं….. जाहिर सी बात है कि रिपोर्ट मिलने से पहले उनके सामने भी भ्रम और अनिश्चितता की स्थिति है। जिससे वे या तो सामान्य ढंग से लोगों से मिलना -जुलना और आना-जाना कर रहे हैं या फिर जागरूकता का परिचय देते हुए रिपोर्ट के इंतजार में खुद को होम आइसोलेशन पर रखे हुए हैं।

रिपोर्ट मिलने में हो रही देरी का संबंधित मरीज के इलाज या संक्रमण फैलने के मामले से जो भी संबंध हो । लेकिन सतही तौर पर इसे समझने के लिए रॉकेट साइंस की जरूरत नहीं है कि अगर रिपोर्ट आने में देरी हो रही है इसका मतलब साफ है कि मौजूदा आंकड़े हाल के दिनों के नहीं है। अलबत्ता यह आंकड़े कई दिन पुराने हो सकते हैं। यानी अभी जो संक्रमण के आंकड़े आ रहे हैं, उनके सैंपल कम से कम पांच 7 दिन पहले लिए गए होंगे। फिर यह सवाल उठना लाजिमी है कि हाल के दिनों में लिए गए सैंपल की रिपोर्ट क्या है….?

मुमकिन है कि कोरोना संक्रमण की रफ़तार को देखकर कोई भी यही अनुमान लगाएगा की हाल के दिनों में लिए गए सैंपल की रिपोर्ट मिलने से आंकड़े और बढ़ सकते हैं। हालांकि आंकड़ों में गिरावट की भी उम्मीद की जा सकती है। लेकिन आज के दौर में बढ़ती संख्या घर, मोहल्ले, अस्पताल ,मुक्तिधाम से आ रही खबरों को देखते हुए लोगों के मन में यही डर शमाता जा रहा है कि हम इस समय जिन आंकड़ों के भरोसे हालात को बदतर मान रहे हैं, वास्तविक में आंकड़े सामने आएंगे तो हालात बद से बदतर नजर आने लगेगें।

कोरोना की जिस महामारी ने पूरी दुनिया में मानव जीवन के सामने बड़ा संकट खड़ा कर दिया है उसे लेकर इस तरह की स्थिति भयंकर लापरवाही और गैर जिम्मेदारी की ओर भी इशारा करती है। जाहिर सी बात है कि अगर समय पर जांच नहीं होगी और समय पर जांच की रिपोर्ट सामने नहीं आएगी तो इस महामारी से बचाव के लिए या लोगों को इसके कह़र से सुरक्षित रखने के लिए कोई भी सिस्टम आखिर क्या कर पाएगा…. ? व्यवस्था के जिम्मेदार लोग इस सवाल से भी नहीं बच सकते की क्या महामारी की दस्तक के साल भर बाद भी हमने अपने तजुर्बे से कुछ भी नहीं सीखा….. ?

हालांकि सरकार – प्रशासन नाम की चीज इसे लेकर जिम्मेदारी से काम भी कर रही है और ऐसा करते हुए दिख भी रही है। लेकिन जांच रिपोर्ट मिलने में हो रही देरी को देखते हुए यह समझना आसान है की सिस्टम कितना दुरुस्त है। साल भर से जानकार बार-बार यही दोहरा रहे हैं कि टेस्टिंग बढ़ाने से ही महामारी से मुकाबला किया जा सकता है। इस सूत्र वाक्य को पकड़कर पिछले साल के मुकाबले संसाधनों में काफी बढ़ोतरी भी की गई है। जहां पिछले साल कोरोना की जाँच के लिए सैंपल दूसरे प्रदेशों में भेजा जाता था। वहां अब जिला स्तर पर भी जांच की सुविधा हो गई है । लेकिन लगता है कि पिछले साल के मुकाबले इस साल चुनौतियां और बढ़ गई हैं। टेस्ट कराने वालों की तादाद बढ़ने की वजह से अब संसाधन कम पड़ रहे हैं। जिससे लोगों को जांच के बाद अपनी रिपोर्ट के लिए कई -कई दिन तक इंतजार करना पड़ रहा है। ऐसी हालत में सुरक्षा के उपाय और इलाज – पानी में भी विपरीत असर पड़ना लाजिमी है।

जानकारी यह भी मिली है कि हाल के दिनों में हालात का जायजा लेने के लिए बिलासपुर पहुंची उच्च स्तरीय टीम के सामने यह समस्या रखी गई थी और सिम्स में आरटीपीसीआर की जांच के लिए एक और सिस्टम की मांग की गई थी। जिस पर सहमति जताते हुए भरोसा दिलाया गया था कि एक-दो दिन के भीतर यह कमी दूर कर दी जाएगी। अब तक इस मामले में क्या कुछ हो सका है ….इसकी खबर नहीं मिली है। लेकिन यह खबर पक्की है की कई लोग अपनी रिपोर्ट का इंतजार कई दिनों से कर रहे हैं।

हालात यह भी है कि गंभीर मरीजों को इलाज से पहले डॉक्टर भी आरटीपीसीआर जांच कराने की सलाह दे रहे हैं और इसकी रिपोर्ट मिलने पर ही आगे के ट्रीटमेंट की बात करते हैं। लेकिन ऐसे मरीज के सामने बड़ा संकट है कि क्या वह अपना सैंपल देकर पांच 7 दिन तक रिपोर्ट का इंतजार कर सकता है । रिपोर्ट मिलने में हो रही देरी से हम सही तस्वीर जानने में पिछड़ते जाएंगे और फिर हालात पर काबू पाना उतना ही कठिन होता जाएगा। कोरोना महामारी से निपटने का मोर्चा संभाले व्यवस्था के जिम्मेदार लोग और सिस्टम की इस बारीकी को समझने वाले लोगों को भी इस हालत पर सोचने की जरूरत महसूस की जा रही है। जिससे सही समय पर जांच और सही समय पर रिपोर्ट भी मिल सके। तभी कोरोना संक्रमितों के ताजा आंकड़े सामने आ सकेंगे और आगे का एक्शन प्लान बनाने में मदद मिल सकेगी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *