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किस मुद्दे पर सिमट रही Chhattisgarh की चुनावी राजनीति…?   

(रुद्र अवस्थी) गणित का सीधा और सरल सा सवाल है – यदि सौ लाख़ टन धान की ख़रीदी की जाती है तो किसानों के ख़ाते में कितने रुपए जमा होंगे..? उत्तर आएगा – 20 हज़ार चार सौ करोड़ रुपए …। फ़िर एक और सवाल आता है- यदि प्रदेश में पचीस लाख किसान धान बेच रहे हैं तो कम से कम कितने परिवारों तक पैसा पहुंच रहा है…? ज़वाब आएगा – पचास लाख…। गणित के इन सवालों को यदि छत्तीसगढ़ की सियासत की स्लेट पर लिखकर बूझने की कोशिश करें तो इसके और भी मायने निकाले ज़ा सकते हैं …. और यह बूझना कठिन नहीं होगा कि धान से किस तरह छत्तीसगढ़ की सियासत का नाता जुड़ गया है।

इसके आगे जोड़ते जाइए कि छत्तीसगढ़ के सीएम भूपेश बघेल किस तरह सौ लाख टन धान की खरीदी को अपनी सरकार की सबसे उपलब्धि बताकर दावा करते हैं कि किसानों – मज़दूरों की जेब में पैसा आने से प्रदेश की ख़ुशहाली बढ़ी है….। तो दूसरी तरफ़ बीजेपी दावा कर रही है कि केन्द्र सरकार के पैसे से एक करोड़ टन धान की ख़रीदी हो रही है और वह अंबिकापुर कार्यसमिति की बैठक के दौरान पीएम नरेन्द्र मोदी के अभिनंदन का प्रस्ताव पारित कर रही है।

धान के कटोरे में सियासत की फ़सल काटने की इस होड़ से समझा जा सकता है कि किसान- धान और छत्तीसगढ़ी कल्चर किस तरह राजनीति के केन्द्र में सिमट रहा है। शहरी इलाके में भले ही इस पर बहस सुनाई ना दे । लेकिन जिस प्रदेश में साठ – सत्तर फ़ीसदी से अधिक लोग गाँव- खेती – किसानी से जुड़े हों और जहां पर ये सब़ ज़िंदगी का हिस्सा हो… वहां धान के मुद्दे पर बातचीत लाज़िमी है और यह मान लेने में कोई दिक़्क़त नहीं है कि यह मुद्दा आने वाले समय में भी चुनाव पर अपना असर डाल सकता है।

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धान छत्तीसगढ़ की प्रमुख़ फ़सल है ।ज़ाहिर सी बात है कि छत्तीसगढ़ की इकॉनामी से धान का सीधा रिश्ता है। किसान को उसकी उपज का सही दाम मिले और उसकी ज़ेब में रुपया आए तो बाज़ार में भी ख़ुशहाली आती है। समर्थन मूल्य पर धान की ख़रीदी अविभाजित मध्यप्रदेश के ज़माने से ही … काफ़ी पहले से होती रही है। लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद जब अजीत जोगी पहले मुख्यमंत्री बने, तब यह मुद्दा लाइम लाइट में आया था । उसके बाद से लम्बे समय तक बीजेपी की सरकार रही । तब भी ख़रीदी होती रही ।

हर साल धान खरीदी का आंकड़ा बढ़ता रहा। लेकिन यह मुद्दा एक बार फ़िर लाइमलाइट में आया जब 2018 के पिछले विधानसभा चुनाव के समय कांग्रेस ने अपने घोषणा पत्र में वादा किया कि उनकी सरकार आई तो 25 सौ रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से धान खरीदेगी । राजनीतिक पण्डित भी मानते हैं कि उस चुनाव में इसका सबसे बड़ा असर हुआ था और आख़िरी समय में बाज़ी पलट गई थी । दलील दी जाती है कि नई सरकार बनने के बाद ही किसान बड़े पैमाने पर धान बेचने सोसाइटियों में पहुंचे।

उन्हे उम्मीद थी कि कांग्रेस सरकार बनने के बाद ही उन्हे 25 सौ रुपए क्विंटल के हिसाब से धान की कीमत मिलेगी। उनकी उम्मीदों को पूरा करते हुए सूब़े के नए मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने सबसे पहले यही काम किया ।पिछले चार साल में धान ख़रीदी का आँकड़ा लगातार बढ़ता गया है।कांग्रेस की सरकार बनी तो पहले साल 84 लाख मिट्रिक टन धान खरीदी हुई थी । पिछले सीज़न में यह आंकड़ा 98 लाख मिट्रिक टन पर पहुंच गया था । चालू सीज़न में सौ लाख टन की गिनती पार हो गई है।यदि सौ लाख मिट्रिक टन पर हिसाब लगाएं तो धान ख़रीदी के तुरंत बाद किसानों के ख़ाते में दो हज़ार चालीस रुपए प्रति क्विंटल समर्थन मूल्य के हिसाब़ से बीस हज़ार चार सौ करोड़ रुपए जमा हो रहे हैं। इसके बाद सरकार किश्तों में बोनस की रक़म ज़मा करती है।ऐसे में किसानों को 26 हज़ार चार सौ करोड़ रुपए मिलेंगे।

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यह इत्तफ़ाक है कि जिस समय सीएम भूपेश बघेल भेट – मुलाक़ात के दौरान तखतपुर इलाक़े के दौरे पर थे , उसी समय यह आंकड़ा सामने आया कि सौ लाख टन से अधिक धान की ख़रीदी की जा चुकी है। उन्होने कहा कि धान ख़रीदी का रिकॉर्ड हर साल टूट रहा है। धान की पैदावार भी बढ़ रही है। धान बेचने वाले किसानों की संख़्या भी बढ़ रही है। किसानों – मज़दूरों की ज़ेब में पैसा आ रहा है । इससे प्रदेश की आर्थिक स्थिति मज़बूत हो रही है। सीएम भूपेश बघेल ने यह भी कहा कि इस बार एक सौ दस लाख मिट्रिक़ टन धान ख़रीदने का लक्ष्य रखा गया है।

सौ लाख टन धान ख़रीदी का रिकॉर्ढ सामने आने के बाद बीजेपी ने भी यह कहकर अपना रिश्ता जोड़ लिया कि केन्द्र सरकार के पैसे से खरीदी की गई है। अंबिकापुर में बीजेपी की प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के दौरान राजनीतिक प्रस्ताव में सौ लाख टन धान ख़रीदी के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अभिनंदन किया गया । इस तरह बीजेपी धान ख़रीदी को लेकर कांग्रेस सरकार को अकेले श्रेय नहीं देना चाहती ।

पार्टी के लोग समय – समय पर धान ख़रीदी से जुड़ी समस्याओं की ओर इशारा भी करते रहे हैं। भारतीय किसान संघ बिलासपुर जिला इकाई के अध्यक्ष धीरेन्द्र दुबे कहते हैं कि केन्द्र सरकार सेन्ट्रल पुल में छत्तीसगढ़ से चाँवल लेती है। इस आधार पर ही प्रदेश में धान की ख़रीदी होती है। केन्द्र ने चाँवल का कोटा बढ़ाया है, लिहाज़ा धान की अधिक ख़रीदी हुई है। धीरेन्द्र दुब़े यह भी जोड़ते हैं कि छत्तीसगढ़ में धान की उपज बढ़ी है। लेकिन सोसाइटी में हर एक किसान से प्रति एकड़ पन्द्रह क्विंटल ही धान की ख़रीदी की जाती है। जो कम है। इसकी वज़ह से किसानों को औने – पौने दाम पर अपना बाक़ी धान बेचना पड़ता है। केन्द्र सरकार ने 2018 के बाद धान का समर्थन मूल्य बढ़ाया है। इसका लाभ भी किसानों को मिल रहा है।

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लेकिन कांग्रेस नेता और जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष प्रमोद नायक का मानना है कि छत्तीसगढ़ में किसानों की बेहतर हालत का पूरा श्रेय मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की अगुवाई में चल रही कांग्रेस सरकार को जाता है। हमसे बातचीत में उन्होने साफ़ किया कि प्रदेश सरकार लोन लेकर कोऑपरेटिव सोसाइटियों के ज़रिए धान की खरीदी करती है। पूरा इंतज़ाम सरकार की देख़रेख़ में होता है। मुख़्यमंत्री ने हमेशा इसे अपनी प्राथमिकता में सब़से ऊपर रखा है। किसानों को दाम मिलने के साथ ही उनकी दूसरी ज़रूरतों को भी समय पर पूरा करने में सरकार कभी पीछे नहीं रही । जिससे लोगों का रुझान खेती की ओर बढ़ा है और ख़ुशहाली आ रही है।

बहरहाल कुछ तो आँकड़े बोलते हैं …. और कुछ राजनीति से जुड़े लोगों की बातों से भी समझ में आता है। जिसका लब्बोलुआब़ यह है कि छत्तीसगढ़ में गाँव-किसान और खेती भी एक बड़ा मुद्दा है। धान के कटोरे में राजनीति इन मुद्दों के ईर्द – गिर्द भी घूमती नजर आ रही है। ज़ाहिर सी बात है कि जो मुद्दे इकॉनामी को प्रभावित करते हैं…. पॉलिटिक्स पर भी अपना असर डाल सकते हैं । लिहाज़ा श्रेय की होड़ भी है …. और अपनी – अपनी दावेदारी भी है। धान ख़रीदी केन्द्रों पर लगे धर्मकाँटा की तरह दावेदारी के इस नापतौल पर भी लोगों की नज़रें टिकी हुईं हैं….। और छत्तीसगढ़ के अन्नदाता ही समय आने पर बता सकते हैं कि किसके हिस्से में क्या है…?

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