मेरा बिलासपुर

नौकरी के नाम पर देश में ठगी के बड़े गिरोह का पुलिस ने किया भंडाफोड़

पुलिस ने नौकरी के नाम पर झांसा देकर ठगी करने वाले एक बड़े गिरोह का पर्दाफाश

भुवनेश्वर-ओडिशा पुलिस ने नौकरी के नाम ठगी करने वाले एक बड़े गिरोह का भंडाफोड़ किया है और मामले के एक अहम आरोपी को उत्तर प्रदेश से गिरफ्तार कर लिया है। ओडिशा पुलिस की आर्थिक अपराध शाखा (ईओडब्ल्यू) ने कहा कि उसने उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ से नौकरी के नाम पर युवकों के साथ चल रहे धोखाधड़ी के बड़े मामले का खुलासा किया है। ठगी करने वाले इस गिरोह ने कम से कम पांच राज्यों – गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल और ओडिशा में बेरोजगार युवाओं को निशाना बनाया।

ओडिशा पुलिस के अनुसार, ईओडब्ल्यू ने इस मामले के मुख्य आरोपी जफर अहमद (25) को गिरफ्तार किया है। यह शख्स उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ के सिविल लाइंस का रहने वाला है।

जफर पेशे से इंजीनियर (बीटेक) हैं और इस बड़े फ्रॉड के मास्टरमाइंड में से एक हैं। गिरफ्तारी के बाद उसे अलीगढ़ की एक स्थानीय अदालत में पेश किया गया। कोर्ट ने 5 दिन की ट्रांजिट रिमांड मंजूर की। अब उसे भुवनेश्वर की अदालत में पेश किया जाएगा।

ईओडब्ल्यू डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल जेएन पंकज ने कहा, ‘आरोपियों को गिरफ्तार करने में हमारी सहायता करने के लिए हम उत्तर प्रदेश की अलीगढ़ पुलिस के बहुत आभारी हैं। इस प्रक्रिया में अन्य लोगों की संलिप्तता और जालसाजों द्वारा जमा की गई बड़ी राशि का पता लगाने के लिए जांच अभी भी जारी है।’

50 हजार लोगों को ठगे जाने की आशंका

पुलिस ने कहा कि शुरुआती अनुमानों से पता चलता है कि देश भर में कम से कम 50,000 नौकरी चाहने वालों को ठगा गया। ओडिशा पुलिस ने कहा कि ठगी की रकम करोड़ों में है। यह घोटाला उत्तर प्रदेश के कुछ युवकों द्वारा किया गया है जो तकनीक में पारंगत हैं और इस काम के लिए कुछ एक्सपर्ट वेबसाइट डेवलपर्स की भी मदद ली गई।

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इस कोर ग्रुप ने एक कॉल सेंटर भी बनाया हुआ था जिसमें लगभग 50 कर्मचारी काम कर रहे थे। इन कर्मचारियों को प्रति माह 15 हजार रुपये दिया जाता था और ये उत्तर प्रदेश के जमालपुर और अलीगढ़ क्षेत्रों से थे।

ईओडब्ल्यू, ओडिशा पुलिस ने कहा कि इस घोटाले के लिए 1,000 से अधिक फर्जी सिम और 530 हैंडसेट और मोबाइल फोन का इस्तेमाल किया गया।

शातिराना अंदाज में गिरोह करता था ठगी

पुलिस ने बताया कि ठगी करने वाला यह गिरोह बेहद शातिर था और पुलिस और कानूनी एजेंसियों के हर कदम पर इनकी नजर होती थी। ये फर्जी सिम कार्ड का इस्तेमाल कर केवल व्हाट्सएप वॉयस कॉल का इस्तेमाल करते थे। कॉलर डिटेक्शन से बचने के लिए उन्होंने सुनिश्चित किया योजना के नाम पर ही  मोबाइल नंबर सेव हो ताकि अगर कोई ‘ट्रू कॉलर’ पर नाम चेक करे तो उसे केवल योजना का नाम नजर आए।

पुलिस ने कहा कि ये ठग ने धोखाधड़ी के काम के लिए कभी अपने निजी फोन का इस्तेमाल नहीं करते थे। इन्होंने वेबसाइट पर कुछ इस तरह डिजाइन कराए थे जो देखने में किसी सरकारी वेबसाइट की तरह लगे। ये मुख्य रूप से स्वास्थ्य विभाग या कौशल विकास जैसी योजनाओं के नाम पर युवकों को नौकरी के लिए फंसाते थे।जालसाजों ने स्थानीय समाचार पत्रों में विज्ञापन भी दिया लेकिन साथ ही यह भी सुनिश्चित किया कि नकली पहचान का उपयोग किया जाए।

उम्मीदवारों से पंजीकरण, साक्षात्कार प्रशिक्षण से लेकर अन्य प्रकार के आयोजनों के लिए तीन हजार से लेकर 50 हजार तक के ये शुल्क लेते थे। यह सबकुछ इस बात पर निर्भर करता था कि उम्मीदवार उन पर कितना भरोसा कर रहा हैं।

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