दखलः“बंद दरवाज़े” के पार गूँजती हक़ की आवाज़,कभी तो पहुंचेगी उनके कानों तक…. ?

(रुद्र अवस्थी ) शायर हबीब जालिब साहब ने लिखा है-
तुम से पहले वो जो इक शख़्स यहाँ तख़्त-नशीं था,
उसको भी अपने ख़ुदा होने पे इतना ही यक़ीं था….
ये लाइनें हाल ही में एक अज़ीज दोस्त ने शेयर की थीं… याद आ गईं … जब एक ख़ब़र पर नज़र पड़ी…। ये लाइनें तो आपने भी पढ़ ली होंगी….. अब उस ख़बर पर भी गौर फ़रमा लीजिए…..। यह देश के रेल्वे नक्शे में अपनी एक खास जगह रखने वाले बिलासपुर रेलवे स्टेशन के उस पार… यानी सिरगिट्टी के लोगों से जुड़ी यह खबर है। जिसमें बताया गया है कि सिरगिट्टी- तारबाहर अंडरब्रिज एक्सटेंशन की मांग को लेकर संघर्ष समिति ने डीआरएम का घेराव किया। इस खबर में “घेराव” शब्द से अधिक गौर फरमाने वाली खबर यह है कि डीआरएम से संघर्ष समिति के सदस्यों क़ी मुलाकात नहीं हो सकी ।

जबकि आंदोलन की जानकारी रेलवे प्रशासन को 3 दिन पहले ही दी जा चुकी थी। संघर्ष समिति के लोगों ने दफ़्तर के बंद गेट के सामने प्रदर्शन किया…. फ़िर डीआरएम के एवज़ मे जो साहब आए , उनके सामने अपनी बात रखी।
वैसे पिछले कई दिनों से इससे ज़ुड़ी यह ख़ब़र सुर्खियों में है कि रेल लाइन के उस पार सिरगिट्टी में रहने वाले लोगों को रेल फ़ाटक के आर पार जाने आने में बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है।

तेजी से भागती इस दुनिया में सिरगिट्टी के लोग भी जब अपने घर से निकलते हैं या अपने घर वापस लौटते हैं तो सभी को एक इस बात का डर रहता है की रेलवे फाटक पर धीरे- धीरे से सरकती कोई मालगाड़ी कहीं उनकी जिंदगी की रफ्तार न रोक ले….। लिहाजा वे अंडरब्रिज एक्सटेंशन की मांग कर रहे हैं। भारतीय रेलवे के नक्शे में सबसे अधिक मुनाफ़ा कमाने वाले रेलवे जोन और रेल डिवीजन के हेड क्वार्टर से सटकर बसने वाले इन लोगों के साथ यह मजाक नहीं तो क्या है कि कुछ साल पहले लंबे इंतजार के बाद तारबाहर फाटक पर अंडर ब्रिज तो बना दिया गया। लेकिन इसे एक छोर से दूसरे छोर तक नहीं जोड़ा गया।

और बीच में कुछ लाइन शायद इस बात का एहसास कराने के लिए छोड़ दी गईं कि रेलवे चाहे कितने भी कीर्तिमान बनाता रहे….। लेकिन सिरगिट्टी के लोग बिना किसी बाधा के अपने घर तक आने-जाने का रिकॉर्ड कभी नहीं बना सकेंगे। इससे जूझते हुए सिरगिट्टी के लोगों को फिर एक संघर्ष समिति बनानी पड़ी है और धरना-हस्ताक्षर अभियान के बाद डीआरएम ऑफिस का घेराव करना पड़ा है।

रेलवे ऑफिस के बड़े से बंद गेट के सामने नारेबाजी कर रहे लोगों की तस्वीर के साथ यह खबर देख कर याद करना पड़ता है कि बिलासपुर के लोगों ने कभी रेलवे जोन का मुख्यालय बिलासपुर में बनाने के लिए भी संघर्ष किया था । उस लड़ाई में भी लोग संघर्ष समिति बनाकर एकजुट हुए थे। लंबी लड़ाई के बाद रेलवे का जोन मिला।लेकिन बिलासपुर शहर के लोगों की लड़ाई के नतीजे के रूप में बड़े-बड़े दफ्तर बने… और उसके सामने बड़े-बड़े गेट लगे… गेट पर दरब़ान ख़ड़े हुए …. और चहारदीवारी के भीतर एसी में बैठने वाले अफ़सरान यह नहीं सोचते की बाहर कोई जरूरतमंद खड़ा है।

वह शायद यह भी नहीं सोचते कि नागरिकों की ऐसी ही लड़ाई के बदले उन्हें यह इमारत…यह दफ्तर… यह एसी और यह सुकून की जगह मिली है। वे तो यह भी नहीं सोचते कि इस इलाके को कुदरत ने जो ख़जाना दिया है उसी के भरोसे कोयला खदान वाली कंपनी और रेलवे वाले भी रिकॉर्ड बनाकर तमगे हासिल करते हैं।लेकिन लदान-ढुलाई के अलावा इसी ज़मीन के वाशिंदों की भी कोई ज़रूरतें होंगी यह सोचने की फ़ुर्सत वे कभी नहीं निक़ाल पाते…।
आज के दौर में तख्तनशीं लोग जब ख़ुद के ख़ुदा होने पर यकीन करते नज़र आते हैं तब यह भी लगता है की चाहे जनता के वोट से जीत कर आए हमारे नुमाइंदे हों….. चाहे जनता की लड़ाई के बाद ख़ोले गए दफ्तरों में बैठे अफ़सरान हों… कोई भी इस बात की जरूरत महसूस नहीं करता कि आंदोलन करने वाली ये संघर्ष समितियां और इनके साथ तख्ती लेकर नारेबाजी करते हुए लोगों का दर्द क्या है… ? तभी तो कहीं किसानों को अपनी मांगों को लेकर देश की राजधानी के बॉर्डर पर एक- दो-चार-दस दिन नहीं बल्कि साल भर तक बैठना पड़ता है….।

तो कहीं भत्ता या किसी दूसरी मांग को लेकर किसी और तबके को सड़क पर महीनों लड़ाई लड़नी पड़ती है।किसी को कहीं पर मंहगाई दिखती है तो.. कहीं पर दिखाई ही नहीं देती…। कहीं पर बेरोज़गारी दिख़ती है … तो कहीं पर नज़र ही नहीं आती….।किसी भी भले आदमी को यह साफ़ दिख़ाई देता है कि सत्ता-कुर्सी-ओहदा.. चाहे ज़ो भी नाम दे दीज़िए… वहां पहुंचने का बाद सभी अपने फ़ायदे के हिसाब़ से लोगों की मांगों… लोगों की ज़रूरतों की परिभाषा गढ़ लेते हैं…। और उस परिभाषा को अपने फ़ायदे के हिसाब़ से ही सच साब़ित करने में तुले रहते हैं।

तभी तो ज़रूरत पड़ने पर ज़ब़ लोग दफ़्तर में पहुंचते हैं तो गेट बंद कर दिया जाता है। बिलासपुर शहर तो नागरिक आंदोलन के पुराने इतिहास को समेटे हुए है। यहां भी आंदोलन के बदले बनीं पता नहीं कितनी इमारतों में इसी तरह बड़े-बड़े गेट लगे हैं और भीतर जाने की कोशिश कर रहे लोगों को रोकने के लिए दरब़ान खड़े हैं। सिरगिटी के लोगों के साथ जो कुछ हुआ , वह भी इसी रवायत का नमूना है। लेकिन सिरगिटी वालों की संघर्ष समिति ने बिलासपुर की पुरानी रवायत को आगे बढ़ाते हुए यह अहसास तो करा दिया है कि साहब़ लोग गेट भले ही ब़ंद कर लें… समस्याओं से आंख़ें मूंद लें… मगर अपने हक़ की लड़ाई को कभी बंद नहीं कर सकते..। बंद दरवाज़े के पार भी हक़ की आवाज़ गूँज़ती रहेगी….। रेलवे जोन, सेंट्रल यूनिवर्सिटी, एसईसीएल, मेडिकल कॉलेज, हाई कोर्ट, हवाई सेवा जैसी मांगों को लेकर सड़क पर संघर्ष करते हुए जीत हासिल करने वालों के इस शहर में बैठकर अभी उम्मीदों को ज़िंद़ा रखा जा सकता है। आज़ के द़ौर में ज़ब़ लोग अपने आप की दुनिया में ही सिमटकर रह गए हैं, ऐसे दौर में भी अगर संघर्ष समिति में लोग जुटते हैं…. और अपनी बात पहुंचाकर आते हैं , तो उमीद की जानी चाहिए कि उन लोगों तक भी मैसेज़ ज़रूर पहुंचेगा, जो अभी तख्तनशीं हैं ….।

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