संदर्भ महासमुंद मारपीट प्रकरणः क्या ऐसे ही प्रशासन चलाकर अपनी ‘घुड़सवारी’ पर इठला रहे हैं मुख्यमंत्री और कांग्रेस के नेता-जनप्रतिनिधि?

अनिल पुरोहित

( अनिल पुरोहित, पत्रकार ) – कभी, जब छत्तीसगढ़ के मौज़ूदा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष के नाते विपक्ष की राजनीति करते थे, प्रदेश के पूर्ववर्ती भारतीय जनता पार्टी शासनकाल में ‘घुड़सवारी’ के जुमले के साथ तत्कालीन प्रदेश सरकार पर इस बात के लिए तानाक़शी करते थे कि भाजपा के लोगों को प्रशासन चलाना नहीं आता। आज भूपेश बघेल मुख्यमंत्री हैं और कांग्रेस के लोग प्रदेश में प्रशासन के घोड़े पर सवार होकर अपने सत्ता मद के चाबुक से उसे जिस तरह हाँक रहे हैं, उससे न केवल एक सभ्य लोकतांत्रिक व्यवस्था और राजनीतिक गरिमा व सहिष्णुता लहूलुहान हो रही है, अपितु प्रशासन को साधने और अधिकारियों को ‘ठीक’ कर देने का बड़बोलापन और दम्भ अपनी सबसे विकृत मानसिकता का प्रदर्शन कर रहा है। सत्ता में आने के बाद से प्रदेशभर में कांग्रेस के लोग जिस तरह अपने आचरण का प्रदर्शन कर रहे हैं, उससे यह साफ़-साफ़ लग रहा है कि सत्ता का मद उनके सिर चढ़कर बोल रहा है और वे सब कुछ अपनी मर्जी से चलाना चाहते हैं और इसमें अगर किसी ने रोड़ा बनने की कोशिश की तो अधिनायकवादी फ़ितरत का नज़ारा पेश कर सत्ता का आतंक क़ायम करने की सारी हदें पार कर जाते हैं। छत्तीसगढ़ इन दिनों सत्ता के अहंकार में चूर लोगों के इसी आतंक से सहमा हुआ नज़र आ रहा है। प्रदेश की राजधानी से महज़ 55 किलोमीटर दूर महासमुंद के आबकारी दफ़्तर में विधायक और संसदीय सचिव विनोद चंद्राकर की मौज़ूदगी में मंगलवार को जो कुछ हुआ, वह इसी सत्तावादी अहंकार की एक बानग़ी है, और ऐसे कई कारनामे कांग्रेस के और कई विधायकों ने करके कांग्रेस के डीएनए में समाई राजनीतिक असहिष्णुता और निर्लज्जता से प्रदेश को वाक़िफ़ कराया है। विधायक और संसदीय सचिव विनोद चंद्राकर और उनके समर्थक कांग्रेस के इसी दम्भपूर्ण और शर्मनाक राजनीतिक आचरण के ताज़ा (और फ़िलहाल आख़िरी) उदाहरण हैं।

लोकतंत्र की इससे बड़ी विडम्बना और क्या होगी कि सत्तारूढ़ दल और सत्ताधीश यह भूल गए हैं कि सत्ता के बल पर प्रशासन को अपनी मर्जी के मुताबिक़ हाँक लेना ही घुड़सवारी का पैमाना नहीं होता, बल्कि जनता के कल्याण और क़ानून के राज की स्थापना के लिए प्रशासन को प्रेरित करना ही अच्छी घुड़सवारी का एकमात्र पैमाना होता है। लेकिन छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की सरकार बनने के बाद से ही ‘घुड़सवारों’ को तो चाबुक चलाने का ऐसा चस्का लग गया कि वे एक ओर अपने विरोधियों को ठिकाने लगाने के लिए प्रशासनरूपी घोड़े को मनचाही दिशा में हाँकने में लग गए, दूसरी ओर ‘अपने और अपनों’ के स्वार्थ-साधन में आड़े आने वाले घोड़ों को ‘ठीक’ करने में लग गए। मंगलवार को महासमुंद के विधायक और संसदीय सचिव विनोद चंद्राकर की मौज़ूदगी में जो कुछ हुआ, उसके बारे में क्या कहा जाए? आम भाषा में जिसे सड़क छाप टुच्चापन कहा जाता है, क्या ऐसे राजनीतिक आचरण से ‘गढ़बो नवा छत्तीसगढ़’ का जुमला धरातल पर लाया जा रहा है? अब संसदीय सचिव भले यह कहें कि वे तो झगड़ा छुड़ा रहे थे, पर सवाल तो यह है कि वे उस वक़्त वहाँ करने क्या गए थे? प्रदेश सरकार का एक अंग होकर मारपीट करने वालों को अपने साथ लेकर आबकारी दफ़्तर पहुँचने की बात पीड़ित कर्मचारी ने अपनी शिकायत में कही है और यह भी कहा है कि विधायक चंद्राकर के इशारे पर उनके समर्थकों ने कमरा बंद करके पीटा। पीटा भी इतना कि उसकी एक आँख के पास खून की धार बह निकली। अब संसदीय सचिव चंद्राकर की दलील मान लें कि वे झगड़ा छुड़ा रहे थे, तो सवाल यह भी उठता है कि शराब और तमाम गोरखधंधों से जुड़े बताए जा रहे लोगों की इतनी हिम्मत कैसे हुई कि एक संसदीय सचिव के सामने सरकारी दफ़्तर में घुसकर, कमरा बंद कर किसी के साथ बेरहमी से मारपीट कर लें? यह बेहद शर्मनाक है कि छत्तीसगढ़ ने पिछले तीन साल में ऐसे कई मामले देखे हैं। ‘बदलापुर’ के राजनीतिक एजेंडे के लिए प्रशासन का पूरी बेहयाई के साथ इस्तेमाल करने वालों ने इस घोड़े की नाल से न केवल अभिव्यक्ति की आज़ादी को कुचलने की कोशिश की अपितु राजनीतिक विरोधियों को तक को लहूलुहान किया और फिर अगर घोड़े ने हिनहिनाने की ज़ुर्रत की तो उसे भी सत्ता-बल और अहंकार के चाबुक का ‘स्वाद चखाने’ में कोई देर नहीं की। माफ़ियाओं और अपराधियों को संरक्षण देकर प्रदेश में ज़ंगलराज क़ायम करने की खुली छूट देने वालों ने शर्म-ओ-हया के तमाम आवरणों को उतार फेंका और फिर भी प्रदेश में खुशहाली के ढोल पीटते रहे। क़ानून बनाकर एक अच्छी व्यवस्था क़ायम करने की ज़िम्मेदारी देकर प्रदेश के लोगों ने तीन साल पहले जिनको सत्ता सौंपी, वे ख़ुद या फिर उनके परिजन-क़रीबी क़ानून के राज का मखौल उड़ाते नज़र आ रहे हैं, इससे अधिक दुर्भाग्यपूर्ण और क्या हो सकता है? कांग्रेस के जनप्रतिनिधियों और उनके क़रीबियों ने तो मानो शासकीय अधिकारियों व कर्मचारियों के साथ बदसलूकी, मारपीट और छेड़खानी जैसी आपराधिक वारदातों को अंजाम देना अपना जन्मसिद्ध अधिकार मान लिया है। सत्ता के मद में चूर कांग्रेस के लोग सत्ता के संरक्षण में अपनी सारी हदें लांघकर शर्मनाक आचरण का जो सिलसिला चलाए हुए हैं, क्या ऐसे ही प्रशासन चलाकर मुख्यमंत्री बघेल और उनकी पार्टी के नेता-जनप्रतिनिधि अपनी ‘घुड़सवारी’ पर इठला रहे हैं? प्रदेश सरकार के इशारों व दबाव में विरोधी नेताओं व कार्यकर्ताओं को प्रताड़ित किए जाने की शिकायतें सामने आ रही हैं, ख़ुद मुख्यमंत्री बघेल आईजी-एसपी कॉन्फ्रेंस में क़ानून की दुहाई देकर सबको चुन-चुनकर ‘चेतावनी’ दे रहे हैं, लेकिन चुनकर आए कांग्रेस के जनप्रतिनिधियों के आपराधिक कृत्यों पर वे ख़ामोश क्यों हैं? क्या कांग्रेस का यह शासनकाल प्रदेश में राजनीतिक प्रतिशोध के लिए प्रशासन के बेज़ा इस्तेमाल के साथ-साथ प्रशासनिक अधिकारियों व कर्मचारियों के साथ मारपीट और उन पर जानलेवा हमला करती कांग्रेस नेताओं और जनप्रतिनिधियों की गुण्डावाहिनियों की आपराधिक क़रतूतों के चलते जंगलराज क़ायम करने जा रहा है? अभी हाल ही प्रदेश की राजधानी में रायगढ़ ज़िले की बरमकेला जनपद पंचायत में पदस्थ एक महिला सब-इंजीनियर (फ़िलहाल निलंबित) ने कांग्रेस विधायक के प्रतिनिधि द्वारा सरकारी काम में दखलंदाज़ी करने, ग़लत मूल्यांकन के लिए दबाव बनाने और मना करने पर उक्त महिला सब-इंजीनियर के साथ छेड़खानी करने के साथ धमकाए जाने की पीड़ा मीडिया से मुख़ातिब होकर साझा की। आज उप्र में महिलाओं को 40 फ़ीसदी टिकट देने के सियासी दाँव पर नारी सशक्तिकरण के ढोल पीटते कांग्रेस के सत्ताधीशों ने कभी उन लोगों पर क़ानून की लाठी भांजने का साहस किया, जो सरेराह महिलाओं से बदसलूकी करके उनके दफ़्तरों में घुसकर मारपीट और बलात्कार की शर्मनाक कोशिश करते हैं? बिलासपुर के मस्तूरी थाना क्षेत्र में मल्हार नगर पंचायत के अध्यक्ष व पार्षदों द्वारा सीएमओ को बंधक बनाकर मारपीट, गाली-गलौज़ कर धमकाने का मामला भी अभी तीन-चार दिन पहले ही सामने आया है। नपं अध्यक्ष औप पार्षद कांग्रेस के हैं, जो साफ़-सफाई के सालाना टेंडर को लेकर सीएमओ के साथ ऐसा बर्ताव करते ज़रा भी नहीं झिझके। अपनी सरकार के मंत्री पर हत्या कराने का आरोप लगाने वाले कांग्रेस के विधायक बृहस्पत सिंह के वायरल वीडियो ने क़ानून के राज का कौन-सा आदर्श पेश किया जिसमें उक्त विधायक को अधिकारी के साथ बदतमीजी करते पूरे प्रदेश ने सुना है! दरअसल, कांग्रेस इसी सत्तावादी अहंकार की प्रतीक है। कांग्रेस शासनकाल में अपराधियों पर त्वरित कार्रवाई का वृथा गाल बजाते कांग्रेस नेताओं को इस बात पर शर्म महसूस नहीं होती कि जिन आपराधिक मामलों में कांग्रेस से जुड़े लोग संलिप्त होते हैं, उन मामलों में पुलिस रिपोर्ट दर्ज़ करने में आनाकानी करती है। प्रदेश के लिए असहनीय बोझ बन चुकी इस प्रदेश सरकार के अब तक के कार्यकाल में कांग्रेस के लोग और उनके क़रीबी सरकारी दफ़्तरों में घुसकर महिला कर्मचारियों के साथ छेड़खानी और मारपीट करते हैं, राजधानी में पुलिस वालों को जान बचाकर भागने लिए मज़बूर करते हैं, प्रदेश के अमूमन सभी इलाक़ों में विरोधी राजनीतिक जनप्रतिनिधियों के अलावा सरकारी अधिकारियों व कर्मचारियों पर कांग्रेस से जुड़े माफ़िया जानलेवा हमले करते हैं, तमाम तरह के नशे के गोरखधंधे में कांग्रेस के लोगों की संलिप्तता ज़ाहिर होने और विधायकों द्वारा सरकारी अधिकारियों से बदतमीजी करने के मामले क्या प्रदेश सरकार को क़ानूनी कार्रवाई के लिए कभी झकझोरते हैं? प्रदेश सरकार और सत्तारूढ़ दल के राजनीतिक संरक्षण में कांग्रेस के चुने हुए लोग चहुँओर तांडव मचाकर ज़ंगलराज क़ायम कर रहे हैं और मुख्यमंत्री बघेल समेत पूरी प्रदेश सरकार और कांग्रेस अपने लोगों के कृत्यों पर पर पर्दा डालने में मशगूल हैं। कांग्रेस नेताओं की अपराधों में संलिप्तता के मामले हों या चाहे आदिवासियों पर वाहन चढ़ाकर आतंक फैलाने और उनकी जान से खिलवाड़ करने का मामला हो या फिर राजधानी में सरेआम आदिवासी युवक व उसकी माँ के साथ कांग्रेस के पार्षद द्वारा मारपीट का मामला हो या फिर हिरासत में लिए गए अपराधियों को थाने से छुड़ाकर ले जाने और अपराधियों को थाने से छुड़वाने के लिए पुलिस को धमकाने और पुलिस पर दबाव डालकर रातो-रात आरोपी ही बदल डालने का मामला हो, क्या ये सारे इस बात की तस्दीक नहीं कर रहे हैं कि कांग्रेस के लोग सत्ता-बल की धौंस दिखाकर प्रदेश को अराजकता के गर्त में धकेल रहे हैं। ——

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