आखिर क्यों बन गया मुद्दा..क्या है संविलियन का जिन्न..नेताओं ने कहा…सरकार ने ही किया था एलान

IMG20171127135901(1)  बिलासपुर— 9 वें दिन भी 9 सूत्रीय मांग को लेकर शिक्षाकर्मी मैदान में है। सरकार ने संविलियन की मांग को एक सिरे से इंकार करते हुए बाकी मांगों पर बैठक और विचार का संकेत दिया है। शिक्षाकर्मियों की बेमुद्दत हड़ताल को भाजपा के अलावा अन्य पार्टी के नेताओं का समर्थन मिल रहा है। कुछ भाजपा नेता भी धरना प्रदर्शन में शामिल होकर हड़ताल का गुपचपुर तरीके से समर्थन कर रहे हैं। इससे कहीं ज्यादा लोग शिक्षाकर्मियों की हड़ताल को बेसिर पैर का बता रहेह हैं। बावजूद इसके प्रदेश के एक लाख 80 हजार शिक्षाकर्मी 9 सूत्रीय मांग को लेकर नौवें दिन भी मैदान में डटे हैं। यद्यपि मुख्यमंत्री ने साफ कर दिया है कि ना कभी संविलियन किया गया था और ना संविलियन किया जाएगा।

               मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद प्रश्न उठता है कि आखिर शिक्षाकर्मियों की 9 बिन्दु वाली मांंग में संविलियन ही महत्वपूर्ण क्यों है। सरकार संविलियन को लेकर इतनी फोकस क्यों है। सीजी वाल की रिपोर्ट

                            शिक्षाकर्मियों के जिला स्तरीय नेता संतोष सिंह और अमित कुमार नामदेव के अलावा संतोष शर्मा ने बताया संविलियन की मांग सभी शिक्षाकर्मियों के लिए महत्वपूर्ण है। यदि संविलियन की मांग को मान लिया जाता है तो शिक्षाकर्मियों की काफी कुछ समस्या अपने आप हल हो जाएगी। यह बात गलत है कि आज से पहले संविलियन नहीं हुआ।

         नेताओं ने बताया कि शिक्षा विभाग में शिक्षाकर्मियों के साथ सौतेले व्यवहार की मुख्य वजह संविलियन ही है।दरअसल शिक्षा विभाग में दो प्रकार का सिस्टम काम कर रहा है। एक सिस्टम सामान्य सरकारी शिक्षकों का है..दूसरा शिक्षाकर्मियों का सिस्टम काम कर रहा है। दोनों की गुण दोष एक ही प्रकार का है। दोनों का काम  भी समान है। शिक्षाकर्मियों से कहीं ज्यादा काम लिया जाता है। विभाग से अलग हटकर भी सेवाएं ली जाती हैं। लेकिन वेतन,भत्ता,स्थानांतरण,ग्रैच्यूटी समेत अन्य सुविधाओं में समानता नाम की बात ही नहीं है। Screenshot_2017-11-28-10-42-20-63

                               आंदोलनकारी शिक्षाकर्मी नेताओं के अनुसार अधिकारों में इतनी ज्यादा विषमताओं के बाद भी संविलियन की मांग को अनसुना करने का सीधा अर्थ जानबूझकर शोषण होना और किया जाना है। अमित नामदेव और संतोष ने बताया कि शिक्षा विभाग में पद के अनुसार तीन प्रकार के शिक्षक हैं। इन्हें व्याख्याता, शिक्षक और सहायक शिक्षक कहा जाता है।

      शिक्षाकर्मी भर्ती के दौरान इन पदों के समान्तर शिक्षाकर्मी वर्ग एक, वर्ग दो और वर्ग तीन का जन्म हुआ। लगातार मांग के बाद शिक्षाकर्मियों का पद नाम बदलकर क्रमशः व्याख्याता पंचायत, शिक्षक पंचायत और सहायक शिक्षक पंचायत कर दिया गया। लेकिन अधिकारों और कार्यपद्धति में किसी प्रकार का बदलाव नहीं आया। पद नाम केवल दिखावा साबित हो गया।

              नेताओं ने बताया कि शिक्षा विभाग में पद के विरूद्ध शिक्षाकर्मियों की भर्ती हुई। शिक्षा विभाग के व्याख्याता, शिक्षक और सहायक शिक्षक के पद और अधिकारों के लिए संविलियन का होना जरूरी है। जब तक ऐसा नहीं किया जाएगा तब तक शिक्षाविभाग में शिक्षाकर्मियों के साथ अन्याय होगा। समान कार्य के बाद भी समान अधिकार हासिल नहीं होगा।

               जिला मोर्चा संचालक संतोष सिंह ने बताया कि संविलियन की घोषणा खुद मुख्यमंत्री ने 2007 में शिक्षाकर्मियों के सम्मेलन की थी। उन्होने कहा था कि शिक्षा विभाग और आदिम जाति कल्याण विभाग के व्याख्याता और सहायक शिक्षक पदों में शिक्षाकर्मियों का संविलियन किया जाएगा। सीएम ने एलान किया थाScreenshot_2017-11-28-10-41-29-51 कि 20-20 प्रतिशत के हिसाब से शिक्षाकर्मियों का दोनों विभाग के पदों में संविलियन किया जाएगा। यदि यह प्रक्रिया चलती रहती तो 2012 तक प्रदेश के सभी शिक्षाकर्मी शासकीय शिक्षक होते। अब यह कहना कि संविलियन नहीं हो सकता…काफी दुखद है। फिर घोषणा क्यों..? जबकि भाजपा के 2003 और 2008 चुनावी संकल्प पत्र में संविलियन को प्रमुखता से स्थान दिया गया है।

                          शिक्षाकर्मी नेताओं के अनुसार सरकार एक तरफ जिला और जनपद पंचायत व्यवस्था की बात करती है। दूसरी तरफ शिक्षा विभाग के लिए अलग व्यवस्था हैं। जबकि दोनों की काम, योग्यता और डिग्री सबकुछ  समान है। फिर शिक्षाकर्मियों के साथ सौतेला व्यवहार क्यों।

                            शिक्षाकर्मियों ने बताया कि संविलियन नहीं होने से शिक्षकों को बहुत नुकसान है। शासकीय शिक्षकों की अलग व्यवस्था है। शिक्षाकर्मियों के लिए अलग स्केल है। संविलियन नहीं होने के कारण ही शिक्षाकर्मियों के लिए स्थानांतरण की नीति अलग है..ग्रेच्यूटी नहीं है..समग्र पर कटौती और क्रमोन्नति की सुविधा नहीं है। सरकार ने शिक्षा समतुल्य वेतनमान तो दिया..लेकिन सभी भत्ते काट लिए। सातवां वेतनमान का लाभ नहीं मिल रहा है।

             सारी समस्या संविलियन के बाद दूर हो जाएगी। बस सरकार को निर्णय लेने की जरूरत है। राजस्थान सरकार ने भी तो यही किया।

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