महिला दिवस पर ख़ास – पढ़िए – शिक्षिकाओँ की कहानी, जिन्होने कोरोनाकाल में जगाए रखा शिक्षा का अलख़…ख़ुद प़ॉजिटिव होने के बाद भी पस्त नहीं होने दिया हौसला

( रुद्र अवस्थी )

कोई होता नहीं ,बल्कि कोई होती है

कहीं पास तो कहीं दूर ख़ोई होती है

हर तुलसी के पीछे रत्नावली खड़ी है

हर कबीर के साथ लोई खड़ी होती है।।

विंध्य और मध्य भारत के मशहूर जनकवि स्वर्गीय श्रद्धेय पारसनाथ मिश्र जी की इन पंक्तियों के साथ महिला दिवस ही नहीं महिलाओं के नाम पर दर्ज होने वाले किसी भी आयोजन की शुरुआत हो सकती है। लेकिन इस बार महिला दिवस के मौके पर इन पंक्तियों को पढ़े जाने के पीछे खास मकसद यही है कि कोरोना काल के इस दौर में महिलाओं ने इस चुनौती का मुकाबला करते हुए समाज को व्यवस्थित और सुचारू रूप से चलाए रखने के लिए अपनी हिस्सेदारी जिस तरह से निभाई है वह प्रणम्य है। हर एक कालखंड में नारी शक्ति जिस तरह से समाज़ के साथ खड़ी रही , वैसे ही कोरोना के इस दौर में शिक्षा का अलख जगाए रखने के लिए शिक्षिकाओं ने जिस तरह विपरीत परिस्थितियों से जूझते हुए बच्चों को शिक्षा देने का सिलसिला जारी रखा, उसका भी अभिवादन होना चाहिए। समाज इस बात पर गर्व कर सकता है कि हमारे आसपास भी ऐसी शिक्षिकाएं हैं, जिन्होंने इनफार्मेशन टेक्नोलॉजी का पूरा उपयोग करते हुए कोरोना के भयानक दौर में भी बच्चों को पढ़ाने लिखाने का सिलसिला जारी रखा। बल्कि अपने दूसरे टीचर साथियों के लिए भी मददगार बनी रहीं। कई शिक्षिकाएं ऐसी भी हैं जिन्होंने डिजिटल मीडिया प्लेटफॉर्म यूट्यूब पर चैनल बनाकर बच्चों को पढ़ाया। साथ ही व्हाट्सएप ग्रुप में जोड़कर यूनिट टेस्ट से लेकर बच्चों का मूल्यांकन भी लगातार करती रही। जिस दौर में लोग घरों से निकलने में डरते रहे ,उस समय भी मोहल्ला क्लास जैसे प्रयोग को सफल बनाने में कई शिक्षिकाओँ की अहम भूमिका रही। डर और अनिश्चितता के भयानक दौर में भी कामयाबी की कहानी लिखकर उसमें अहम् किरदार निभाने वाली कई शिक्षिकाओं से बात हुई तो यह सच भी सामने आया कि कोरोना पॉज़िटिव होने के बावजूद कुछ शिक्षिकाओं ने हिम्मत नहीं हारी और पिछले साल मार्च महीने में शुरू हुए तालाबंदी के बाद से अब तक बिना थके…. बिना डरे ….मोर्चे पर डटी हुई हैं। आइए जुड़ते हैं अपने समय का इतिहास खुद लिखने वाली इन शिक्षिकाओं की कहानी से…….।

देहात से शहर तक मनीषा सिंह ने बच्चों को जोड़े रखा

बिलासपुर के तारबाहर में स्वामी आत्मानंद इंग्लिश मीडियम सरकारी स्कूल की शिक्षिका मनीषा सिंह को कोरोना के दौर में देहात और शहर दोनों जगह काम करने का मौका मिला। पिछले साल मार्च महीने में कोरोना का कहर शुरू होने के बाद जब लॉकडाउन का फैसला  किया गया और स्कूलों में ताले पड़ गए ,तब मनीषा सिंह की पोस्टिंग तखतपुर ब्लाक के अमसेना गांव में थी। अपने स्कूल समय में के दौर में राजनांदगांव जिले में दसवीं कक्षा में अव्वल आने वाली मनीषा सिंह स्काउट गाइड के क्षेत्र में गवर्नर अवार्ड से सम्मानित हो चुकी हैं। अमसेना स्कूल में पोस्टिंग होने के बाद से ही उन्होंने बच्चों को स्काउट गाइड से जोड़ा और उनकी पहल पर कई बच्चे गवर्नर अवार्ड से सम्मानित हुए। साथ ही नेशनल कैंप में भी हिस्सेदारी का मौका उन्हें मिला। स्काउट गाइड के क्षेत्र में काम करते हुए जनसेवा से के साथ खुद और बच्चों को भी जोड़ने का शौक उन्हें शुरू से रहा है । स्वच्छता अभियान में भी उन्होंने हिस्सेदारी निभाई और गर्मी के दिनों में प्याऊ खोलकर जरूरतमंदों की प्यास बुझाने में उन्हें संतोष और सुकून मिलता रहा । स्काउट गाइड के क्षेत्र में काम करने का तजुर्बा और बच्चों को साथ जोड़कर रखने का शगल कोरोना के दौर का मुकाबला करने में उनके लिए काफी मददगार साबित हुआ। मनीषा सिंह बताती है कि  अमसेना गांव के बच्चों को व्हाट्सएप ग्रुप से जोड़कर उन्हें पढ़ाई लिखाई से जोड़ें रखने में कामयाबी पहले ही मिल गई थी। वे व्हाट्सएप ग्रुप के जरिए बच्चों को पाठ्य सामग्री भेजती रही। हालांकि मोबाइल की उपलब्धता और नेटवर्क की दिक्कतें भी चुनौती के रूप में सामने थी। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और बच्चों को एनिमेशन के जरिए पढ़ाने का काम जारी रखा। पिछले जून महीने में स्वामी आत्मानंद इंग्लिश मीडियम स्कूल तारबहार में पोस्टिंग होने के बाद भी उन्होंने यहां के बच्चों को अपने अभियान से जोड़ा। मनीषा सिंह को इस बात की खुशी है कि बच्चों ने भी जोश खरोश उत्साह के साथ उनकी इस मुहिम में हिस्सेदारी निभाई। साथ ही पेरेंट्स से भी अच्छा रिस्पांस मिला। उनके स्कूल के बच्चे फर्राटेदार अंग्रेजी बोलते हैं और ऑनलाइन यूनिट टेस्ट में भी के जरिए भी उनका मूल्यांकन होता है। राष्ट्रीय स्तर पर नवोदय क्रांति परिवार से जुड़ी मनीषा सिंह ने बच्चों को घर बैठे पढ़ाने के लिए एक यूट्यूब चैनल भी बनाया है। जिसके जरिए पेरेंट्स भी बच्चों को पढ़ा सकते हैं। उन्होंने बताया कि कोरोना का दौर जीवन में अपने तरह का पहला अनुभव था । लेकिन तकनीकी ज्ञान के सहारे वे इस चुनौती का सामना कर सकीं । लगातार बच्चों से ज़ीवंत संपर्क और उनकी पढ़ाई लिखाई जारी रखने में जितनी भी कामयाबी उन्हें मिली है उसका संतोष उन्हें है। उनका यह भी मानना है कि अभी यह दौर खत्म नहीं हुआ है और पिछले करीब साल भर के तजुर्बे के हिसाब से उन्हें उम्मीद है कि आगे भी इन चुनौतियों का सामना किया जा सकेगा।

ख़ुद कोरोना पॉजिटिव होने के बाद भी नहीं टूटा उषा कोरी का हौसला

बिल्हा ब्लॉक के तिफरा संकुल में शासकीय प्राथमिक शाला परसदा की शिक्षिका उषा कोरी  की कहानी में भी कोरोना को मात देकर बच्चों को पढ़ाने – लिखाने का हौसला बरकरार रखने की ज़ोख़िम से भरी दास्तान है। जो बिना रुके बच्चों की पढ़ाई में लगातार जुटी रही और एक दिन खुद भी कोरोना पॉजिटिव लोगों की फेहरिस्त में उनका नाम दर्ज हो गया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। उषा कोरी भी पहले से ही इनोवेटिव गतिविधियों से जुड़ी रही हैं। पिछले साल मार्च के महीने में लॉकडाउन के बाद स्कूल बंद होने का आदेश जारी हुआ तो ऑनलाइन क्लास की तैयारी में जुट गई । गांव के बच्चों के सामने मोबाइल की उपलब्धता और नेटवर्क की समस्या को देखते हुए भी उन्होंने अपनी मुहिम जारी रखी। वे बताती हैं कि शुरू के दिनों में कुल चार- पांच बच्चे ही जुड़ पाए। लेकिन उन्होंने लगातार मेहनत कर दर्ज संख्या को 40 तक पहुंचा दिया। इसके बाद उन्होंने मोहल्ला क्लास की शुरुआत की । गांव के ही मन नाडोल के सामुदायिक भवन में मोहल्ला क्लास की शुरुआत हुई। इस क्लास में बच्चों को मिट्टी के खिलौने और दूसरे माध्यमों से पढ़ाने का अभियान शुरू किया। जिससे बच्चों में दिलचस्पी बढ़ती गई और मोहल्ला क्लास में हाज़िरी भी बढ़ती गई । उषा कोरी ने कठपुतली का प्रशिक्षण पहले ही लिया था और इस हुनर का इस्तेमाल कर बच्चों को पढ़ाने में जुटी रही । पाठ्य सामग्री को छत्तीसगढ़ी में ट्रांसलेट कर बच्चों को उससे जोड़ा। उनका अभियान  यहां तक ही नहीं था । बल्कि उन्होंने छोटे-छोटे बच्चों की माताओं को भी सिखाया कि वह किस तरह अपने आसपास की चीजों के जरिए अपने बच्चों को पढ़ा सकती हैं और सीखने की ललक पैदा कर सकती हैं। हालांकि दो छोटे बच्चों की मां होने के नाते उषा कोरी को भी कोरोना संक्रमण का भय सताता रहा और परिवार की ओर से भी सावधानी बरतने की हिदायत मिलती रही। फिर भी उन्होंने मुहल्ला क्लास बंद नहीं होने दिया। इस बीच खुद भी कोरोनावायरस  की चपेट में आ गई। लेकिन आइसोलेशन और क्वॉरेंटाइन का समय बिताकर फिर से अपने मोर्चे पर तैनात हो गई। कठपुतली ,मोहल्ला क्लास और खेल खिलौनों के जरिए उनकी पढ़ाई का यह प्रयोग देखने छत्तीसगढ़ के शिक्षा सचिव डॉ आलोक शुक्ला भी पहुंचे थे। कोरोना की वापसी अभी नहीं हुई है और इससे जूझते हुए उषा कोरी का अभियान भी बिना रुके अब तक बदस्तूर जारी है।

चानी ऐरी ने बच्चों के साथ टीचर साथियों की भी मदद की

सीपत इलाके के पंधी गांव के स्कूल में शिक्षिका चानी ऐरी ने भी कोरोना काल में अपने स्कूल के बच्चों की पढ़ाई नहीं रुकने दी। वह 13-  14 साल से नवाचार के कार्यक्रमों में अपनी हिस्सेदारी निभाती रही हैं। साथ ही शिक्षा सारथी कार्यक्रम में भी उनकी भागीदारी रही। कोरोना काल में बच्चों को पढ़ाने के लिए उन्होंने व्हाट्सएप ग्रुप बनाएं। जिसके जरिए उन्हें असाइनमेंट देती रही। बच्चों को दिक्कतों का सामना करना पड़ा और जब जरूरत पड़ी तो उन्होंने फोन के जरिए भी सीधे क्लास ली। चानी ऐरी ने  यह अभिनव प्रयोग भी सुर्खियों में रहा कि कोरोना के दौर में उन्होंने गणेश पंडालों पर जाकर बच्चों को पढ़ाई- लिखाई और सीख़ने की ललक से जुड़े रखा। मिट्टी के खिलौने का प्रयोग भी उन्होंने किया। पहले से ही तकनीकी का ज्ञान रखने वाली चानी ऐरी ने ऑनलाइन टीचिंग के लिए अपने स्तर पर नए प्रयोग किए। इस मामले में उन्होंने न केवल बच्चों की मदद की । बल्कि अपने टीचर साथियों को भी इसके लिए समय-समय पर पूरी जानकारी भी दी। ऑनलाइन टीचिंग के साथ ही मोहल्ला क्लास में भी उन्होंने बच्चों को जोड़ा। जहां बच्चियों को मास्क बनाने की ट्रेनिंग दी और बालकों को भी प्रशिक्षण देती रही। एक सवाल के जवाब में चानी ऐरी ने कहा कि कोरोना का भय तो था ही । शुरू शुरू के दौर में डर अधिक था …..आज भी है। पहले भी मास्क लगाकर निकलते थे आज भी निकलते हैं। इस बीच परिवार के लोग भी कोरोना से प्रभावित हुए। लेकिन उन्होंने अपनी मुहिम जारी रखीं । कोरोना के दौर में भी उन्होंने बच्चों के मॉडल तैयार कराएं।  इसका चयन किया गया। वह याद करती हैं कि बच्चों को जोड़ने के लिए उन्हें घर घर भी जाना पड़ा ।  लेकिन जोखिम उठाकर भी उन्होंने अपनी यह जिम्मेदारी निभाई। मैडम चानी ऐरी के प्रयोगों को शिक्षा विभाग में सराहना भी मिली। और उन्होंने अन्य टीचर साथियों को  ऑनलाइन क्लास रूम का डेमो भी दिया। वे यह भी याद करती है कि जिस समय लोग घर से निकलने से डरते थे उस समय भी वह ऑनलाइन सिस्टम के बारे में जानकारी देने के लिए विभाग के दफ्तर तक जाती थी । डर तो था और आज भी है । लेकिन इस डर को हराने के लिए जिस हौसले की दरकार थी ,उसे चानी ऐरी ने हमेशा अपनी मुट्ठियों पर रखा। उनका यह हौसला ही उन्हें आज भी यह कहने की ताकत देता है कि हालात जो भी हो अपने हिस्से का काम पूरा करना ही लक्ष्य रहेगा ।

मुक्ता अग्रवाल ने ऐसे जगाए रखा शिक्षा का अलख़

स्वामी आत्मानंद इंग्लिश मीडियम स्कूल की शिक्षिका मुक्ता अग्रवाल की गिनती भी उन शिक्षिकाओँ में है, जिन्होने कोरोनाकाल में भी अपने स्कूल के बच्चों के बीच शिक्षा का अलख़ जगाए रख़ा। मोबाइल के ज़रिए उन्होने पढ़ाई कराई । साथ ही यूट्यूब पर पाठ्य सामग्री डालकर भी बच्चों को पढ़ाई – लिख़ाई से जोड़े रखा। कोरोना काल के दौर में ही पन्द्रह अगस्त और छब्बीस जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्वों के साथ ही कई त्यौहार भी आए। तब भी उन्होने ऑनलाइन सिस्टम के ज़रिए अपने स्कूल के बच्चों को कार्यक्रम से जोड़े रख़ा। इस दौरान ऑनलाइन कई प्रतियोगिताएं भी आयोज़ित करती रहीं।  मुक़्ता अग्रवाल ने बताया कि उन्होने टीम वर्क के साथ काम किया और इस मुहिम में उन्हे अपने सहकर्मियों का पूरा सहयोग मिलता रहा। उन्हे ख़ुशी इस बात की भी है कि स्कूली बच्चों के पैरेन्ट्स भी महसूस करते हैं कि उनके बच्चों की पढ़ाई लगातार चलती रही और इसमें किसी तरह की रुक़ावट नहीं आई। उनकी ऑनलाइन क्लास में 80 में से 75 बच्चे नियमित रूप से शामिल होते रहे हैं। उन्होने ऑनलाइन सिस्टम के जरिए बच्चों को ड्राइंग भी सिख़ाया। उनकी परीक्षाएँ भी लेती रहीं। साथ ही पैरेंन्ट्स मीटिंग भी  आयोज़ित की गई । उनकी बातचीत से यह साफ़ लगता है कि कोरोना की वज़ह से पेश हुई चुनौतियां भले ही अभी भी लोगों के सामने हैं। लेकिन काम करने का हौसला बना रहा तो हर चुनौती का सामना कर बेहतर नतीज़े सामने लाए जा सकते हैं।

वक्त का पहिया घूमते हुए अभी जिस मुकाम से गुजर रहा है उसमें दिक्कत ,परेशानी, तकलीफ ,बदहाली जैसी शब्दावलियों के साथ जिंदगी की कई कहानियां लिखती जा रही है। ऐसे में महिला दिवस पर  इन शिक्षिकाओं के हौसले की कहानी को बांचना आपदा में भी जूझते रहने की ताकत के अभिनंदन का अवसर है। हमें लगता है कि मुसीबत के दौर में भी हौसले को जिंदा रखने की ये कहानियां मिसाल के तौर पर हम सबके सामने से गुजरी है। समाज में ऐसी और भी महिलाएं हैं जिन्होंने आपदा को चुनौती देते हुए ढाल की तरह अपना किरदार निभाया है और आज भी निभा रही है। महामारी के क़हर के बीच भी अपने घर – परिवार, समाज, अपने कार्यक्षेत्र, दफ़्तर तक हर एक ज़गह सिस्टम और कामकाज़ को सही ढंग से चलाए रख़ने में अपनी ज़िंदगी दाँव पर लगा देने वाली  ऐसी अनगिनत मातृशक्ति को भी प्रणाम करते हुए जनकवि स्वर्गीय श्रद्धेय पारसनाथ मिश्र जी की इन पंक्तियों के साथ ही महिला दिवस को याद रखना चाहेंगे …… जिसमें उन्होंने लिखा है…….

फूट लो भीड़ से,इधर बढ़ो उधर निकलो

रोकता कौन है,जहाँ चाहो जिधर निक़लो

सड़ांध,भूख,भय,कीचड़ ही, नहीं है दुनिया

उठो,कुलांचे भरो, आसमान को चूम लो..

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