भुईया साफ्टवेयर का कमाल..कौव्वाताल हो गया कौवा का पैर..झलमला बन गया जलमाला..किसानों का रकबा शून्य

बिलासपुर(रियाज़ अशरफी)–भुईया सॉफ्टवेयर में एनआईसी से हो रहे लगातार बदलाव के कारण किसान और पटवारी दोनों परेशान है।  पटवारियों की आईडी में किसानों का नाम,खसरा और रकबा तो सही है…लेकिन धान खरीदी केंद्र के पंजीयक माड्यूल में ज्यादातर रकबा शून्य दिख रहा है।परेशान किसान अपना रकबा सुधरवाने तहसील और पटवारियों के चक्कर लगा रहे हैं।अगर यही हालात रहे तो किसानों का एक बड़ा वर्ग धान बेचने से वंचित हो जाएगा।
 
                प्रदेश में 1 नवम्बर  से राज्य सरकार ने समिति के माध्यम से समर्थन मूल्य पर किसानों से धान खरीदना शुरू कर दिया है। धान महोत्सव 30 जनवरी 2023 तक चलेगा। लेकिन एनआईसी द्वारा सॉफ्टवेयर में लगातार परिवर्तन के कारण धानखरीदी पंजीयक के मॉड्यूलर में खेत के रकबा को लेकर एक बड़ी त्रुटि सामने आई है । ज्यादातर किसानों का रकबा सॉफ्टवेयर में शून्य दिखा रहा है। यद्यपि पटवारियों के आईडी में फसल दुरुस्त दिखा रहा है।
 
                जानकारी देते चलें कि सभी पटवारियों ने शासन की तरफ से निर्धारित समय सीमा में गिरदावरी के बाद रकबा सुधारा। सॉप्टवेयर में ऑनलाइन अपडेट भी किया। लेकिन जब किसान टोकन कटवाने धानखरीदी केंद्र पहुचे तो पंजीयक के मॉड्यूलर में ज्यादातर किसानों का रकबा शून्य पाया गया। धान खरीदी प्रारम्भ हुए 20 दिन का समय बीत गया है। लेकिन किसानों की समस्याओ समाधान अब तक नही हुआ है। किसान परेशान हैं। यदि ऐसा ही रहा तो किसान सरकार को समर्थन मूल्य में धान बेचने से वंचित रह जाएंगे।
 
एनआईसी की गलती किसानों की फजीहत
 
       एनआईसी की गलती के कारण वर्तमान में किसान अपना धान नही बेंच पा रहे है। उन्हें अपने फसल बिक्री की चिंता सता रही है। इधर प्रशासन अपनी गलती को जल्द सुधार करने की बात कहकर आश्वासन तो जरूर दे रहा है। शासन के अनुसार 22 नवम्बर तक सुधार किया जाना है। 21 नवम्बर सोमवार तक सुधार नहीं हुआ है। सवाल उठता है कि बचे एक दिन में विकासखण्ड के हजारों किसानों के रिकार्ड को कैसे सुधारा जा सकता है। इधर एनआईसी अपनी गलती मानने को तैयार नहीं है। स्पष्ट  कहना है कि शासन ने जैसे सर्वर उपलब्ध कराया है वैसा ही कार्य किया जा रहा है।
 
गांव के नाम मे भी भारी त्रुटि
 
एनआईसी के लगातार नए प्रयोग से भुइया सॉफ्टवेयर में  किसानो का नाम रकबा समेत कई बिन्दुओं में गड़बड़ी तो है कि लेकिन गांव के नाम भी बदल गए है । सीपत तहसील के ग्राम मुख्यालय का नाम कौवाताल है। लेकिन भुइया सॉफ्टवेयर में कौव्वाताल का नाम “कौवा का पैर” और आश्रित ग्राम झलमला का नाम “जलमाला” दिखाई दे रहा है। भूमि स्वामी के नाम में भी परिवर्तन दिखाई दे रहा है। वर्तमान में राज्य शासन  ने ग्राम पंचायत को आईडी उपलब्ध कराया है लेकिन अभी तक पूर्ण रूप से आईडी ग्राम पंचायत को प्राप्त नही हुआ है।
 
दुरुस्तिकरण का ऑप्शन नही
 
             पंजीयक मॉड्यूल में जिन किसानों का रकबा जीरो दिखा रहा है, ऐसे सभी लोग तहसीलदार के न्यायालय में रकबा जोड़ने आवेदन कर रहे है। लेकिन न्यायालय से प्राप्त आदेश ज्ञापन का दुरुस्तीकरण के लिए भुइयां सॉफ्टवेयर में कोई विकल्प नहीं डाला गया है। जिससे न्यायालय के जारी आदेश ज्ञापन का अभिलेख दुरुस्त नहीं हो पा रहा है। भूमि स्वामी को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। गलती के कारण पटवारी और किसान के बीच तकरार की स्थिति निर्मित हो रही है।
 
पटवारी भुवनेश्वर पटेल ने की लिखित शिकायत*
 
       गिरदावरी और रकबा दुरुस्त करने के बाद एनआईसी के सॉफ्टवेयर में किसानो के रकबा संख्या के स्थान पर 22 अक्टूबर तक सिर्फ “एन” दिखा रहा था। पटवारी भुवनेश्वर पटेल ने सीपत तहसीलदार से मामले की लिखित शिकायत किया है।  तहसीलदार के पत्र व्यवहार के बाद 25 अक्टूबर से “एन” शब्द भी गायब हो गया। ज्यादातर किसानों का रकबा शून्य दिखाने लगा।
 
                भूअभिलेख शाखा प्रभारी अधीक्षक बीएल कंवर का कहना है कि त्रुटि के सुधार की दिशा में सभी तहसीलदार काम कर रहे हैं। जल्द ही बचे हुए किसानों का रकबा दुरुस्त कर लिया जाएगा।
 

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