मेरी नज़र में...

Shashikant Konher: तेरहवीं पर शब्दांजलि -“भाऊ” तुम न जाने किस जहाँ में खो गए…

हम सबके “भाऊ” नहीं रहे……। वो इतनी दूर चले गए हैं कि अब कभी वापस लौट कर नहीं आएंगे…..। यह मनहूस खबर 13 दिन पहले आई थी…। लेकिन इतने दिनों बाद भी उस खबर पर भरोसा नहीं हो रहा है। रह – रह कर लगता है कि यह खबर झूठी निकलेगी। कोई अपना इस तरह चल जाए तो भला आंसू बहा कर भी अपना गम कैसे बाहर  निकाल सकते हैं। दिल के कोने में कहीं ऐसी चोट लग जाती है की चंद शब्दों को पिरोने की हिम्मत भी नहीं जुट पाती । भाऊ की श्रद्धांजलि में कुछ लिखना वाकई कठिन है। लगता है जैसे शब्दकोश में शब्द ही नहीं है…। हर शब्द में वही चेहरा नजर आ रहा है । फिर भी  शब्दों से खेलने वाले एक खिलाड़ी को शब्दों से श्रद्धांजलि दिए बिना मन कहां मानता है।

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हम सभी के चहेते शशिकांत कोन्हेर (Shashikant Konher)  के नाम के आगे स्वर्गीय लिखते हुए कंप्यूटर पर उंगलियां थरथरा रही है। लेकिन  इस फ़ानी दुनिया का यही सच है । जिसे स्वीकार करने के  अलावा हम सबके सामने और कोई रास्ता नहीं है। हर पल लगता है कि अभी-अभी मोबाइल (Mobile) की घंटी बजेगी और स्क्रीन पर शशि भाऊ का नाम उभरेगा और उधर से आवाज आएगी …..अरे क्या बॉस, क्या चल रहा है….. । शशिकांत कोन्हेर (Shashikant Konher) एक सच्चे पत्रकार थे। एक पत्रकार के अंदर जैसा साहस, जैसी साफ़गोई, जैसी स्पष्टवादिता, जैसी कर्मठता, जैसा जुझारूपन और आने वाले कल को देख लेने वाली जैसी नज़रें चाहिए…. वह सब कुछ शशिकांत कोन्हेर के अंदर था । जितनी ऊंची कद – काठी ईश्वर ने उन्हें दी थी, वैसी ही ऊंचाई उन्होंने मीडिया में भी हासिल की।

मुझे तो उन्हें काफी करीब से देखने का मौका मिला। बड़े भाई के रूप में भी मैंने उन्हें पाया। मैं उन्हें पत्रकारिता (Journalism) में 1983 के आसपास से देखता रहा हूं। उस दौर में जब संसाधन कम थे, तब भी उनके अंदर अभूतपूर्व जज्बा था। उनके लेखन का एक अंदाज था। वे ठेठ भाषा का इस्तेमाल करते थे और एक लाइन में बहुत कुछ कह जाते  थे। गांव के लोगों से जुड़ी हर खबर पर उनकी नजर रहती थी। दातून, फल, फूल, सब्जी बेचने के लिए गांव से आने वाले किसी गरीब को यदि नगर निगम के लोगों ने रोक कर परेशान किया तो इस पर भी खबर लिख देते थे । उनकी एक बड़ी खासियत थी कि यदि कोई मसला हो-  जिसमें एक तरफ किसी बड़े आदमी को फायदा पहुंचाने वाला हो और दूसरी तरफ कुछ गरीबों का फायदा जुड़ा हो तो वे बिना किसी झिझक के गरीबों के साथ खड़े होते थे ।

पत्रकारों की समस्याओं को के लिए जूझने वाला ऐसा शख्स अब शायद ही मिले । कई यादें जुड़ी हुई है, जब वे पत्रकार के ऊपर हमले , अत्याचार या उनसे जुड़ी समस्या को लेकर कभी भी – कहीं भी धरने पर बैठ जाते थे ।तब उन्हें उठाना किसी के बस की बात नहीं थी। जब तक समाधान सामने ना आ जाए भाऊ कभी अपनी जगह से नहीं हिलते थे। ज्यादातर लोगों की ज़िद के पीछे उनका अपना हित जुड़ा होता है। लेकिन भाऊ अपने साथियों के हित के लिए ज़िद पर अड़ जाते थे ।  भाऊ (Shashikant Konher) की एक और खासियत थी कि वो अपनी उम्र के बराबर के लोगों के साथ – साथ अपने से बड़े और अपने से बहुत छोटी उम्र के लोगों के साथ भी समरस हो जाते थे ।वे उस दौर के पत्रकार थे, जब लिखने के साथ पढ़ने का भी माहौल था। वे अंग्रेजी से हिंदी का अनुवाद भी करते थे। उन्होंने बिलासपुर (Bilaspur)  में कई अखबारों में काम किया ।वे टाटानगर भी गए। छत्तीसगढ़ के विख्यात पत्रकार रमेश नैयर का स्नेह उन्हें हमेशा मिलता रहा । वे बिलासपुर का मोह नहीं छोड़ सके और यहीं पर रहकर अपनी कलम को नई पहचान दी। पत्रकार के रूप में कैरियर की शुरुआत से आखरी तक वे संघर्ष ही करते रहे। लिखते समय स्थानीय भाषा, स्थानीय मुहावरे, लोकोक्तियां और आम लोगों के बीच की चर्चाओं को कहां -कैसे शामिल करना है, इस हुनर में उन्हें महारत हासिल थी। किसी भी मुद्दे पर बहस हो वे मजबूत दलील के साथ अपनी बात रखते थे। पत्रकारिता के प्रति समर्पण, लगन और मेहनत के मामले में शुरू से अंत तक उन्होने अपना सर्वश्रेष्ठ इस समाज को दिया। अपनी छोटी उम्र से लेकर आखिरी सांस तक उन्होंने कभी इसे कम नहीं होने दिया।

वे उस दौर के पत्रकार थे, जब काफी कम संसाधनों के बीच काम करना पड़ता था। लेकिन जैसे-जैसे नई टेक्नोलॉजी आती गई भाऊ खुद को उससे जोड़ते भी गए । मुझे याद है एक अखबार में हम साथ काम करते थे । उस समय नया डिजिटल कैमरा आया तो भाऊ ने एक कैमरा अपने पास रख लिया। कलम के तो वे जादूगर थे ही….. जहां भी जाते तो अपनी स्टोरी के लिए तस्वीर भी साथ ले आते। गांव- गांव, गली- गली के  किसानों- गरीबों- मजदूरों से लेकर पंच, सरपंच, जनपद, जिला पंचायत की राजनीति करने वाले तमाम लोगों के साथ उनका सीधा नाता रहा। वे हर समय सक्रिय ही रहते थे। पिछले कुछ सालों से मोबाइल और इंटरनेट  का चलन बढ़ा तो भाऊ कहीं पीछे नहीं रहे ।

वे अपने काम के लायक सब कुछ मोबाइल और लैपटॉप पर खुद कर लेते थे ।इस बारे में उनसे जब भी बात होती तो मैं उनसे हर बार कहता था कि अगर पुराने दौर की पत्रकारिता को नई टेक्नोलॉजी के साथ मिला दिया जाए,तो आज भी अच्छी पत्रकारिता की जा सकती है । अब ऐसा दौर आया है जब पत्रकारिता करने के लिए किसी घराने की ओर मुंह ताकने की जरूरत नहीं है । उन्होंने नई टेक्नोलॉजी के इस मर्म को समझ लिया था और इसका भरपूर इस्तेमाल करते रहे। कोरोना काल में भी वे घर से ही पूरी रिपोर्ट सोशल मीडिया के जरिए लोगों तक पहुंचाते रहे। समाज को सही खबर पहुंचाने की ड्यूटी उन्होंने अपनी जिंदगी के आखिरी दिनों तक निभाई । उमर के इस पड़ाव में आकर भी वे थके नहीं थे । कोई भी याद कर सकता है कि भोर से लेकर देर रात तक ख़बर लिखना और सोशल मीडिया में शेयर करना, उनका ऐसा काम था कि आज की पीढ़ी के नौजवान भी हांफ जाएगे और उनका मुकाबला नहीं कर सकेंगे।बीमारी ने उन्हे भले ही घेर लिया था । लेकिन वे आख़री सांस तक पत्रकारिता ही करते रहे।

भाऊ (Shashikant Konher) ऊपर से जितने कड़क और बोल्ड थे, दिल से उतने ही संवेदनशील इंसान थे। रिश्तों को बनाना और निभाना उन्हें खूब आता था । प्रेस क्लब अध्यक्ष के रूप में उन्होंने पत्रकारों के परिवारों को साथ जोड़ा और उस संस्था को एक नई पहचान दी।विवादों के बीच भी साहस के साथ अपनी बात रखने की ताकत उनके भीतर थी । एक बार हम कई लोग एक साथ साथ बैठे थे। इस बीच यह बात कही गई कि “मीसा में सब चोर लोग जेल गए थे….”। शशि भाऊ ने इस बात पर बिना देर किए तुरंत ही सख्त ऐतराज किया और अपने अंदाज़ में बोले- “आपकी जानकारी गलत है …… मैं भी मीसा में जेल गया था और किसी के घर चोरी नहीं की थी…..”। उन्होंने इस बात की परवाह नहीं की कि वे जिसे जवाब दे रहे हैं, वह शख्स कौन है….। उनके साथ गुजारे पल ऐसे कई उदाहरणों से भरे हैं।याद करो तो फ्लैशबैक में बहुत सारे सीन नजरों के सामने से गुजर जाते हैं। जिनका जिक्र करेंगे तो पता नहीं कितने पन्ने भर जाएंगे। कम शब्दों में बहुत अधिक और बहुत बड़ी बात कह देने वाले भाऊ के लिए इन्हीं शब्दों के साथ श्रद्धांजलि अर्पित है – “तुम न जाने किस जहां में खो गए……” ।(रुद्र अवस्थी)

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