जन आंदोलन की दरकार नहीं थी सरकार..तो बरसों तक हवाई सेवा के लिए क्यूं तरसता रहा बिलासपुर….?

(रुद्र अवस्थी)दीवारों पर टंगे कैलेंडर में जो हफ़्ता चल रहा था , यह उसी हफ़्ते की बात है। ।इधर न्यायधानी में हवाई सेवा को लेकर ढाई सौ से अधिक दिनों से धरना चल रहा था ।उधर देश की राजधानी दिल्ली में पीएम नरेन्द्र मोदी की ओर से  आंदोलनजीवी / परजीवी  को नई ज़मात कहे जाने पर बहस चल रही थी। और इसी हफ्ते छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर पहुंचे केंद्रीय नागरिक उड्डयन मंत्री हरदीप सिंह पुरी कह रहे थे कि – उन्हें बताया गया है कि बिलासपुर को हवाई सेवा से कनेक्ट करने के लिए कोई आंदोलन चल रहा है। हरदीप सिंह पुरी यह भी बोले – कि मैं समझता नहीं कि आंदोलन क्यों चल रहा है …….। हमने तो कह दिया था कि हम बिलासपुर को लिंक करेंगे। फिर उन्होंने आने वाले मार्च महीने की पहली तारीख से बिलासपुर से एयरसर्विस शुरू करने का ऐलान भी किया। बरसों से हवाई सेवा की बाट जोह रहे बिलासपुर वासियों  के लिए यह खबर सुखद रही कि अब वे अपने आसमान के ऊपर भी हवाई जहाज उड़ते हुए देख सकेंगे। लेकिन जिस तरह आंदोलनजीवी / परजीवी की नई जमात कहे जाने के बाद देशभर में प्रतिक्रिया हुई। कुछ उसी तरह का रिएक्शन हरदीप पुरी के बिलासपुर के आंदोलन को लेकर कहीं बातों से भी हुआ है। लोगों को बीजेपी के सर्वमान्य नेता और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेई को याद करने का एक और बहाना मिल गया। लोग अभी भी नहीं भूले हैं कि अटल जी ने रेलवे जोन की मांग को लेकर बिलासपुर में चले लंबे आंदोलन को सम्मान दिया । उन्होंने कभी भी उस जन आंदोलन को लेकर हैरत नहीं जताई। अलबत्ता बिलासपुर के जन आंदोलन और यहां के लोगों की भावनाओं के साथ खुद को जोड़कर रेलवे जोन की मांग को अपनी मांग के रूप में सार्वजनिक रूप से स्थापित कर दिया था। फिर सत्ता में आने के बाद खुद बिलासपुर में रेलवे जोन बनाने का ऐलान किया। न्यायधानी के लोग बेहतर जानते हैं कि अपनी ज़रूरतों के लिए उन्होने  खुद अपनी लड़ाई लड़ी और उसे  हासिल भी किया है। अपनी मांगों को लेकर  यहां के लोगों ने अपने ही वोट से चुने हुए नुमाइंदों को जगाया भी है। बिलासपुर शहर की इस तासीर को कम से कम मध्य भारत और छत्तीसगढ़ में सभी लोग पहचानते और महसूस भी करते रहे हैं। अगर अपनी लड़ाई बिलासपुर की जनता खुद लड़ती है तो श्रेय की लड़ाई का कहीं सवाल ही नहीं उठता। इस शहर के लोगों के दिमाग में यह सवाल कभी नहीं उठता कि किसने हमें क्या दिया….. ? 

 चूंकि उन्हे अच्छी तरह से मालूम है कि हमें जो चाहिए हम वह अपने बूते ही हासिल कर सकते हैं। ऐसे में हरदीप पुरी के बयान पर स्वाभाविक प्रतिक्रिया यही सुनने को मिल रही है कि सरकार आंदोलन को तवज्जो दे या ना दे । लेकिन मांग पूरी करने का एलान करते समय आंदोलन का ज़िक्र तो करना ही पड़ेगा। अंत भला तो सब भला की तर्ज पर बिलासपुर से एयर सर्विस शुरू करने का ऐलान हो चुका है। अब अगर कोई यह कहे कि आँदोलन की ज़रूरत नहीं थी….तो पलटकर बिलासपुर वाले यह तो पूछ ही सकते हैं कि इतने दिनों तक  हवाई सेवा के मामले में बिलासपुर क्यों उपेक्षित रहा…. ? क्यों इसे लेकर संजीदगी से पहल नहीं की गई ……. ? और हम उड़ान को तरसते रह गए। अब किसी भी पद पर बैठा हुआ शख्स अगर इसे माने या ना माने …….,  लेकिन बिलासपुर वासी तो जानते ही हैं कि आंदोलन नहीं होता तो इस बार भी उड़ान की तारीख़ के एलान तक बात नहीं पहुंचती । यही वजह है कि अपने पुराने तजुर्बे को याद करते हुए बिलासपुर के हवाई सुविधा जन संघर्ष समिति ने अपना टेंट अभी भी नहीं उखाड़ा है और पहली उड़ान शुरू होते तक बिलासपुर में अपना आंदोलन जारी रखने का फैसला किया है।

अरपा के उद्गम पर महोत्सव

न्यायधानी के बीचो – बीच बहने वाली अरपा नदी को हम सब अंतः सलिला भी कहते हैं। यह मानकर  अंतः सलिला  नाम दिया गया है कि यह नदी सतह के नीचे बहती है। शायद इस नाम के अनुरूप ही अरपा को लेकर कोई भी विवाद भी सतह के नीचे ही चलता रहता है। लेकिन कभी-कभी यह सतह के ऊपर भी दिख जाता है। पिछले हफ्ते नए जिले गौरेला -पेंड्रा -मरवाही  की पहली सालगिरह पर आयोजित अरपा महोत्सव के दौरान भी कुछ ऐसा ही सतह पर नजर आया। बरसों से यह माना जाता है कि अरपा का उद्गम स्थल पेंड्रा के नजदीक अमरपुर में है। यही सोच कर मुख्यमंत्री भूपेश बघेल ने नए जिले की स्थापना के समय अरपा महोत्सव कराने का ऐलान किया था। इस साल अरपा  महोत्सव में शिरकत करने भी आए।  इस जलसे के दौरान बड़ा मेला लगा और कई कल्चरल कार्यक्रम हुए। इसी हफ्ते खोडरी में भी 2 दिन का मेला लगाया गया। आयोजकों का मानना है कि अरपा का उद्गम स्थल खोडरी में है। इसे देखते हुए उन्होंने खोडरी में जलसा रखा। दिलचस्प बात यह भी है कि पेंड्रा के अरपा महोत्सव में सीएम भूपेश बघेल शामिल हुए और खोडरी के जलसे में सीएम के नजदीकी – छत्तीसगढ़ खनिज विकास निगम के अध्यक्ष गिरीश देवांगन शामिल हुए। दोनों जगह जलसा अपने – अपने हिसाब से हुआ ।  दोनों जगह के लोगों ने इसका आनंद लिया। अपनी – अपनी ज़गह पर उद्गम स्थल मानने वाले सभी लोगों को संतुष्टि मिल गई ।लेकिन एक हफ्ते के भीतर दो जगहों पर अरपा का उद्गम स्थल बताते हुए आयोजित दो अलग-अलग कार्यक्रमों ने इस सवाल की पैदाइश तो कर दी है कि अरपा का  सही में उद्गम स्थल कौन सा है……..? हालांकि सीएम भूपेश बघेल ने अपने कार्यक्रम में जोर देकर यह बात कही कि हमारे पुरखों ने जहां बताया है वहीं अरपा का उद्गम स्थल है। लेकिन दूसरी तरफ खोडरी के आयोजकों का कहना है कि सरकारी रिकॉर्ड –  भौगोलिक स्थिति आदि के हिसाब से खोडरी के पास ही अरपा का उद्गम स्थल है। ऐसी हालत में हालांकि अंतः सलिला अरपा के किनारे बसे बिलासपुरिहा लोगों की पहली चिंता यही है कि अरपा की हालत में सुधार हो और इसमें बारहों महीने पानी बहता रहे । फिर भी नदी के उद्गम स्थल को लेकर सामने पेश हो रहे दो अलग-अलग सीन लोगों की उत्सुकता तो बढ़ाते हैं कि सही में उद्गम स्थल किसे माना जाए……. ?

क्रिकेट के बहाने

मैदान खेल का हो या सियासत का ……….। अच्छी टीम भी जरूरी है , खेल की प्रैक्टिस भी जरूरी है और स्कोरिंग भी जरूरी है। खेल और सियासत के इस फार्मूले को तखतपुर विधानसभा इलाके में मौजूदा विधायक रश्मि आशिष सिंह ठाकुर ने कुछ नए अंदाज में अपनाया।  और खेल – खेल में उन्होंने अच्छी स्कोरिंग कर ली । मौका था  विधायक के रूप में कार्यकाल की दूसरी सालगिरह मनाने का ……..। आमतौर पर सालगिरह जैसे मौकों पर कार्यकर्ताओं के सम्मेलन होते हैं। भाषण बाजी होती है और लंच / डिनर के साथ जलसा सिमट जाता है। लेकिन आशिष सिंह ने क्रिकेट डिप्लोमेसी के जरिए एक कुछ नए अंदाज में सालगिरह मनाई। जिसमें उन्होंने पूरे विधानसभा इलाके के सवा सौ से अधिक गांव  के नौजवानों  की क्रिकेट टीम बनाकर उनके मैच कराएं। मैच का आयोजन विधानसभा मुख्यालय तखतपुर में कराने की बजाय इलाके को 3 सेक्टर सकरी – काठाकोनी और बेलपान में बैठकर लीग मैच कराए गए। जिससे पूरे इलाके में करीब महीने भर तक खेल महोत्सव जैसा माहौल बना रहा। इसके बाद अलग-अलग जगह क्वार्टर फाइनल मैच हुए। फिर तखतपुर में सेमीफाइनल और फाइनल मैच कराया गया। खेल के आखरी दिन तखतपुर में बड़ा जलसा हुआ। जिसमें छत्तीसगढ़ विधानसभा के स्पीकर डॉ चरणदास महंत और प्रदेश सरकार के मंत्री जयसिंह अग्रवाल सहित कई दिग्गज शामिल हुए। फाइनल -सेमीफाइनल मैच सहित गांव – गांव में हुए क्रिकेट मैच के दौरान बड़ी तादाद में लोगों की भीड़ जुटी। खासकर नौजवानों में खासा जोश –खरोश- उत्साह नजर आया।पूर्व विधायक ठाकुर बलराम सिंह के नाम पर  और उनकी याद में हुए इस खेल आयोजन में करीब डेढ़ हजार खिलाड़ियों की हिस्सेदारी रही। जिन्हें बेट –  बॉल के साथ ही यूनिफॉर्म भी बांटे गए। समापन जलसे में डॉ महंत ने ठाकुर बलराम सिंह  की जादुई शख्सियत को याद किया। साथ ही मौजूदा विधायक संसदीय सचिव रश्मि सिंह की इलाके में सक्रियता और लोगों की मांगों को पूरा कराने के मामले में उनके जुझारूपन की खुलकर तारीफ की। इस आयोजन की कामयाबी से खुश आशिष सिंह ने फैसला किया है कि आने वाले समय में बूथ स्तर पर क्रिकेट खिलाड़ियों  की टीम बनाई जाएगी। साथ ही तखतपुर विधानसभा क्षेत्र की दो प्रमुख टीमें बनाई जाएंगी। जिन्हें टूर्नामेंट के बड़े आयोजनों में भेजा जाएगा। जाहिर सी बात है कि इस तरह के आयोजन से खेल को प्रोत्साहन मिलेगा और तखतपुर इलाके से नई क्रिकेट प्रतिभाओं को सामने लाने में मदद मिलेगी। लेकिन खेल के मैदान में झलक रही सियासत का एक  एंगल यह भी है कि इस तरह के आयोजन के जरिए आशिष सिंह ने इलाके के गांव -गांव में लगातार  जीवंत संपर्क बनाने के साथ ही नौजवान वोटर को अपने साथ जोड़ने के लिए भी एक बड़ा काम कर लिया है।तख़तपुर इलाके में वैसे भी क्रिकेट का  जुनून गांव – गांव में नजर आता है। सूबे के पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह भी एक सार्वजनिक जलसे में कह चुके हैं कि वे अपने छात्र जीवन के दौरान कवर्धा से अपनी क्रिकेट टीम लेकर तखतपुर खेलने आते रहे हैं। इलाके के इस मरम को समझ कर आशिष सिंह ने क्रिकेट की पिच पर सियासत का स्टंप गड़ा दिया है। चुनावी राजनीति में उन्हें इसका कितना फायदा मिलेगा यह तो आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन फिलहाल तो यही दिखाई दे रहा है कि तखतपुर इलाके के मैदान पर तखतपुर इलाके के नौजवान खिलाड़ी चौका -छक्का लगाते रहे और स्कोरिंग आशिष सिंह के नाम दर्ज होती रही।

राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल की विरासत

राजेंद्र प्रसाद शुक्ल लंबे समय तक कोटा विधानसभा क्षेत्र के पर्याय रहे हैं। वे कोटा विधानसभा क्षेत्र से कई बार विधायक चुने गए। वे मध्य प्रदेश में विधानसभा अध्यक्ष और मंत्री रहे। साथ ही छत्तीसगढ़ विधानसभा के पहले  अध्यक्ष थे। उनके जन्मदिन पर उनके पुराने समर्थकों ने बहेरामुड़ा गांव में एक कार्यक्रम आयोजित कर उनकी जयंती मनाई । इस दौरान राजेंद्र प्रसाद शुक्ल की ओर से कोटा विधानसभा क्षेत्र में कराए गए कामों को याद किया गया और उन्हें श्रद्धांजलि दी गई। इस जलसे की एक खासियत यह भी थी राजेंद्र प्रसाद शुक्ल के चिरंजीव डॉ. प्रदीप शुक्ला भी इसमें शिरकत करने पहुंचे । उन्होंने भी अपने पिता और परिवार को कोटा विधानसभा क्षेत्र के लोगों की ओर से मिले स्नेह और  सहयोग को यादगार बताया। राजनीतिक हलकों में चर्चा रही कि राजेंद्र प्रसाद शुक्ल के निधन के बाद यह पहला मौका है ,जब उनके परिवार से किसी ने कोटा इलाके के किसी सार्वजनिक जलसे में शिरकत की है। हालांकि यह कार्यक्रम पूरी तरह से राजेंद्र प्रसाद शुक्ल की जयंती और उनके व्यक्तित्व – कृतित्व पर ही केंद्रित था। लेकिन उनके परिवार की हिस्सेदारी से माना जा रहा है कि अगर राजेन्द्र प्रसाद शुक्ल की  विरासत को आगे बढ़ाने की दिशा में यह पहला कदम है तो  आने वाले समय में कोटा इलाके की राजनीति पर इसका असर दिखाई दे तो हैरत की बात नहीं होगी।

भाजपा की रणनीति

जाने –माने सिनेमा कलाकार जैक़ी श्राफ़ की एक फिल्म में डायलाग़ था – “ यह दुनिया एक बूचड़ख़ाना है…..।जिसके पास जितनी बड़ी तलवार है, उसे काट रहा है….।”  एक समीक्षक ने जिले में बीजेपी की राजनीति का ज़िक्र करते हुए सिनेमा के इस डॉयलाग़ को याद किया  । हाल ही में भारतीय जनता युवा मोर्चा में हुई नियुक्तियों को उन्होने कुछ इसी तरह बयान किया । इन नियुक्तियों में पार्टी के बड़े नेताओँ की पसंद का ख़्याल रख़ते हुए नौज़वानों को अहमियत दी गई। लेकिन पार्टी को ज़िले में एक भी ऐसा चेहरा नहीं मिल सका, जिसे प्रदेश कार्यसमिति में जगह मिल पाती । जिला स्तर के पदों के लिए बड़े नेताओं ने अपने हिस्से बांट लिए। लेकिन उन्हे प्रदेश स्तर के लिए कोई भी चेहरा नहीं मिल सका। मौक़ा कोई भी हो – पार्टी कोई भी हो….. हर एक नियुक्ति के समय दावेदारों के मुक़ाबले पद कम ही होते हैं। नजीजतन हर एक नियुक्ति के बाद कुछ कार्यकर्ताओँ के बीच नाराज़गी स्वाभाविक है। पार्टी का भला चाहने वाले समझ रहे हैं कि नेताओँ ने पार्टी के हित को देख़ते हुए ही यह रणनीति अपनाई होगी । मगर किसी भी फैसले का नतीज़ा तो अपने वक़्त पर ही सामने आता है। लिहाज़ा वक़्त का इंतज़ार करना ही बेहतर होगा।

पैसेंज़र ट्रेन का नया अवतार

रेल में सफर करने वाले लोगों के लिए करीब 11 महीने बाद यह  राहत भरी खबर आई है कि रेलवे की ओर से लोकल सवारी  गाड़ियां शुरू की जा रही है। रेल यात्रियों की सुविधा और मांग को ध्यान में रखते हुए बिलासपुर –रायपुर- डोंगरगढ़ के बीच 12 सवारी स्पेशल ट्रेनें शुरू कर दी गई हैं। जिसमें बिलासपुर -रायपुर -दुर्ग -डोंगरगढ़ के बीच कि कई ट्रेनें शामिल है।  रेलवे के इस फैसले से मुसाफिरों को राहत मिलेगी यह तय  है। लेकिन रेलवे ने  सवारी ट्रेनों को स्पेशल ट्रेन के नाम से चलाने का फैसला किया है। जाहिर सी बात है वर्षों से चलने वाली गाड़ियां कोरोना काल  में  रद्द होने के बाद अब स्पेशल  कर नए अवतार में  रेल की पटरी पर दौड़ने वाली हैं। और स्पेशल का तमगा लगने के बाद रेल यात्रियों की जेब पर इसका असर पड़ने वाला है। जिसके चलते राहत के साथ परेशानियों को भी जगह मिल गई है। शायद इसके पीछे संदेश यही है कि पैसेंजर ट्रेन चल तो गई…..।  लेकिन सफर तभी करें जब बहुत जरूरी हो।

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