महतारी भाखा – छत्तीसगढ़ी ला आठवीं अनुसूचि मां शामिल करे बर अब दिल्ली मां गोहराए के बेरा आ गे …..नंदकिसोर सुकुल कहिन – भूपेस ले हावै उमीद

बिलासपुर।  छत्तीसगढ़ी राजभाषा मंच के प्रांतीय संयोजक नंदकिशोर शुक्ला ने  छत्तीसगढ़ी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल किए जाने संबंधी शासकीय संकल्प विधानसभा में सर्वसम्मति से पारित किए जाने पर खुशी जाहिर की है । उनका मानना है कि मौजूदा सरकार में बैठे लोगों का के मन में यह बात है ।  इसलिए अशासकीय संकल्प रखा गया है । लेकिन अब लोकसभा में भी छत्तीसगढ़ के सांसदों को एकजुटता दिखाकर यह प्रस्ताव रखना चाहिए । जिससे संविधान संशोधन के जरिए छत्तीसगढ़ी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल किया जा सके ।  साथ ही महतारी भाषा छत्तीसगढ़ी को सम्मान दिलाने के लिए राज्य के स्तर पर भी सरकारी कामकाज की भाषा और स्कूल स्तर पर पढ़ाई -लिखाई शुरू करने के लिए ठोस कदम उठाए जाने की जरूरत है ।

cgwall.com से एक लंबी बातचीत के दौरान नंदकिशोर शुक्ला ने कहा कि विधानसभा में सर्वसम्मति से संकल्प पारित करने से यह बात स्पष्ट पता चलती है कि छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के मन में छत्तीसगढ़ी भाषा को सम्मान दिलाने की भावना है।  इसीलिए उन्होंने यह संकल्प रखा है । इसके पहले भी कई बार यह संकल्प रखा गया । लेकिन वह किसी कारण से नहीं हो सका । हालांकि छत्तीसगढ़ महतारी को राजनीति में जरूर फांस लिया गया है । इस कारण ही भूपेश बघेल ने जब प्रधानमंत्री को पत्र लिखा तो भाजपा के लोग उसका मजाक उड़ाने लगे । जबकि होना यह था कि पूरे छत्तीसगढ़ के हित की बात समझ कर इस मुद्दे को राजनीति में नहीं घसीटते और सभी इसके पक्ष में खड़े होते । आलोचना भी अलग ढंग से हो सकती है । चलिए अब गिला – शिकवा खत्म हो गया  । सभी ने एकमत होकर शासकीय संकल्प पारित कर लिया है।  सभी ने पार्टीबंदी से ऊपर उठकर इसमें साथ दिया है । जिसके लिए सभी साधुवाद के पात्र हैं । राजनीति अपनी जगह है । पर हमारी अस्मिता -हमारी पहचान और चिन्हारी सभी से ऊपर है । विधानसभा में सर्वसम्मति से संकल्प पारित होने पर यह सिद्ध भी हो गया  । इस हिसाब से मामला अब ठीक हो गया है ।

नंदकिशोर शुक्ल कहते हैं कि अब एक स्वर्ण अवसर है कि भाजपा और कांग्रेस के लोग ईमानदारी से कोशिश करें तो लोकसभा में संविधान संशोधन के जरिए छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल किया जा सकता है । केंद्र में भाजपा का बहुमत है । अब छत्तीसगढ़ के सभी सदस्य मिलकर लोकसभा में विधेयक रख दें और सभी समर्थन कर इसे पारित कराएं। यह सब की जिम्मेदारी है । इसके लिए दिल्ली में खंभ ठोंककर सभी को उसके पीछे खड़े होना पड़ेगा । दोनों पार्टी सहमत हो तो बहुमत अपने आप में हो जाएगा और यह प्रस्ताव पारित हो सकता है । ऐसे में छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल किया ही जा सकता है।  हालांकि आठवीं अनुसूची में शामिल होने से सरकारी कामकाज और पढ़ाई लिखाई में छत्तीसगढ़ी भाषा का प्रयोग हो ऐसा नहीं है।  आठवीं अनुसूची में शामिल होने के बाद भाषा के विकास के लिए सरकार कुछ फंड देती है । लेकिन सरकारी कामकाज को तो राज्य स्तर पर हमें ही करना पड़ेगा । स्कूलों में पढ़ाई-  लिखाई का काम प्रदेश के शिक्षा विभाग के अधीन है।  हम जहां तक छत्तीसगढ़ी भाषा के सम्मान की बात है । हम जितना सम्मान देंगे उतना सम्मान बढ़ेगा ।

नंदकिशोर शुक्ल बताते हैं कि मैथिली भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया । लेकिन इस पर बहुत कुछ काम नहीं हो सका है ।  वे यह भी बताते हैं कि आसाम में बोड़ो भाषी लोगों की संख्या छत्तीसगढ़ी बोलने वालों की संख्या के मुकाबले कम है । उनका अपना अलग राज्य भी नहीं है । लेकिन उन्होंने आज़ादी के पहले से ही अपनी बोड़ो भाषा को सम्मान दिलाने के लिए आंदोलन शुरू किया । बोड़ो वासियों ने सोचा था कि उनकी भाषा अगर नहीं बची तो संस्कृति ही खत्म हो जाएगी । इस पहचान को बनाने के लिए उन्होंने कमर कसी और आज़ादी के पहले ही इस की लड़ाई शुरू कर दी थी । उनकी मुहिम में गति तब आई जब आसाम प्रांत में असमिया भाषा में पढ़ाई लिखाई चालू हुई । ऐसे में बोड़ोवासियों को लगा कि असमिया भाषा में पढ़ाई लिखाई होती है तो हमारी भाषा का क्या होगा….?  इस पर उन्होंने संघर्ष शुरू किया । उनकी कोशिश का परिणाम हुआ कि आंदोलन में सभी समाज के लोग शामिल हुए । एक दबाव बना और 1963 से बोड़ो भाषा में पहली कक्षा से पढ़ाई लिखाई माध्यम के रूप में शुरू हुई । लिपि नहीं थी तो पहले रोमन लिपि और फिर असमिया – बंगाली में बोडो भाषा का प्रयोग शुरू हुआ । यह इस बात का उदाहरण है कि यदि लोग अपने मन में ठान लें तो अपनी भाषा को सम्मान दिला सकते हैं । वे यह भी मानते हैं कि भाषा को सम्मान त्याग और तपस्या से ही लाया जा सकता है । अपनी दावेदारी के साथ शक्ति भी जरूरी है।  इसके साथ साथ छत्तीसगढ़ राज्य में सरकारी कामकाज और स्कूल स्तर पर छत्तीसगढ़ी में पढ़ाई -लिखाई के लिए भी ठोस कदम उठाने की जरूरत है ।  इसके लिए दृढ़ इच्छाशक्ति जरूरी है । वे यह भी मानते हैं कि भोजपुरी ,राजस्थानी और छत्तीसगढ़ी तीनों भाषाओं को आठवीं अनुसूची में शामिल करने के लिए इन क्षेत्र के लोगों को एकजुटता से प्रयास करना चाहिए ।  जिससे पर्याप्त दबाव बन सकता है । छत्तीसगढ़ी का दावा कई कारणों से मजबूत है । छत्तीसगढ़ी को राजभाषा के रूप में दर्जा दिया गया है । साथ ही छत्तीसगढ़ का अपना अलग राज्य है।  इस आधार पर छत्तीसगढ़ी को आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाना चाहिए ।

इस सवाल पर कि छत्तीसगढ़ के मौजूदा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से छत्तीसगढ़ी भाषा के सम्मान और विकास को लेकर कितनी उम्मीदें हैं …. ?  जवाब में नंद किशोर शुक्ला ने कहा कि भूपेश बघेल के मन में छत्तीसगढ़ी भाषा को लेकर भरपूर इच्छाशक्ति दिखाई देती है जिससे भरपूर उम्मीद की जा सकती है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े नंद किशोर शुक्ल संघ के कार्यों में लंबा समय दिया है । उन्हें असम इलाके में रहकर भी कार्य किया । जिससे उन्हें उस क्षेत्र मैं भाषा को लेकर चल रहे प्रयासों के संबंध में व्यापक अध्ययन और जानकारी भी है। छत्तीसगढ़ी को राजभाषा का दर्ज़ा दिलाने के लिए भी उन्होने मुहिम चलाई और प्रदेश में साइकिल यात्रा भी की थी। छत्तीसगढ़ी भाषा के सम्मान के लिए हर एक़ स्तर पर प्रयासरत नंदकिशोर शुक्ल अफनी साफ़गोई के लिए भी जाने जाते हैं।

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