जिला पंचायतः बंजारों की तरह भटक रहे सभापति..नहीं बना चैम्बर..पहचान पत्र को तरसा रहे कर्मचारी..सामने आयी महिला जन प्रतिनिधियों की नाराजगी

बिलासपुर—जिला पंचायत चुनाव को करीब 6 महीने हो चुके हैं। अभी तक संभापतियों को चैम्बर का इंतजार है। बावजूद इसके जिला पंचायत प्रशासन के कान पर जूं नहीं रेंग रहा है। नाम नहीं छपने की शर्त पर कुछ सदस्यों ने बताया कि अधिकारियों पर लगाम नहीं होने के कारण जनप्रतिनिधियों का हाल बेहाल है। अभी तक पहचान पत्र भी नहीं बना है।

                 फरवरी शुरूआत में जिला पंचायत चुनाव हुआ। मार्च मध्य में जिला पंचायत बाड़ी का गठन हुआ।  सदस्यों के बीच सभापति का चुनाव हुआ। चार बीत जाने के बाद भी सभापतियों के पास ना तो बैठने का कमरा है और ना ही किसी सदस्य के पास अपना पहचान पत्र ही है। अधिकारियों की हीला हवाली के चलते जिला पंचायत सदस्यों समेत सभापतियों में जमकर नाराजगी है। यद्यपि जिला पंचायत अध्यक्ष अरूण सिंह का कहना है कि सभापतियों को अलग से चैम्बर का प्रावधान नहीं है। बावजूद इसके हम एक कमरे में दो सभापतियों की बैठने की व्यवस्था कर रहे हैं। उन्होने कहा इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि हम कहां बैठें..हम चाहते हैं कि काम में किसी प्रकार का व्यवधान ना हो। सब लोग उनके चैम्बर में बैठकर अपना काम कर सकते हैं।

सभापतियों की नाराजगी 

             जानकारी देते चलें कि फरवरी में जिला पंचायत चुनाव के बाद मार्च मध्य में सदस्यों के बीच से सभापतियों को चुना गया। जिला पंचायत अधिकारियों ने अभी तक सभापतियों के लिए बैठक की व्यवस्था नहीं की है। जाहिर सी बात है कि इस बात को लेकर सभापतियों में जमकर नाराजगी है। अलग बात है कि कोई इस नाराजगी को खुलकर जाहिर नही कर रहा है। खासकर महिला सदस्यों की परेशानी कुछ अलग है। पक्ष विपक्ष के महिला सदस्यों ने बताया कि चार महीने के बाद भी बैठक व्यवस्था की बात तो दूर..सामान्य प्रसाधन की भी उचित व्यवस्था नहीं है। जिसके चलते सभी महिला सदस्यों को भारी  परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।

स्थायी समिति के सभापति

                 बताते चलें कि मार्च महीने में सदस्यों के बीच से कुल 6 स्थायी समितियों के लिए सभापतियों का चुनाव हुआ। अरूण चौहान सामान्य प्रशासन और जिला पंचायत उपाध्यक्ष हेमकुंवर अजीत श्याम पदेन सभापति है। सदस्यों ने वोटिंग के जरिए मीनू सुमन्त यादव को .महिला एवं बाल विकास,  राहुल सोनवानी को निःशक्त जन स्थायी सभापति के लिए चुना। संगीता बाई करसायल को पर्यावरण स्थायी समिति की जिम्मेदारी दी गयी। .राजेश्वर भार्गव को कृषि स्थायी समिति, जितेन्द्र पाण्डेय को.संचार तथा संकर्म, संदीप योगेश यादव को सहकारिता तथा उद्योग और अंकित गौरहा को स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण स्थायी सभापति का अध्यक्ष बनाया गया।

बंजारों की तरह भटक रहे सभापति

               बहरहाल सभी सभापति बंजारों की तरह इधर उधर बैठ रहे हैं। जिला पंचायत प्रशासन कभी नियमों का हवाला देकर तो कभी कोविड 19 को लेकर चैम्बर की व्यवस्था करने से बच रहे हैं। मजेदार बात है कि अधिकारी सभापतियों और सदस्यों के कार्ड बनने में  भीदेरी की वजह कोविड-19 को बता रहे हैं। 

अब तक नहीं बना पहचान पत्र

                 भाजपा के एक सभापति ने बताया कि अधिकारियों पर किसी प्रकार का नियंत्रण नहीं है। कमरे की कमी भी नहीं है। लेकिन कुछ लोग अधिकारियों की हां में हां मिला रहे है। जिसके कारण ना तो चैम्बर बन रहा है और ना ही अभी तक पहचना पत्र ही  मिला है।

सभापतियों के अलावा महिलाओं को भी सुविधा होनी चाहिए

           भाजपा नेत्री चांदनी भारद्वाज ने बताया कि सभापतियों के लिए चैम्बर की व्यवस्था बहुत जरूरी है। एक समिति में अध्यक्ष को मिलाकर कुल 6 सदस्य होते हैं। सभी के लिए बैठक की व्यवस्था करना अध्यक्ष और अधिकारियों की जिम्मेदारी है। कोविड-19 में ऐसा किया जाना बहुत जरूरी है। चांदनी भारद्वाज ने बताया कि महिला सदस्यों के लिए एक अलग चैम्बर या कमरे की जरूरत है। महिलाओं की अपनी समस्याएं होती हैं। बैठने की व्यवस्था से निजता कायम रहती है। जबकि शासन से निर्देश भी है कि महिलाओं की समस्याओं को गंभीरता से लिया जाए। लेकिन जिला पंचायत में ऐसा कुछ होता नहीं दिखायी दे रहा है।

प्रतिनिधियों पर भारी अधिकारी

             भारद्वाज ने यह भी बताया कि जरूरी नहीं कि हर काम अध्यक्ष के चैम्बर में हो। सभापति निकाय का संवैधानिक पद है। सभी सभापतियों को अलग से चैम्बर दिया जाना जरूरी है। एक साथ दो या तीन सभापतियों की बैठक व्यवस्था कोविड-19 को सीधी चुनौती है। लेकिन कांग्रेसियों की अधिकारियों पर नियंत्रण नहीं है। जाहिर सी बात है कि जो अधिकारी चाहेंगे..वही होगा।  

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