“छत” की तरह “भसक” रही न्यायधानी की तरक्की…

 IMG-20160216-WA0006(रुद्र अवस्थी)auditorium 1 अगर तरक्की के कामों की कछुआ चाल भ्रष्टाचार है…अगर घटिया काम भ्रष्टाचार है…अगर सरकारी खर्च से बन रही किसी इमारत का भसक जाना भ्रष्टाचार है…?तब तो एक लाइन में यह मान लेना पड़ेगा कि बिलासपुर में तरक्की के नाम पर सिर्फ और सिर्फ गड़बड़झाला हो रहा है। यह शहर पता नहीं कितने बरसों से सीवरेज की अधूरी कहानी पर आँसू बहा रहा है।ऑडिटोरियम जैसी कितनी अधूरी इमारते आम आदमी के शब्र का सालाना इम्तहान पिछले कई बरसों से ले रही हैं। शहर की हर एक सड़क और गली-कूचे की पहचान गड्ढे और गर्द-गुबार से बनी हुई है। गौरव – पथ तरक्की की ऐसी लेबोरेटरी में तब्दील हो गया है, जहाँ एक गड्ढा पूरी तरह से पट नहीं पाता और दूसरी तरफ से खोदाई चालू हो जाती है। स्वच्छता अभियान के मुंह पर थूकते हुए से हर गली-नुक्कड़ पर कचरे का अम्बार नजर आता है। नई कम्पोजिट बिल्डिंग की हलत अपनी कहानी खुद बयां कर रही है ….और लोगों का आना-जाना बंद कर खुद प्रशासन तुरकाडीह पुल के घटिया निर्माण पर अपनी मुहर लगा चुका  है। न्यायधानी को यह सब सहते- झेलते देखकर सूबे की सबसे बड़ी अदालत भी व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों को फटकार लगा चुकी है। लेकिन यह तो व्यवस्था संभाल रहे जिम्मेदार लोगों की बेहयायी-ढिठाई और हिम्मत की इंतहा हो गई कि उन्होने हाई कोर्ट कैम्पस को भी नहीं छोड़ा। जहाँ बन रही इमारत की छत ढलाई के दौरान भसक गई। और एक मजदूर की जान लेकर कई मजदूरों को जख्मी कर दिया।

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             इन पूरी बातों को एक साथ जोड़कर देखें तो ऐसा लगता है कि अपना बिलासपुर शहर सर्वश्रेष्ठ , बहुआयामी और सबसे मंहगे भ्रष्टाचार की नुमाइश का “मीना बाजार” बन गया है। जहाँ सभी किस्म के भ्रष्टाचार को देखा-परखा और समझा जा सकता है।जिन लोगों पर भी व्यवस्था की जिम्मेदारी है, वे इस मायने में बधाई के पात्र हो सकते हैं कि शहर को कम-से-कम इस दिशा में तो ले जा रहे हैं कि कोई रिसर्च स्कॉलर अगर भ्रष्टाचार पर पीएचडी करना चाहे तो उसे बिलासपुर के बाहर नहीं जाना पड़ेगा।

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व्यवस्था की कमान संभालने वालों से कोई भी यह पूछ सकता है कि  कोई …एक तो ऐसी उपलब्धि बता दें , जिस पर बिलासपुरिहा आदमी सीना तानकर गर्व कर सके।  शहर का कोई रिक्शा वाला भी बता देगा कि – जो शहर को “स्मार्ट” बनाने चले हैं, वे करना क्या चाह रहे हैं-यह किसी को भी आज तक  पता नहीं चल पाया । एक तो शहर में ढंग का कोई काम शुरू नहीं हो पाता। शुरू होता भी है तो बरसों तक अधूरे ढांचे की शक्ल में आँखों को चुभता रहता है। अगर किसी तरह बन भी जाता है तो घटिया निर्माण की वजह से उसका इस्तेमाल नहीं हो पाता। अरपा पर बना तुरकाडीह पुल इसका “विशालकाय” उदाहरण है। रोजमर्रा की जिंदगी में दाल-भात,रोटी-सब्जी के हिसाब में मशगूल आम आदमी भी अच्छी तरह से समझता है कि भ्रष्टाचार का खेल किस हिसाब से चल रहा है। सीधा-सपाट तरीका है- काम की रफ्तार धीमी करो – उसकी लागत बढ़ाओ और फिर अपने-अपने हिस्से का भी “दाम” बढ़ा लो….। विकास के इस अर्थशास्त्र पर बहुत अधिक रिसर्च किए बिना भी कई ठो थिसिस लिखी जा सकती है।

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                 ताजा उदाहरण तो और भी भयावह है। जिसमें हाई कोर्ट परिसर में बन रही इमारत की छत ढलाई के दौरान ही भसक गई। इस हादसे को देखकर जेहन में यह सवाल भी उठता है कि धीरे-धीरे आगे बढ़ रहे इस शहर में कितनी कॉलोनियां बन रही हैं और लोग अपने खुद के मकान भी बना रहे हैं। अपने सीमित संसाघन से छत की ढलाई कर रहे लोग अगर ऐसी चूक करते जाएं जब तो हर हफ्ते या पखवाड़े में न सही महीने में एकाध ऐसी घटना तो जरूर सामने आती। लेकिन सरकारी कामों के लिए क्या इतने भी संसाधन नहीं हैं कि छत ढलाई के पहले ही भसक जाए और मजदूरों का परिवार ही उजाड़ दे। ऐसे हादसे को इंसानी चूक का नतीजा बताकर परदेदारी की कोशिश हो सकती है। लेकिन तुरकाडीह पुल, सीवरेज, ऑडिटोरियम, कम्पोजिट बिल्डिंग जैसी मिसाल सामने रखककर सोचो तो छत धसकने की घटना को भ्रष्टाचार का एक नमूना ही कहा जा सकता है।

                 जिन्हे इस जुर्म के लिए “जेल” में होना चाहिए , वे जाँच-पड़ताल, फाइल-सबूत- सुनवाई के खेल में भी “छत-सेंटरिंग” भसका लेने में माहिर हैं और वे अपने मंसूबे में फिर कामयाब हो जाएंगे।फिर क्या….. ?  पिछली कहानियों की तरह घोटाले का यह किस्सा भी लोगों के दिलो-दिमाग के मेमोरी कार्ड से डिलीट हो जाएगा….। इसके पीछे कौन लोग हैं ? किसे-किसका और क्यों संरक्षण प्राप्त है  ?  यह सब जानकर भी सब अनजान बने हुए हैं। “पब्लिक चाहे बर्बाद हो- हमारा घर आबाद हो “,  इस ध्येय वाक्य को सर माथे पर रखकर काम कर रहे लोग पाक-साफ हैं और आगे भी बने रहेंगे। लेकिनन इसका खामियाजा शहर की मौजूदा पीढ़ी भुगत रही है और आने वाली पीढ़ी भी इसे भुगतेगी ही। हम आज की व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों की पूजा-अर्चना कर उन्हे माफ कर दे। मगर आने वाली पीढ़ी हमें माफ करेगी क्या ?  इस सवाल का जवाब जानते हुए भी यदि शहर “खामोश” रहकर सब कुछ देखता-सुनता और सहता रहे तो सरकारी भ्रष्टाचार की नुमाइश के साथ ऐसे मीना बाजार शहर में आगे भी लगते रहेंगे…..। और हम अच्छे-आदर्श दर्शक की माफिक ताली ही पीटते रह जाएँगे……।

 

Comments

  1. By Kamal Dubey

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  2. By पं. वैभव बेमेतरिहा

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  3. By Alok

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  4. By Anil soni

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