GROUND REPORT-आख़िर कांग्रेस से क्यों नाराज़ थे छत्तीसगढ़ के किसान….?  बैंकों के सामने की यह लाइन नई सरकार के लिए भी है एक सबक

Chief Editor
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GROUND REPORT:छत्तीसगढ़ के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस बुरी तरह से हार गई। 5 साल पहले भारी बहुमत के साथ सरकार बनाने वाली पार्टी की यह हालत क्यों हुई…. ? यह सवाल अब भी सियासी फिजा में घुमड़ रहा है। जाहिर सी बात है कि इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं। लेकिन एक वजह यह भी समझ में आती है कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल में किसानों की बेहतरी के लिए किए जा रहे कामों का खूब प्रचार प्रसार हुआ था। लेकिन दूसरी तरफ छोटे-छोटे कामों को लेकर किसानों को किस तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है इस पर किसी ने गौर नहीं किया। इन दिनों इलाके के किसी भी कोऑपरेटिव बैंक की ब्रांच में देखा जा सकता है। जहां कभी धान के भुगतान या केवाईसी के नाम पर अपना काम – धाम छोड़कर किसान दिन – दिन भर लाइन में लगते हैं। किसानों की यह हालत देखकर समझ जा सकता है कि उन्हें धान का दाम तो पहले से अधिक मिला है ….। लेकिन उनकी दूसरी सहूलियतों को लेकर किसी ने कभी चिंता नहीं की। यह भी कांग्रेस की हार का एक बड़ा कारण हो सकता है। इस लिहाज़ से नई सरकार के लिए भी एक बड़ा सबक हो सकता है।

2018 के चुनाव में जब कांग्रेस भारी बहुमत से जीतकर आई, तो सभी इस बात पर सहमत थे कि किसानों की कर्ज माफ़ी और 2500 रुपए प्रति क्विंटल के हिसाब से धान खरीदी का असर हुआ है। इसके बाद सरकार की ओर से लगातार किसानों की बात की जाती रही। किसानों से जुड़े मुद्दे की चर्चा भी रही। यह सिलसिला 2023 विधानसभा चुनाव के आते तक चला। जब तक बीजेपी की ओर से धान की कीमत के मुद्दे पर कोई बात नहीं रखी गई थी, तब तक मामला कांग्रेस की तरफ झुका हुआ दिखाई दे रहा था। लेकिन जैसे ही बीजेपी ने अपने घोषणा पत्र में 3100 रुपए प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदने, प्रति एकड़ 21 क्विंटल धान खरीदी और धान का पैसा एक मुफ्त देने की बात की। साथ ही 2 साल के बकाया बोनस का वादा कर दिया। तो इसके साथ ही धान और किसान के मुद्दे पर बैलेंस बन गया। इसके बाद किसानों ने हिसाब लगाना शुरू किया कि कांग्रेस और भाजपा में किसका घोषणा पत्र अधिक फायदेमंद नजर आ रहा है। जानकार बताते हैं कि किसानों के गणित के हिसाब से बीजेपी की घोषणाएं अधिक फायदेमंद नजर आई। लिहाजा किसानों ने बीजेपी पर भरोसा जताया।

यह तो हुई धान की कीमत और किसानों के फायदे की बात…..। लेकिन किसानों की दूसरी सुविधाओं – समस्याओं पर गौर करें तो लगता है कि  धान का सही दाम मिलने से किसान खुश जरूर नजर आ रहे थे । लेकिन कोई विकल्प नहीं होने की वजह से दूसरी समस्याओं का जिक्र खुले तौर पर नहीं हो रहा था। इन दिनों छत्तीसगढ़ की सरकारी समितियां में धान की खरीदी हो रही है । धान की खरीदी के बाद  उसका पैसा जिला सहकारी बैंक में किसानों के खाते में जमा होता है। इस बैंक में एटीएम जैसी सुविधा अभी लोकप्रिय नहीं है। लिहाजा किसानों को भुगतान लेने के लिए बैंक जाना होता है। जहां से उन्हें नगद रुपया मिलता है। इन दिनों किसी भी कोऑपरेटिव बैंक के सामने पहुंचकर इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। छोटे से कमरे में लगने वाल बैंक के सामने किसानों की भीड़ नजर आती है। किसानों को केवाईसी करने कहा गया है। लिहाजा वे अपने आधार कार्ड और दूसरे दस्तावेजों के साथ बैंक पहुंचते हैं …..।लाइन में लगते हैं और अपनी बारी का इंतजार करते हैं । लोगों ने बताया कि किसानों को कई बार अपना काम छोड़कर पूरे दिन लाइन में लगे रहना पड़ता है। इसके बाद भी कभी-कभी छोटी-मोटी औपचारिकताओं के लिए उन्हें फिर वापस लौटना पड़ता है। किसान  किस तरह धक्का – मुक्की करते हुए अपना यह काम पूरा कर पाते हैं, इसकी चिंता किसी को नहीं है। लोगों ने यह भी बताया कि इस तरह की स्थिति पिछले कई वर्षों से बनी हुई है। कांग्रेस सरकार के दौरान जो व्यवस्था थी, उसमें किसानों को धान बेचने पर प्रति क्विंटल समर्थन मूल्य की राशि पहले बैंक खाते में जमा होती थी। इसके बाद अंतर की राशि चार अलग-अलग किस्तों में बोनस के रूप में जमा की जाती थी। हर बार उन्हें रुपया लेने के लिए इसी तरह मशक्कत करनी पड़ती थी। लोग तो दबी जुबान से यह बात भी करते हैं कि काउंटर पर उन्हें बोनस का पैसा इस तरह दिया जाता था जैसे यह कोई उपहार हो….। हालांकि इसके लिए उन्हें काफी मेहनत भी करनी पड़ती थी और कई बार भेंट – चढ़ावा भी देना पड़ता था। कांग्रेस सरकार के समय जिन लोगों को बड़े –बड़े पदों पर बिठाया गय़ा था , शायद उन्होने भी कभी इस हक़ीकत को समझने की कोशिश नहीं की ।

यह बात भी देखी जा सकती है कि जो कोऑपरेटिव बैंक पूरी तरह से किसानों के दम पर ही चलता है । वहां का प्रबंधन भी किसानों की दिक्कतों पर कभी गौर नहीं करता। इसी तरह राजस्व विभाग में भी गिरदावरी और रकबा को लेकर भी राजस्व विभाग में किसानों को काफी चक्कर काटना पड़ता है। जहा लेन-देन इस तरह प्रचलन में है कि लोग उसका ज़िक्र भी कम करने लगे हैं। किसानों से बात करें तो यह बात भी सामने आती है कि कांग्रेस शासन के दौरान धान की कीमत और बोनस को लेकर काफी हल्ला था  ।लेकिन छोटी-छोटी समस्याएं बरकरार थी ।क्योंकि किसानों के पास कोई और विकल्प नहीं था ।लिहाजा लोग इस इस पर खुलकर बात नहीं करते थे  । लेकिन बदले हुए माहौल में अब पिछली सरकार के कार्यकाल में किसानों को हुई दूसरी परेशानियों की बात भी उठने लगी है।ऐसे में कोऑपरेटिव बैंक की किसी भी ब्रांच के सामने खड़े होकर यह अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि किसानों की नाराज़गी किस तरह कांग्रेस की हार का सबब बनी होगी….?

लोग उम्मीद कर रहे हैं की नई सरकार आने आने के बाद किसानों की इन पर इन समस्याओं पर भी नजर पड़ेगी। अगर किसानों के लिए बैंक में सुविधा बढ़ जाएं तो इससे बेहतर और कुछ नहीं हो सकेगा। इस मामले में सरकार में बैठे लोग यह सबक भी ले सकते हैं कि किसानों को खुश करने के लिए केवल प्रचार – प्रसार नहीं बल्कि ऐसा इंतज़ाम ज़रूरी है , जिससे धान बेचने के बाद बैंक में उन्हे बिना किसी परेशानी के अपना पैसा मिल सके …..।

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