प्रशासनिक सेवा में रहकर जो कह नहीं पाता..उसे कविताओं में कह देता हूं..डॉ.चतुर्वेदी ने कहा.. कविताएं भारत की महान परंपराओं में शामिल

फाइल फोटो…..
बिलासपुर— जो बात सीधे कहते नहीं बनता, कविताओं में उतार देता हूं। प्रशासनिक सेवा में रहते हुए जो बातें कहना संभव नहीं होता है..उन्हें कविताओं के माध्यम से कहने की कोशिश करतेा हूं। यह बातें राजनांदगांव नगर निगम कमिश्नर आशुतोष चतुर्वेदी ने विचार मंच की 138 वीं गोष्ठी में कही।
     
                   विचार मंच की 138वीं गोष्ठी में अपनी कविताओं के साथ उपस्थित हुए राज्य प्रशासनिक सेवा के अधिकारी डॉ. आशुतोष चतुर्वेदी ने कहा कि जो बातें उन्हें अपने दायित्वों और अनुशासन के कारण सीधे-सीधे कहना संभव नहीं होता उन्हें कविताओं के माध्यम से कागज पर उतार देते हैं।
 
                       राष्ट्रीय पाठशाला के सभागार में आयोजित कार्यक्रम के अतिथि डॉ. चतुर्वेदी ने कविताओं के उद्भव पर अपने विचार रखे। उन्होंने अनेक उदाहरणों से बताया कि आदिकाल से होते हुए पौराणिक काल, भक्ति काल तक फिर आधुनिक काल तक भावों की अभिव्यक्ति का कविता सशक्त माध्यम रहा है। आदिकाल से अब तक छंद, लय का कविताओं का महत्व कम से कम भारत की प्राचीन भाषाओं व हिंदी में रहा है।
 
             आदि काल में राजा की प्रशंसा में वीर रस लिखे जाते थे। रीतिकाल में श्रृंगार रस की प्रधानता थी। एक अंग्रेजी साहित्यकार की चर्चा करते हुए चतुर्वेदी ने कहा कि रीति काल के महाकवि बिहारी की बिहारी सतसई अमर रचनाओं में से एक है। पाश्चात्य की सभी श्रृंगार रस की रचनायें एक ओर हैं। तो दूसरी तरफ बिहारी सतसई है।
 
              वह भी समय आया कि जब विद्वानों ने गूढ़ महाकाव्य लिखे, जिन तक आम लोगों की पहुंच नहीं थी। विद्वानों के माध्यम से आम जन ईश्वर तक पहुंचने का मार्ग ढूंढा करते थे। तब तुलसीदास, रसखान, मीराबाई, कबीर जैसे कवियों ने अपनी रचनाओं के माध्यम से प्रतिपादित किया कि ईश्वर तक पहुंचने के लिये किसी मध्यस्थ की आवश्यकता नहीं है। भक्त और भगवान का सीधा रिश्ता उन्होंने अपने काव्य के माध्यम से जोड़ना सिखाया। उनके ईश्वर निर्गुण व सगुण दोनों ही रूप में थे। 
 
               चतुर्वेदी ने बताया कि आधुनिक युग के प्रारंभिक काल में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने देश की दयनीय दशा पर चिंतन करते हुए भारत दुर्दशा जैसे काव्य के माध्यम से भारत के जनमानस को आंदोलित किया। वही धारा आज विकसित अवस्था में है। 
 
                    इस दौरान डॉ. चतुर्वेदी ने अपनी चुंनिदा काव्य रचनाओं का पाठ किया। उनकी रचनाओं में आम आदमी की पीड़ा की गहराई तक अभिव्यक्ति देखने को मिली। चतुर्वेदी की रचनाओं ने  श्रोताओं को अन्तर तक प्रभावित किया। उनकी रचनायें विपरीत परिस्थितियों का मुकाबला करने के लिये प्रेरित करने वाली रही।
 
                डॉ. चुतर्वेदी ने बड़ी सहजता के साथ उर्दू लफ्जों का बेबाकी और सहजता से प्रयोग किया। इसके पूर्व कार्यक्रम के प्रारंभ में साहित्यकार संजय पांडे ने भावों की अभिव्यक्ति का विकास किस प्रकार हुआ पर वक्तव्य दिया। उन्होंने कहा कि भावों को संकेत के माध्यम से भी व्यक्त किया जा सकता है। लेकिन उसका कोई व्याकरण नहीं होता। यह गद्य या पद्य के रूप में ही प्रगट होती है। अभिव्यक्ति की एक और विधा चंपू काव्य भी है। भावों के विपरीत भाव भी समानांतर उपस्थित होते हैं।
 
               उन्होंने कहा कि किसी व्यक्ति के मन में उठने वाले भावों को जब अनुकूलता मिलती है तो वह पद्य या गद्य रूप में प्रगट होता है। कार्यक्रम के संयोजक द्वारिका प्रसाद अग्रवाल ने श्रोताओं का स्वागत करते हुए कहा कि साहित्यिक विषयों पर बड़ी संख्या में आपकी उपस्थिति से उन्हें प्रसन्नता हो रही है। विचार मंच 1992 से विभिन्न विषयों पर इसी तरह की रचनात्मक गोष्ठियां आयोजित कर रहा है। अग्रवाल ने अपनी यात्रा संस्मरण पर आधारित अपनी नई किताब अतिथि डॉ. आशुतोष चतुर्वेदी को भेंट की।
 
कार्यक्रम में जफरअली, रमेश दुबे, जगदीश दुआ, राजेश अग्रवाल, राजेश दुआ, विश्वनाथ दुबे, डा. सोमनाथ यादव, महेश पाण्डेय, महेश श्रीवास, संजय पाण्डेय, बीपी राय, कैलाश अग्रवाल सहित बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

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