जब नन्ही बच्ची ने कहा..पापा के बिना जीवन खाली..रो दिया चाचा..पढ़ें.. कोरोना को लेकर बच्ची की मार्मिक कहानी…

बिलासपुर— रत्नों में रूबी का अपना अलग महत्व है। माना जाता है कि रूबी रखने वाला धन एश्वर्य का मालिक होता है। रूबी के फैसले से चाचा हेमंत कुमार अग्रहरी को भी अहसास हुआ कि वह भी असीम सम्पदा का मालिक हैं। सीपत निवासी संतोष अग्रहरी की मौत 2016 में कैंसर हुई थी।  अपने पीछे  बेटी रूबी और बेटा ऋषभ की जिम्मेदारी छोटे भाई हेमंत के कंधे पर देकर गया। आज उसी रूबी ने ऐसा कुछ कर दिखाया। जिसे लेकर आज सीपत ही नहीं बल्कि पूुरा बिलासपुर गर्व महसूस करेगा।
 
              रूबी अग्रहरी ने दानादाताओ को सोचने पर मजबूर किया है। साथ ही हेमन्त अग्रहरी को भी सोचने को मजबूर किया है। बड़े भाई को खोने के बाद रूबी को एक पल के लिए भी अपने नजरों से दूर नहीं किया। लेकिन वह अपने पिता संतोष को आज तक नहीं भूली है। मंगलवार की रात्रि रूबी ने अपने छोटे चाचा हेमन्त अग्रहरी से कहा कि वह भी मुख्यमंत्री राहत कोष में कोरोना पीड़ितों के लिए दान देगी। वह नही चाहती कि किसी के पापा अपने बच्चों को छोड़कर भगवान पास  जाए। क्योंकि पापा के नहीं होने का दर्द वह अच्छी तरह से समझती है।
 
 पापा के बिना जीवन खाली
 
                   सीपत क्षेत्र निवासी 13 साल की रूबी ने मंगलवार की रात्रि अपने छोटे चाचा हेमन्त कुमार अग्रहरी से जो कहा..उससे उनका दिल भर आया। कक्षा आठवी की छात्रा रूबी ने पहले तो अपने चाचा से कोरोना की जानकारी ली। कुछ घंटे सोचने के बाद रूबी और छोटे भाई ऋषभ ने कहा कि वह भी कोरोना पीड़ितों को दान देना चाहती है। रूबी ने चाचा को बताया कि वह और उसका भाई ऋषभ एक, पांच और दस रूपए के सिक्के को गुल्लक में संजोकर रखा है। वह चाहती है कि कोरोना पीड़ितों के लिए गुल्लक की सारी राशि दान में दी जाए। इस दौरान चाचा ने समझाने का बहुत प्रयास किया कि वह अलग से रूपए दान कर देगा। लेकिन रूबी नहीं मानी.और ऋषभ भी अपने निर्णय पर अडिग रहा। हेमन्त उस समय कांप गया जब रूबी ने रूआंसी होकर कहा कि वह नहीं चाहती कि अब किसी के मम्मी या पापा अपने बच्चों को छोड़कर भगवान के घर जाए। क्योंकि मैने पापा को भगवान के घर जाते देखा है। उसकी पीड़ा आज भी महसूस करती हू। क्योंकि बिना पापा के जीवन खाली खाली लगता है।
 
पापा आज भी याद..कहा आप जैसे चाचा सबको मिले
         
                 रूबी की बातें सुनते ही हेमन्त अग्रहरी अपना आंसू नहीं रोक पाए। उन्होने जानने का प्रयास भी किया कि आखिर उसे किसी ने तकलीप दिया है। जवाब में रूबी ने कहा कि चाचा आप जैसा सबको चाचा मिले। लेकिन मै नहीं चाहती कि अब कोई किसी रूबी और ऋषभ को कोई पिता छोड़कर भगवान के घर जाए। 
      
                  हेमन्त ने बताया कि रूबी की जिद के सामने झुकना पड़ा। मंगलवार की देर रात्रि रूबी और उसके भाई ने गुल्लक फोड़वाया। करीब घंटे तक गिनने के बाद गुल्लक से पांच दस और एक रूपए को मिलाकर कुल 11 सौ 12 रूपए निकले। हेमन्त ने मामले की जानकारी स्थानीय पत्रकार को दी। स्थानीय पत्रकार ने सारा किस्सा सीपत तहसीलदार संध्या नामदेव को सुनाया। संध्या नामदेव ने कहा वह खुद घर पहुंचकर रूबी के दान को लेकर मुख्यमंत्री राहत कोष में डालेगी। 
 
नन्ही बच्ची ने दिया 11 सौ रूपए का दान
               
                        दूसरे दिन तहसीलदार संध्या नामदेव रूबी के घर पहुंचती। इसके पहले ही रूबी और ऋषभ अपने छोटे चाचा के साथ तहसील कार्यालय पहुंचेए। रूबी ने 2 साल की कमाई को संध्या नामदेव को सौंप दिया। पूछने पर रूबी ने फिर बताया कि मैं नहीं जानती कि ना जाने कौन सी बीमारी ने उसके पापा को छीन लिया। शायद कोरोना जैसी ही कोई बीमारी होगी। अब नहीं चाहती की किसी के पापा की मौत हो। इसलिए मैने भी राहत कोष में लोगों की सहायता के लिए गुल्लक में जमा रूपयों को राहत कोष में डालने का फैसला किया है।
 
 तहसीलदार को  जवाब..बड़े होकर…..
       
                    वहीं अपनी भतीजी पर गर्व करते हुए चाचा हेमन्त ने कहा कि मुझे अपनी बेटी रूबी पर नाज है। रूबी कक्षा आठवी की छात्रा है। उसने और उसके भाई ने जेब खर्च का सारा रूपया गुल्लक में जमा किया। वह किसी को गुल्लक छूने भी नहीं देती थी। लेकिन जब उसे जानकारी मिली कि कोरोना से मौत होती है। लोगों को बचाने के लिए सरकार लोगों से सहयोग मांग रही है। इतना सुनते ही उसने थोड़ी भी देर किए बिना गुल्लक तोड़ने का फैसला कर लिया। हेमन्त ने बताया कि रूबी के पिता यानि उसके बड़े भाई की साल 2016 में कैंसर से मौत हो गयी थी। आज भी रूबी अपने पापा को याद करती है। 
 
               रूबी ने तहसीलदार संध्या नामदेव को बताया कि भविष्य में वह क्या बनेगी..फिलहाल वह नहीं जानती है। लेकिन बड़े होकर देश के एक एक पीड़ितों की आंसू पोछना चाहती है। भगवान इतनी शक्ति देना कि मैं लोगों के सहयोग के काबिल बन सकूं।
 
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