यही है,बिलासपुर…(एक)

साफगोई और सीधे सपाट लहजे में अपनी बात रखने वाले द्वारिका प्रसाद अग्रवाल खूब लिख रहे हैं और अच्छा लिख रहे हैं..। जिस सोशल मीडिया को लोग “कट-पेस्ट का हुनर” पेश करने वाली दीवार मानते हैं, वहां अपनी मौलिकता की वजह से द्वारिका जी ने अपनी अलग पहचान बनाई है..।शहर और शहर की जीवंतता का अहसास उनकी कलम की खासियत तो है ह, वे शब्दों को कुछ इस ढंग से पिरोते हैं कि पढ़ने वाला जिंदा शब्दों के साथ गलबहिंयां डालकर  सच के इतना करीब पहुंच जाता है कि कोई उसे अपने हाथों से छूकर महसूस भी कर ले..।बिलासपुर शहर पर उनकी एक ऐसी ही रचना “मंतव्य” पत्रिका में छपी है। जिसे हम यहां पर साभार किस्तों में पेश कर रहे हैं..।पेश है पहली किस्त –

                                  द्वारिका प्रसाद अग्रवाल का लिखा… dwarika

 

 

 

                     dpa1जहां लोग बसते हैं, वहाँ बस्तियाँ बस जाती हैं। आम तौर पर बस्तियाँ वहाँ रूप लेती हैं जहां पानी उपलब्ध होता है। खोड्री के पहाड़ से निकली एक बरसाती नदी अरपा अपने आसपास मनुष्यों की आबादी को निमंत्रित करती हुई बहती रही और उसके पावन जल के आसरे लोग सदियों से जीते आ रहे हैं। उद्गम से लगभग 80 किलोमीटर दूर अरपा नदी का पाट बहुत चौड़ा हो जाता है, वहां उसके दोनों छोर पर लोग अपने घर बनाकर बस गए जिसे अब सब बिलासपुर कहते हैं।

                              dpa2कहते हैं, बिलासा नाम की मछुआरिन के नाम पर इस बस्ती का नामकरण हुआ। इस बात का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है, मिथक जैसा लगता है लेकिन दिल को खुशी देता है कि उस जमाने में किसी स्त्री को ऐसा सौभाग्य मिला। अरपा नदी के किनारे बसी यह छोटी सी बस्ती दिनों-दिन पसरती जा रही है, किसी दानव की मानिंद अपने अगल-बगल की उपजाऊ जमीन को लीलते हुए क्रांकीट के मकानों की शक्ल ले रही है। धान की उपज देने वाले खेत अब धन उगल रहे हैं। बिलासपुर में वे लोग अब नहीं रहते जो रहते थे, होते थे; अब इस शहर में ऐसे लोग रहते हैं जो न होने के बराबर हैं। हर इन्सान अकेला रहता है, अपने घर में भी अकेला रहता है। पहले ऐसा न था, सब एक साथ रहते थे, पूरी बस्ती किसी अविभाजित संयुक्त परिवार की तरह एक-दूसरे से हिल-मिल कर रहती थी।

-:यह है जूना बिलासपुर :-

                     dpa5छत्तीसगढ़ी भाषा में ‘जूना’ का अर्थ है, पुराना।जानकार लोगों का अनुमान है कि सबसे पुरानी बस्ती अरपा नदी के किनारे पचरीघाट के आसपास बसी होगी जिसका विस्तृत क्षेत्र जूनाबिलासपुर कहलाता है। यहाँ सभी जाति और व्यवसाय के लोग रहते हैं, पुरानी शैली के घर हैं, पतली गलियां हैं और पुराना रहन-सहन भी। किसी जमाने में यहाँ घरेलू वस्तुओं के कुटीर उद्योग थे। आवागमन के साधन नहीं थे इस कारण सब लोग स्थानीय उत्पादन पर आश्रित थे। कोष्टापारा में कपड़े बुने जाते थे, कुम्हारपारा में मिट्टी के बर्तन बनते थे। तेलीपारा में घानी की मदद से तेल निकाला जाता था, काछीपारा में सब्जी उगाई जाती थी। पारा का अर्थ है मोहल्ला जो बांग्ला भाषा के ‘पाड़ा’ से प्रभावित लगता है। dpa3घसियापारा, डबरीपारा, जबड़ापारा, चाटापारा, मगरपारा, इमलीपारा, तालापारा, लोधीपारा, ईरानीपारा, केवटपारा, नाऊपारा, गोंडपारा, बंगालीपारा, बरछापारा, कतियापारा, ब्राह्मणपारा, टिकरापारा, तारबाहर, शनीचरी पड़ाव आदि पुराने मोहल्लों के नाम वहाँ के व्यापार, रोजगार या समूह के आधार पर रखे गए समझ आते हैं। तोरवा, कर्बला, सरकंडा, चाटीडीह, दयालबंद, मसानगंज, खपरगंज, जूनीलाईन, कुदूदंड, जरहाभाटा आदि अनेक प्राचीन मोहल्ले हैं लेकिन इनके नाम के गुणसूत्र का पता नहीं है, ये मोहल्ले अब भी बड़ी शान से कायम हैं।

                            dpa4बिलासपुर सन 1861 के पूर्व छत्तीसगढ़ आठ तहसीलों और जमींदारियों के रूप में रायपुर से प्रशासित होता था। सन 1861 में किये गए प्रशासनिक परिवर्तन के फलस्वरूप बिलासपुर को एक नए जिले का रूप दिया गया। वर्तमान सिटी कोतवाली में बंदोबस्त अधिकारी का कार्यालय बनाया गया। गोलबाजार उस समय जिला कचहरी था। कंपनी गार्डन उन दिनों ईस्ट इण्डिया कंपनी की गारद (परेड) के लिए उपयोग में लाया जाता था। सन 1919 में मोंटेग्यू-चेम्सफोर्ड सुधार के फलस्वरूप एक नया प्रदेश अस्तित्व में आया जिसे सेन्ट्रल प्रोविंस का नाम दिया गया। इसमें वर्तमान महाराष्ट्र के चार जिले, महाकोशल के अठारह जिले और साथ में छत्तीसगढ़ को भी जोड़ा गया।

(जारी है )

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