‘लोकतंत्र’ खतरे में है

न कोई प्रजा है
 न कोई तंत्र है
   यह आदमी के खिलाफ़
    आदमी का खुला सा
   षड़यन्त्र है ।  [धूमिल]
caption_spp(सत्यप्रकाश पाण्डेय)प्रख्यात कवि सुदामा प्रसाद पांडेय ‘धूमिल’ की इन पंक्तियों को पढ़कर अपने सूबे के हालात पर जब सोचने बैठता हूँ तो लगता है ‘धूमिल’ कितने दिव्यदर्शी थे। लोकतंत्र की लाचारी, उसके बदन को नोचने वालों की मक्कारी पर ‘सुदामा’ दशकों पहले लिख गए ये आज कह रहें हैं…’लोकतंत्र’ खतरे में है। ‘लोकतंत्र’ की चिंता को माथे की मक्कार लकीरों  में शामिल कर गाल बजाने वाले दिन ढलते ही ‘लोक-तंत्र’ की बेबसी पर खूब ठहाके लगाते हैं। देश के ‘लोकतंत्र’ पर ख़तरा मंडरा रहा है। विपक्ष [कांग्रेस] की माने तो अब वक्त आ गया है ‘लोकतंत्र’ की सुरक्षा का। ‘लोकतंत्र’ को खतरा सरकार से है या विपक्ष [कांग्रेस] ने खतरनाक मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है चिन्तन का विषय है। जरूरत है सत्ता और विपक्ष पहले लोकतंत्र की परिभाषा समझे, केवल सियासी आंच पर रोटी सेकना और वोट बटोरना ही लोकतंत्र नहीं है।
                                      देश के अन्य राज्यों को छोड़ मैं अपने प्रदेश के लोकतंत्र की सूरत को गौर से जब निहारता हूँ तो लगता हैं जैसे उसे अपने चेहरे से घिन्न आ रही हो। मेरे सूबे में सब ठीक-ठाक हो ऐसा नहीं है, फिर भी विपक्ष मौन रहा ! अब अचानक देश भर में लोकतंत्र को बचाने का ख्याल विपक्ष [कांग्रेस] की माताश्री को आया। उनके फरमान के बाद सूबे में विपक्ष जागृत होने का अभिनय करता दिखा। सरकार पर आरोपों के शब्दभेदी बाण चलाये गए, सरकार का सीना कितना छलनी हुआ ? जवाब परेशान लोकतंत्र को टटोलने पर मिल जाएगा। पिछले 13 साल से विपक्ष की कुर्सी पर बैठने का दंश झेल रही कांग्रेस अपने गिरेबां को झांकना ही भूल गई।
                                  Loktantra..votetantra...राज्य में अराजकता की जड़ें गहराई तक पैठ बना चुकी हैं। ह्त्या,लूट,बलात्कार जैसे संगीन अपराध बढ़ते चले गए। घोटालों पर घोटाले, बेलगाम नौकरशाह।  लाल आतंक के अनगिनत क्रूरतम कारनामें। अकाल से जूझते किसानों की घुटन भरी जिंदगी … ये सब कुछ तो है पर सरकार नहीं मानती। वो सत्ता मिलने की तारीख से राज्य को ‘विश्वसनीयता’ की चादर से ढांककर रखे हुए है। सरकार का दावा है देश में जो 68 साल की आजादी के बाद नहीं हुआ वो अब हो रहा है। खासकर छत्तीसगढ़ जैसा गरीब और बीमारू राज्य जहां करोड़ों रुपये की आय सिर्फ शराब बेचकर सरकार कमाती है। विकास की बहती गंगा में सत्तासीन और नौकरशाहों के चेहरें 16 साल में ही लाल हो गए। ईमानदारी के मुखौटों से ढके चेहरों ने विकास की लक्ष्मी को चोर जेब के जरिये सुरक्षित ठिकानों तक पहुंचा दिया। कइयों चेहरें राजनीति की बिसात पर पिटे भी। काली कमाई के करोड़ों रुपये सरकारी खजानों तक पहुंचे ऐसे में सत्ता और विपक्ष के माथे पर चिंता की लकीरों का ना नज़र आना ‘लोकतंत्र’ का मजाक ही तो है।
                                     आज लोकतंत्र को बचाने का ख्याल विपक्ष को सिर्फ इसलिए आया क्यूंकि मैडम सोनिया जी को सपनें में ‘कुर्सी’ देव प्रगट होकर बोले सत्ता पाने के लिए कुछ न कुछ करते रहिये वर्ना विपक्ष की कुर्सी भी खिसकने में देर नहीं लगेगी।  देश के अन्य राज्यों का नहीं पता मगर छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के फटे ढोल को बजाने की कसरत सत्ता पक्ष के लिए राहत देने वाली है। पिछले 13 साल में विपक्ष की भूमिका का पता खोजने निकलें तो मालूम पडेगा सियासत की देहरी में वो गूंगे की तरह बैठी है। जब-जब सरकार को जनहित के मुद्दे पर घेरने का मौक़ा मिला तब-तब औपचारिक शोर-शराबे के बाद ख़ामोशी नज़र आई। यहां झीरम घाटी में नरसंहार हुआ, आये दिन सुरक्षा में तैनात जवानों के खून से होली खेली जाती है तब लोकतंत्र की सुरक्षा का ख्याल कहाँ था ?  विपक्ष को टेप काण्ड जैसा बड़ा मुद्दा हाल ही में हाथ लगा लेकिन सरकार और उनके दामाद को घेरना छोड़ विपक्ष आपस में भिड़ गया।
                                आपसी कटुता ने अंदरूनी लड़ाई को सड़क पर ला खड़ा किया। अब विपक्ष सत्ता के खिलाफ कम व्यक्ति विशेष में बटे अपनों के खिलाफ ही बयानबाजी करता है। ये कई धड़ों में बटे हैं। जोगी खेमा संगठन को ताक पर रखता है, संगठन और विपक्ष के दूसरे खेमें की नूरा-कुश्ती जोगी परिवार से चल रही है। यकीन मानिए सरकार की परेशानियों को कांग्रेसियों ने अपने अलग-अलग गुटों में बाँट लिया है ऐसे में ‘लोकतंत्र’ की सुरक्षा का शोर महज बेमानी लगता है। सरकार के साथ साथ लोकतंत्र की सुरक्षा और उसके हालात पर विपक्ष को भी चिंता करनी होती है मगर बुरे दिनों में भी विपक्ष केवल अपनी जड़ों को खोदने में लगा है।
                             प्रदेश में लोकतंत्र एक ऐसे मकड़जाल की तरह है जिसके केंद्र बिंदु में एक बड़ी सी मकड़ी [सफेदपोश] बैठकर जनता रूपी कीड़े फांकती है और उसका खून चूसकर उसके मुर्दा शरीर को हवा में उड़ा देती है। ये मकड़ी पक्ष की हो या विपक्ष की दोनों का धर्म समान ही है। ऐसे में मशहूर कवि ‘अजय पाठक’ की ये चन्द लाइने आज के परिपेक्ष्य में याद आती हैं ।  कवि कहता है
                                                            ” लोकतंत्र का कीड़ा उलझा है,
                                                                 मकड़ी के जाल में
                                                          दौड़ लगाती चलीं मकड़ियां 
                                                              अपना हिस्सा पाने 
                                                         अंदर विष है, और होंठ पर 
                                                          जन-गण-मन के गाने 
                                                          तरह-तरह के जाले बुनती
                                                             दिल्ली में भोपाल में
                                                         लोकतंत्र का कीड़ा उलझा है,
                                                               मकड़ी के जाल में ”  
                                       यक़ीनन ये सच मेरे सूबे के लोकतंत्र का हिस्सा है।  जहां दिन में लोकतंत्र की ह्त्या पर मातम मनाया जाता है और रात होते ही कोई उसे नोचता है, कोई उसके साथ खेलता है तो कोई उसके साथ रात गुजारता है।

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