ये इत्तफाक की बात है…… राहुल बाबा

 

rahul chkbt 1                                ( रुद्र अवस्थी )

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गाँधी दो दिन छत्तीसगढ़ का दौरा कर वापस लौट गए। उनका इस अंदाज में यह पहला छत्तीसगढ़ दौरा था। अब तक वे चुनावी रैलियों या किसी एक कार्यक्रम में शिरकत करने आते रहे हैं। लेकिन छत्तीसगढ़ के लोगों से रू- ब- रू होने या यहां की सड़कों पर पैदल चलने शायद पहली दफा ही आए।इस दौरे का राजनैतिक प्रतिफल सामने आने में शायद कुछ समय लग सकता है।लेकिन इस दौरे के साथ – साथ चलती रही छत्तीसगढ़ कांग्रेस की उठापटक पर नजर गड़ाए लोगों ने यह अच्छी तरह से ताड़ लिया है कि इस दौरे को लेकर कांग्रेस के नेताओँ और खेमों में जो खींचतान दिखाई दी, उसका असर प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में अभी भी है और आने वाले दिनों में भी रहेगा।चूंकि कुछ कांग्रेसी ऐसी खींचतान को ही हर एक बड़ी घटना का प्रतिफल मानने पर विवश हैं।

राहुल गाँधी के दौरे की समीक्षा इस कोने से की जाए तो यह सवाल कोई पूछ सकता है कि – कांग्रेस में आपसी खींचतान कब नहीं रही ? इसका तो इतिहास रहा है। इस तरह की खींचतान से नए क्षत्रप तैयार करने में भी मदद मिलती रही है।इस तरह की दलीलों के साथ उठाए गए सवाल को सही मानकर यदि इस खींचतान को जायज ठहराते हुए इसे पार्टी की खूबी ही मान लें । तब तो राहुल गाँधी के दौरे की समीक्षा में कांग्रेस नेताओँ के बीच मची खींचतान का जिक्र तो और भी जरूरी नजर आता है।

बहरहाल पिछले कोई डेढ़ दशक से छत्तीसगढ़ में कांग्रेस की राजनीति पर नजर डालें तो नए राज्य के उदय के साथ ही इत्तफाक से प्रदेश में कांग्रेस की राजनीति- अजीत जोगी एक तरफ तो बाकी नेता एक तरफ – के काशन आर्डर में बंटी हुई है।पहले के लोग जानते हैंकि अविभाजित मध्यप्रदेश के जमाने में छत्तीसगढ़ में भी कांग्रेस गुटों में बटी रही है।तब यहां के नेता शुक्ल गुट या अर्जुन सिंह गुट के नाम से पहचाने जाते थे।लेकिन नए सूबे में सियासत की नई इबारत लिखते हुए अजीत जोगी ने प्रदेश में अपनी नई टीम तैयार कर ली।और इस मामले में उन्हे राजनीति का चतुर सुजान माना जा सकता है कि एक तरफ खुद औऱ दूसरी तरफ बाकी सभी को खड़े होने पर मजबूर कर दिया।इसे ही उनकी कामयाबी ही मान सकते हैं कि स्टेट पॉलिटिक्स में पिछले करीब डेढ़ दशक से कॉमन फेक्टर बने हुए हैं।अजीत जोगी ने प्रदेश सरकार की कमान संभालने के साथ ही कांग्रेस पार्टी को भी संभाल लेने की कोशिश में अपनी एक अलग टीम खड़ी कर ली। लेकिन अजीत जोगी की सियासत से इत्तफाक न रखने वालों की फेहरिश्त भी लम्बी होती गई। औऱ  इत्तफाक से खो – खो का यह खेल बदस्तूर जारी है।

यही खेल राहुल गाँधी के दौरे के समय भी  अलग- अलग जगह अलग- अलग इत्तफाक के साथ नजर आता रहा।कांग्रेसी हल्कों में चर्चा है कि अब पार्टी के अदर हालात बदलते हुए नजर आ रहे हैं।संगठन खेमे के नाम पर लामबंद नजर आने वाले नेता अब अजीत जोगी को घेरने में कामयाब होते दिख रहे हैं।राहुल गाँधी के दौरे में जिस तरह संगठन खेमे के नेताओँ को तरजीह दी गई , उसका भी यही मतलब निकाला जा रहा है।हालांकि इत्तफाक के साथ एक दलील यह भी है कि प्रदेश अध्यक्ष औऱ नेता प्रतिपक्ष से लेकर संगठन के ज्यादातर ओहदेदार संगठन खेमे से हैं। लिहाजा उन्हे मंच व्यवस्था से लेकर अलग- अलग- स्तर की जिम्मेदारी मिल गई। जाहिर तौर पर इसमें जोगी समर्थकों के उम्मीद के हिसाब मौका नहीं मिल सका।। जिसकी झलक छत्तीसगढ़ ( बिलासपुर- चकरभाठा हवाई पट्टी ) पर राहुल गाँधी के पाँव रखने से लेकर रायपुर हवाई अड्डे से उनकी वापसी उड़ान तक जगह- जगह मिलती रही।

हालांकि कांग्रेस के लोग इसे इत्तफाक ही करार दे सकते हैं कि राहुल गाँधी के दौरे की तैयारी के सिलसिले में जिस दिन भूपेश बघेल , डा. चरणदास महंत सहित कई और नेता जाँजगीर जिले पहुंचे थे। ठीक उसी दिन अजीत जोगी भी चांपा  इलाके पहुंचकर कार्यकर्ताओँ से मिल रहे थे। लेकिन इस इत्तफाक की वजह से ऐसा मैसेज गया कि दोनों खेमें यहां पर भी अलग- अलग रास्ते पर चल रहे हैं।जिस समय राहुल गाँधी चकरभाठा हवाई-पट्टी पर उतरे तब अजीत जोगी जिंदाबाद के नारे लगाने वालों को खामोश करना पड़ा।और उधर रतनपुर बाय-पास के पास समर्थकों के साथ स्वागत की तैयारी में खड़ी विधायक श्रीमती रेणु जोगी के सामने से राहुल के काफिले का बिना रुके आगे बढ़ जाना भी ऐसा ही इत्तफाक है।

मदनपुर में जो हो रहा था उससे भी इत्तफाक की कड़ी जुड़ती गई। जहां अजीत जोगी को खुद मोर्चा संभालना पड़ा।मंच पर रैम्प नहीं बनाने और मंच पर रहने वालों की लिस्ट में अपने कार्यकर्ताओँ का नाम नहीं होने से नाराज थे ही। मंच पर पहुंचने के बाद कार्यक्रम संचालन को लेकर भी एतराज जताया। जिसे लेकर भूपेश बघेल के साथ उनकी बातचीत भी अखबारों की सुर्खियां बन गईं। यह भी एक इत्तफाक है कि राहुल गाँधी भी इस मंच पर थे। और अगर मंच पर होने वाली गतिविधियों को वहां मौजूद हर शख्स महसूस कर लेता है, तब तो उन्हे भी सब चुछ समझ आ गया होगा।

खींचतान का यह संयोग डभरा में भी बना।जहां मंच व्यवस्था के नाम पर मौजूद लोगों को हटाना पड़ गया।इस खींचतान में एक बात और नजर आई कि संगठन के पदों औऱ नगरीय निकाय पंचायत के टिकट के समय जिस तरह जोगी खेमे को किनारे लगाने की कवायद चली। वौसे ही राहुल गाँधी के दौरे में भी चलता रहा।अलबत्ता इस बार खींचतान निचले स्तर के कार्यकर्ताओँ तक चली गई। और संगठन खेमे की दूसरी- तीसरी लाइन के जमीनी लोग भी निशाने पर आ गए । अब चर्चा इस बात की भी है कि अजीत जोगी तो अपने साथ वालों के लिए जूझने के नाम पर पहचाने जाते हैं। क्या संगठन खेमे के नेता भी अपने साथ वाले जमीनी कार्यकर्ताओँ के लिए वैसा ही जुझारूपन दिखाएंगे ?

इतना ही नहीं राहुल गाँधी के जाते- जाते यह इत्तफाक राजधानी में भी गुजरा जब शंकरनगर में प्रदेश कांग्रेस के नए भवन की नींव का पत्थर पूजते समय अजीत जोगी नहीं पहुंचे।उनका नाम पत्थर में नहीं होने की खबर भी चली।  इस तरह संगठन खेमा अपने खाते के कामयाबी  कॉलम में यह लाइन दर्ज कर सकता है कि अपने रा।ट्रीय उपाध्यक्ष के दौरे की व्यवस्था के लिए उनकी टीम फिट है।राहुल गाँधी भी अपने नए अंदाज में अपना छत्तीसगढ़ दौरा कर वापस लौट गए। लेकिन छत्तीसगढ़ की कांग्रेस ने अपना अंदाज बदलना मुनासिब नहीं समझा….। वही पुराना अंदाज ….वही पुराना इत्तफाक….।यही तो छत्तीसगढ़ कांग्रेस की खूबी है राहुल बाबा…….।

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